दो साल तक कैद में मजदूरी, बर्बरता और वापसी... मुजफ्फरनगर की फैक्ट्री में मौतों का सच क्या है?

मुजफ्फरनगर की जिस फैक्ट्री से 12 कथित बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया गया, वहां की कहानी सिर्फ रेस्क्यू ऑपरेशन तक सीमित नहीं है. आरोप है कि मजदूरों को करीब दो साल तक बंधक बनाकर जबरन काम कराया गया, उनके साथ अमानवीय व्यवहार हुआ और इस दौरान कुछ मजदूरों की मौत भी हुई. इन आरोपों की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है. फिलहाल मुक्त कराए गए मजदूरों को पुनर्वास योजना के तहत 30-30 हजार की मदद देकर घर भेजा गया है, जबकि मुख्य आरोपी अब भी फरार है.

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दो साल तक कैद में मजदूरी करने वालों की कहानी. (Photo: Screengrab) दो साल तक कैद में मजदूरी करने वालों की कहानी. (Photo: Screengrab)

संदीप सैनी

  • मुजफ्फरनगर,
  • 26 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:33 PM IST

22 जून को मुजफ्फरनगर की एक फैक्ट्री से 12 लोगों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराया गया. अब उन्हें 30-30 हजार रुपये की पुनर्वास सहायता देकर उनके घर भेजा गया है. लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल मुआवजा नहीं, बल्कि वो दो साल हैं, जिनके बारे में दावा है कि इन मजदूरों को बंधक बनाकर रखा गया, उनसे जबरन काम कराया गया और यातनाएं दी गईं. इस दौरान कुछ मजदूरों की मौत होने के आरोप भी सामने आए हैं. इन्हीं दावों की जांच के लिए अब एसआईटी बनाई गई है.

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गले में फूलों की माला, हाथ में 30 हजार रुपये का चेक और चेहरे पर राहत... मुजफ्फरनगर में गुरुवार को ऐसा ही सीन देखने को मिला, जब पुलिस और प्रशासन ने 12 मुक्त कराए गए मजदूरों को उनके परिजनों के साथ घर के लिए रवाना किया. मजदूरों ने अधिकारियों का धन्यवाद किया, लेकिन इस विदाई के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी है, जिसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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22 जून को पुलिस ने एक फैक्ट्री पर कार्रवाई करते हुए 12 मजदूरों को मुक्त कराया था. पुलिस का आरोप है कि इन मजदूरों को बंधुआ बनाकर रखा गया था. इस मामले में शिवा त्यागी और प्रदीप बालियान को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है, जबकि मुख्य आरोपी बताए जा रहे अंकित बालियान की तलाश अभी भी जारी है. लेकिन यह मामला सिर्फ बंधुआ मजदूरी तक सीमित नहीं है.

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यह भी पढ़ें: महाराष्ट्र में राजस्थान के 53 मजदूरों से करवाई जा रही थी बंधुआ मजदूरी, प्रतापगढ़ पुलिस ने किया रेस्क्यू

जांच के दौरान जो बातें सामने आईं, वे और भी गंभीर हैं. आरोप है कि इन मजदूरों से करीब दो साल तक जबरन काम कराया गया. उन्हें फैक्ट्री से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था और उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था. चौंकाने वाला दावा यह है कि इस दौरान कुछ मजदूरों की मौत भी हुई. हालांकि इन मौतों के आरोपों की अभी पुष्टि नहीं हुई है. इन्हीं दावों की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया है.

इस मामले में सवाल हैं कि अगर दो साल तक कथित तौर पर मजदूर बंधक बनाकर रखे गए, तो क्या आसपास के लोगों को इसकी भनक नहीं लगी? क्या श्रम विभाग, स्थानीय प्रशासन या पुलिस तक कभी कोई सूचना नहीं पहुंची? क्या फैक्ट्री में कभी निरीक्षण नहीं हुआ? और अगर हुआ, तो फिर यह सब नजर से कैसे छूट गया?

30 हजार रुपए... और जिंदगी की नई शुरुआत

मुक्त कराए गए सभी 12 मजदूरों को केंद्र सरकार की बंधुआ मजदूर पुनर्वास योजना के तहत 30-30 हजार रुपये के चेक दिए गए हैं. पुलिस के मुताबिक, एसडीएम कोर्ट में बंधुआ मजदूरी का मामला तय होने के बाद वयस्क मजदूरों को 70-70 हजार रुपये और नाबालिग पीड़ित को 1.70 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता भी दी जाएगी.

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सीओ फुगाना विश्वजीत सिंह ने कहा कि इस सहायता का मकसद पीड़ितों को सामान्य जीवन की ओर लौटने में मदद करना है. उनके मुताबिक, प्रशासन चाहता है कि जिन लोगों ने कठिन परिस्थितियां झेली हैं, वे दोबारा सम्मान के साथ अपना जीवन शुरू कर सकें.

इस पूरे मामले में पुलिस की कार्रवाई जारी है. दो आरोपी जेल भेजे जा चुके हैं और मुख्य आरोपी की तलाश की जा रही है. आखिर फैक्ट्री के अंदर वास्तव में क्या होता था? जिन मजदूरों की मौत होने के आरोप लगाए जा रहे हैं, उनका सच क्या है? इन सवालों के जवाब सिर्फ इस केस के लिए नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी हैं. 12 मजदूर अपने घर लौट रहे हैं. उनके हाथ में मुआवजे का चेक है और सामने एक नई जिंदगी शुरू करने की उम्मीद भी. लेकिन उनके पीछे एक ऐसी फैक्ट्री की कहानी छूट गई है, जिसकी परतें अभी खुलनी बाकी हैं.

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