जब भी कोई नया घर बनता है तो आपने अक्सर देखा होगा कि मिस्त्री ईंटों को दीवार में लगाने से पहले पानी में भिगोते हैं. कई जगह तो ईंटों को घंटों तक पानी में रखा जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ईंट को पानी में भिगोने की जरूरत ही क्या है? क्या सूखी ईंट से दीवार नहीं बनाई जा सकती? दरअसल, ईंट को पानी में भिगोना सिर्फ एक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे निर्माण से जुड़ी एक जरूरी वजह होती है. अगर ईंट को बिना भिगोए सीधे मसाले के साथ लगा दिया जाए तो दीवार की मजबूती पर असर पड़ सकता है.
ईंट पानी को तेजी से सोखती है
ईंट को पकाने के बाद उसमें बहुत सारे छोटे-छोटे छेद और खाली जगहें रह जाती हैं. यही वजह है कि सूखी ईंट जब पानी के संपर्क में आती है तो वह उसे तेजी से सोखने लगती है. अब अगर ऐसी सूखी ईंट को सीधे गारे में लगा दिया जाए तो वह गारे (सीमेंट और रेत के मसाले) में मौजूद पानी भी सोख सकती है. गारा यानी वह मिश्रण जिससे ईंटों को आपस में जोड़ा जाता है. इसमें आमतौर पर सीमेंट, रेत और पानी का इस्तेमाल होता है.
गारे का पानी ईंट सोख ले तो क्या होगा?
गारे को मजबूत होने के लिए उसमें मौजूद पानी की जरूरत होती है. सीमेंट और पानी के बीच होने वाली केमिकल प्रोसेस से गारा धीरे-धीरे जमता और मजबूत होता है. लेकिन अगर बहुत सूखी ईंट गारे का पानी ही तेजी से खींच ले तो गारे को ठीक से जमने के लिए जरूरी नमी कम हो सकती है. इससे ईंट और गारे के बीच पकड़ कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है. यही कारण है कि ईंटों को पहले पानी से भिगोया जाता है.
जब ईंट को पानी में भिगो दिया जाता है तो उसके अंदर मौजूद खाली जगहों में काफी हद तक पानी भर जाता है. इसके बाद जब उसे गारे में लगाया जाता है तो वह गारे का पानी उतनी तेजी से नहीं खींचती.इससे गारा अपनी जगह पर ठीक से रह पाता है और ईंट और गारे के बीच बेहतर पकड़ बनने में मदद मिलती है.
लेकिन ईंट को कितना भिगोना चाहिए?
इसका मतलब यह नहीं है कि हर ईंट को बहुत लंबे समय तक पानी में डुबोकर रखना जरूरी है. ईंट की क्वालिटी और उसकी पानी सोखने की क्षमता के हिसाब से तरीका अलग हो सकता है. आम तौर पर उद्देश्य यही होता है कि ईंट इतनी गीली हो जाए कि वह गारे का पानी तेजी से न सोखे. ईंट पर जरूरत से ज्यादा पानी चिपका हुआ भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि बहुत गीली सतह पर गारा लगाने में भी दिक्कत हो सकती है.
हर ईंट को भिगोना जरूरी है क्या?
यह भी ईंट के प्रकार पर निर्भर करता है. अलग-अलग तरह की ईंटों में पानी सोखने की क्षमता अलग होती है.इसलिए निर्माण स्थल पर इस्तेमाल होने वाली ईंट की गुणवत्ता देखकर ही सही तरीका तय किया जाता है. यानी अगली बार जब आपको घर बनाते समय ईंटों को पानी में भिगोते हुए देखें तो समझ जाइए कि मिस्त्री सिर्फ ईंट को गीला नहीं कर रहा, बल्कि ईंट और गारे के बीच सही पकड़ बनाने की तैयारी कर रहा है. छोटी-सी लगने वाली यह प्रक्रिया दीवार की क्वालिटी और मजबूती के लिए काफी अहम हो सकती है.
aajtak.in