विदेश जाकर बसना लाखों भारतीयों का सपना होता है. नई नौकरी, बेहतर सुविधाएं, खूबसूरत शहर और अलग तरह की जिंदगी... शुरुआत में यह सब बेहद रोमांचक लगता है. लेकिन कुछ समय बाद क्या यही चीजें सामान्य लगने लगती हैं? अमेरिका में रह रही भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर आयुषी श्रीवास्तव ने अपने अनुभव के जरिए इसी सवाल को उठाया है.
आयुषी ने हाल ही में इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने अमेरिका में रहने के करीब दो साल बाद अपने अनुभव के बारे में बात की. आयुषी माइक्रोसॉफ्ट में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और बिट्स पिलानी से पढ़ाई कर चुकी हैं. वह 25 साल की उम्र में अमेरिका गई थीं.
'अब ये सब नॉर्मल लगता है'
आयुषी ने बताया कि अमेरिका जाने से पहले वह काफी एक्साइटेड थीं. नई जगह देखने और अलग तरह की जिंदगी जीने को लेकर उनके मन में काफी उत्साह था. लेकिन दो साल बाद उन्हें लगता है कि उस शुरुआती रोमांच में कमी आ गई है.
वीडियो में उन्होंने अमेरिका का एक खूबसूरत वॉटरफ्रंट व्यू दिखाते हुए कहा कि अब वह वहां की ऐसी चीजों की आदी हो चुकी हैं, जो शुरुआत में उन्हें बेहद खास लगती थीं.
उन्होंने बताया कि उन्होंने बड़ी-बड़ी इमारतें देख ली हैं. साफ हवा, साफ पानी, बर्फ, गर्मी और पतझड़ जैसे मौसम भी देख लिए हैं. अब ये चीजें उन्हें पहले की तरह असाधारण नहीं लगतीं.
आयुषी ने यह भी कहा कि जिस एक्साइटमेंट के साथ वह अमेरिका आई थीं, वह धीरे-धीरे कम हो रही है. अब उन्हें अपने लिए एक नया लक्ष्य तलाशना होगा.
उन्होंने सवाल किया कि जब जिंदगी का एक बड़ा लक्ष्य हासिल हो जाए और उसकी चमक भी सामान्य लगने लगे, तो आगे बढ़ने के लिए नया ड्राइविंग फोर्स क्या हो सकता है.
क्या इसे 'हेडोनिक अडैप्टेशन' कहते हैं?
आयुषी के वीडियो पर एक यूजर ने उनकी स्थिति को 'हेडोनिक अडैप्टेशन' बताया. यह शब्द मनोविज्ञान में उस प्रक्रिया के लिए इस्तेमाल होता है जिसमें किसी नए बदलाव या अनुभव से मिलने वाली भावनात्मक प्रतिक्रिया समय के साथ कम हो सकती है.
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के जर्नल करंट डायरेक्शन्स इन साइकोलॉजिकल साइंस में पब्लिश स्टडी के मुताबिक, हेडोनिक अडैप्टेशन का मतलब है कि जीवन की परिस्थितियों में बदलाव के बाद इंसान की खुशी का स्तर कुछ समय के साथ अपनी सामान्य स्थिति की ओर लौट सकता है. हालांकि स्टडी यह भी बताता है कि हर व्यक्ति में इसका असर एक जैसा नहीं होता और कुछ घटनाओं का असर लंबे समय तक बना रह सकता है.
एक अन्य शोध में पाया गया कि किसी सकारात्मक बदलाव से मिलने वाली खुशी समय के साथ कम हो सकती है. शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि किसी उपलब्धि के लिए लगातार सराहना और अनुभवों में विविधता इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है.
यानी विदेश जाना ही वजह नहीं?
आयुषी की कहानी को सिर्फ अमेरिका से जोड़कर देखना जरूरी नहीं है. यही अनुभव नई नौकरी, बड़ी सैलरी, नया घर, महंगी कार या किसी लंबे समय से चाही गई उपलब्धि के बाद भी हो सकता है.
शुरुआत में नई चीज बहुत खास लगती है. लेकिन जब वही चीज रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है तो उसका 'नयापन' कम हो सकता है. इसके बाद इंसान अक्सर अगला लक्ष्य तलाशने लगता है.
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