भारत और नॉर्वे के बच्चों की परवरिश में क्या है फर्क? वायरल पोस्ट में जानिए

नॉर्वे में रह चुके एक भारतीय युवक ने वहां के बच्चों की परवरिश और भारत की शिक्षा व्यवस्था की तुलना करते हुए सोशल मीडिया पर ऐसा अनुभव साझा किया, जिसने हजारों लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया.

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नॉर्वे में रहने के दौरान उनकी बच्चों को लेकर सोच पूरी तरह बदल गई (Photo:Pexel) नॉर्वे में रहने के दौरान उनकी बच्चों को लेकर सोच पूरी तरह बदल गई (Photo:Pexel)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 2:47 PM IST

क्या बच्चों को बचपन में खेलना चाहिए या छोटी उम्र से पढ़ाई का दबाव देना चाहिए? सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट ने इसी सवाल पर नई बहस छेड़ दी है. नॉर्वे में रह चुके एक भारतीय युवक ने वहां के बच्चों की परवरिश और भारत की शुरुआती शिक्षा व्यवस्था की तुलना करते हुए अपना अनुभव शेयर किया. उनकी पोस्ट पढ़कर हजारों लोग अपनी राय दे रहे हैं.

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X यूजर विनोद ने लिखा कि नॉर्वे में रहने के दौरान उनकी बच्चों को लेकर सोच पूरी तरह बदल गई. उनके मुताबिक, वहां किंडरगार्टन का मकसद बच्चों को किताबों में आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मविश्वासी, जिज्ञासु और स्वतंत्र बनाना होता है.

उन्होंने बताया कि नॉर्वे में छोटे बच्चे मौसम कैसा भी हो, जंगलों, पहाड़ों और खुले मैदानों में समय बिताते हैं. वे पेड़ों, पत्थरों और मिट्टी के बीच खेलते हुए प्रकृति को समझते हैं. इसी दौरान वे चट्टानों पर चढ़ना, अपने हाथों से चीजें बनाना, प्रकृति की देखभाल करना, दोस्तों के साथ मतभेद सुलझाना और आत्मनिर्भर बनना सीखते हैं.विनोद ने लिखा कि पढ़ना-लिखना बाद में भी सीखा जा सकता है, लेकिन बचपन दोबारा नहीं मिलता.

भारत लौटने पर क्या देखकर भावुक हो गए?

विनोद ने बताया कि भारत लौटने के बाद उन्होंने कई ऐसे बच्चों को देखा, जिनकी उम्र मुश्किल से तीन साल थी, लेकिन उनके कंधों पर भारी स्कूल बैग थे. वे अक्षर लिखना, गिनती करना और वर्कशीट पूरी करने में जुटे थे.उन्होंने लिखा कि ऐसा लगा कि उन्हें अगली क्लास के लिए तैयार किया जा रहा है, बच्चा बनने के लिए नहीं. मैं उन्हें देखता रहा और मेरी आंखें भर आईं.

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देखें पोस्ट

आखिर क्यों छिड़ गई बहस?

यह पोस्ट वायरल होने के बाद हजारों लोगों ने अपनी राय रखी. कुछ यूजर्स ने कहा कि बचपन में खेल, प्रकृति, जिज्ञासा और भावनात्मक विकास उतना ही जरूरी है, जितनी पढ़ाई. वहीं कई लोगों का मानना था कि इसकी जिम्मेदारी सिर्फ स्कूलों की नहीं, बल्कि माता-पिता की भी है.

कुछ लोगों ने यह भी लिखा कि आज के बच्चों का बचपन मोबाइल फोन, स्क्रीन और सोशल मीडिया के बीच सिमटता जा रहा है, जबकि पहले की पीढ़ियां घंटों बाहर खेलती थीं. वहीं कुछ यूजर्स ने कहा कि भारत और नॉर्वे की सामाजिक, आर्थिक और शिक्षा व्यवस्था अलग है, इसलिए दोनों की सीधी तुलना करना आसान नहीं है.

क्या कहती हैं विशेषज्ञों की राय?

शिक्षा और बाल विकास के कई विशेषज्ञ मानते हैं कि शुरुआती उम्र में खेल आधारित सीखना  बच्चों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. हालांकि, किस उम्र में औपचारिक पढ़ाई शुरू हो और उसका तरीका क्या हो, यह अलग-अलग देशों की शिक्षा नीति और सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है.

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