अचानक 8 लाख मिल जाएं तो क्या करेंगे? Harvard ने बताया किस खर्च से बढ़ती है खुशी

Money and Happiness: अचानक मिली बड़ी रकम इंसान की खुशी बढ़ा सकती है, लेकिन पैसा कहां और कैसे खर्च किया गया, इसका भी असर पड़ता है. Harvard से जुड़ी एक रिसर्च में 7 देशों के लोगों के खर्च करने के ट्रेंड को समझने की कोशिश की गई.

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Harvard Research ने खोला पैसे खर्च करने और खुशी का राज (Representational Image: Pexels) Harvard Research ने खोला पैसे खर्च करने और खुशी का राज (Representational Image: Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 19 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 8:58 AM IST

जरा सोचिए, सुबह उठते ही आपको पता चले कि आपके खाते में करीब 8 लाख रुपये अचानक आ गए हैं. अब आपके सामने कई ऑप्शन हैं. नई कार या मोबाइल खरीदें, घर का कोई जरूरी काम निपटाएं, कर्ज चुकाएं, घूमने निकल जाएं, अपनी पढ़ाई पर खर्च करें या फिर किसी जरूरतमंद की मदद करें. आप क्या चुनेंगे?

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इतनी बड़ी रकम मिलने के बाद आप क्या खरीदेंगे. सवाल यह भी है कि पैसा खर्च करने का कौन सा तरीका आपको ज्यादा खुश कर सकता है?

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हार्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ से जुड़ी एक रिसर्च ने इसी सवाल को समझने की कोशिश की है. रिसर्चर्स ने इंडोनेशिया, केन्या, ब्राजील, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के 300 लोगों को स्टडी में शामिल किया. इनमें से 200 लोगों को अचानक 10,000 डॉलर की रकम दी गई. उन्हें यह पैसा तीन महीने के अंदर खर्च करना था. बाकी 100 लोगों को कोई रकम नहीं दी गई और उन्हें कंट्रोल ग्रुप के तौर पर स्टडी में शामिल किया गया.

पैसा मिला तो लोगों ने क्या किया?

जिन लोगों को 10,000 डॉलर मिले, उनसे हर महीने पूछा गया कि उन्होंने पैसा कहां खर्च किया और उस खरीदारी से उन्हें कितनी खुशी मिली. तीन महीने की स्पेंडिंग पीरियड खत्म होने के बाद और फिर तीन महीने बाद भी रिसर्चर्स ने उनकी खुशहाली को देखा.

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रिसर्च में एक दिलचस्प पैटर्न सामने आया. चैरिटी, एक्सपीरियंस, एजुकेशन और पर्सनल केयर पर खर्च करने से खुशी बढ़ने का संबंध पाया गया.

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यानी किसी को पैसे मिलने के बाद वह रकम सिर्फ सामान खरीदने में ही खर्च नहीं हुई. किसी ने एक्सपीरियंस पर खर्च किया, किसी ने एजुकेशन पर, किसी ने खुद की केयर पर और कुछ लोगों ने दूसरों की मदद की. इन कैटेगरीज में स्पेंडिंग के साथ ज्यादा हैप्पीनेस रिपोर्ट की गई.

लेकिन हर देश में पैसे की खुशी एक जैसी नहीं थी

यहां रिसर्च का सबसे दिलचस्प हिस्सा सामने आता है. रिसर्चर्स ने पाया कि पैसे खर्च करने और खुशी के बीच संबंध लोगों के रहने वाले देश की इकनॉमिक कंडीशन के हिसाब से बदल सकता है.

हाई-इनकम कंट्रीज के पार्टिसिपेंट्स को गिफ्ट्स और टाइम-सेविंग परचेज से अपेक्षाकृत ज्यादा हैप्पीनेस मिली. वहीं लो-इनकम कंट्रीज के मुकाबले हाई-इनकम कंट्रीज में डेट चुकाने और हाउसिंग पर खर्च करने से मिलने वाली हैप्पीनेस अपेक्षाकृत कम थी.

इसका मतलब यह नहीं है कि कर्ज चुकाना या घर का खर्च उठाना खुशी नहीं देता. बल्कि स्टडी यह दिखाती है कि एक ही तरह का खर्च अलग आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में रहने वाले लोगों पर अलग असर डाल सकता है.

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क्या पैसा मिलने से हर कोई खुश हो गया?

यहां एक और महत्वपूर्ण बात है. रिसर्चर्स ने उन 100 लोगों को भी ट्रैक किया, जिन्हें कोई पैसा नहीं मिला था. जिन लोगों को विंडफॉल मिला था, उनका ओवरऑल वेलबीइंग कंट्रोल ग्रुप की तुलना में बेहतर रहा. लेकिन विंडफॉल मिलने के बाद भी यह फर्क इस बात से जुड़ा था कि लोगों ने पैसा किस तरह खर्च किया. यानी रिसर्च का सीधा संदेश यह नहीं है कि ज्यादा पैसा का मतलब ज्यादा खुशी नहीं.

बल्कि बात कुछ ज्यादा दिलचस्प है: पैसा मिलने के बाद उसका इस्तेमाल किस चीज पर किया जाता है, वह भी वेलबीइंग से जुड़ा हो सकता है.

तो अगली बार पैसा मिले तो क्या करें?

हार्वर्ड से जुड़ी इस रिसर्च के आधार पर कोई एक यूनिवर्सल फॉर्मूला नहीं निकाला जा सकता. हर व्यक्ति की फाइनेंशियल सिचुएशन, जरूरतें और प्राथमिकताएं अलग होती हैं.

लेकिन स्टडी के फाइंडिंग्स यह जरूर संकेत देते हैं कि अगर अतिरिक्त पैसा मिले, तो उसका कुछ हिस्सा एक्सपीरियंस, एजुकेशन, पर्सनल केयर या दूसरों की मदद जैसी चीजों पर खर्च करना वेलबीइंग से जुड़ा हो सकता है.

और शायद यही इस रिसर्च का सबसे दिलचस्प सवाल है-पैसा कितना है, यह जितना मायने रखता है, क्या उतना ही यह भी मायने रखता है कि हम उसे खर्च कहां करते हैं?

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