गूगल, माइक्रोसॉफ्ट से लेकर उबर तक! AI के नाम पर लाखों लोगों की छंटनी के बाद मुश्किल में कंपनियां

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर इस वक्त दुनिया भर में कई तरह के डिबेट हैं. लेकिन फिलहाल सबसे हॉट टॉपिक ये है कि क्या AI इंसानों से ज्यादा महंगा पड़ रहा है? लाखों छंटनी AI के नाम पर की गई, लेकिन अब कंपनियां मुश्किल में दिख रही हैं. आइए जानते हैं कुछ महीनों में ऐसा क्या हुआ जिससे टेक सीईओ के सुर बदले से हैं.

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क्या कंपनियों का AI से मोह भंग हो रहा है? क्या कंपनियों का AI से मोह भंग हो रहा है?

मुन्ज़िर अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 01 जून 2026,
  • अपडेटेड 4:23 PM IST

दुनिया भर में पिछले दो साल से एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर जो माहौल बना, वह किसी टेक क्रांति से कम नहीं था. ऐसा लग रहा था कि इंटरनेट के बाद यह सबसे बड़ा बदलाव होगा. हर कंपनी अपने नाम के साथ एआई जोड़ रही थी. 

रिपोर्ट्स के मुताबिक गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, उबर से लेकर OpenAI तक ने कहीं ना कहीं ये माना है कि AI खर्चीला होता जा रहा है. माइक्रोसॉफ्ट ने Claude के कई लाइसेंस तक कैंसिल कर दिए हैं, क्योंकि महंगा पड़ रहा था.

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एक कंपनी को कुछ ही महीने में 500 मिलियन डॉलर का बिल AI का आया. इसी तरह उबर का भी AI सब्सक्रिप्शन बजट समय से कम में खत्म हो गया. 

बदल गए सुर

हर स्टार्टअप निवेश जुटा रहा था. हर टेक CEO कह रहा था कि दुनिया बदलने वाली है. लेकिन अब 2026 में पहली बार ऐसा लग रहा है कि इस कहानी की चमक थोड़ी फीकी पड़ने लगी है.

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वजह सिर्फ एक नहीं है. एआई पर बढ़ता खर्च, कमाई का साफ मॉडल न होना, नौकरी को लेकर बढ़ती चिंता, आम लोगों का विरोध और खुद टेक कंपनियों के बदले हुए बयान. यह सब मिलकर एक नया सवाल खड़ा कर रहे हैं. क्या एआई का बबल अब धीरे धीरे फूटने लगा है?

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यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि इतिहास में टेक दुनिया पहले भी ऐसा देख चुकी है. 1990 के दशक में इंटरनेट को लेकर भी कुछ ऐसा ही माहौल था. हर कंपनी खुद को इंटरनेट कंपनी बता रही थी. निवेशक बिना ज्यादा सवाल पूछे पैसा लगा रहे थे. फिर अचानक डॉट कॉम बबल फूटा और हजारों कंपनियां खत्म हो गईं.

हर सवाल पर खर्च… AI बना सबसे महंगा सौदा?

आज एआई को लेकर भी कुछ वैसी ही बेचैनी दिख रही है. सबसे बड़ी समस्या है एआई की लागत. जब चैटजीपीटी आया था, तब आम लोगों को सिर्फ उसका जादू दिख रहा था. लोग सवाल पूछ रहे थे, इमेज बना रहे थे, कोड लिखवा रहे थे. लेकिन इसके पीछे कितना पैसा जल रहा है, उस पर कम चर्चा हुई.

असल में एआई कोई साधारण सॉफ्टवेयर नहीं है. यह बहुत भारी इंफ्रास्ट्रक्चर पर चलता है. हर सवाल के पीछे बड़े डेटा सेंटर काम करते हैं. हजारों महंगे GPU चिप्स बिजली खाते हैं. सर्वर लगातार चलते रहते हैं. और यही वजह है कि एआई को चलाने का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है.

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अब टेक इंडस्ट्री में एक नया शब्द तेजी से इस्तेमाल हो रहा है, इन्फरेंस कॉस्ट. आसान भाषा में समझें तो जब कोई यूजर एआई से सवाल पूछता है या कोई इमेज बनवाता है, उसी समय कंपनी का पैसा खर्च होता है. जितना ज्यादा इस्तेमाल, उतना ज्यादा खर्च.

यही वजह है कि कई कंपनियां अब एआई के मुफ्त फीचर्स सीमित कर रही हैं. पहले जो चीजें फ्री थीं, अब उनके लिए पैसे मांगे जा रहे हैं. महंगे सब्सक्रिप्शन प्लान आ रहे हैं.

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कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि सिर्फ वीडियो जनरेशन मॉडल्स को चलाने में ही कंपनियों के करोड़ों डॉलर रोज खर्च हो रहे हैं. कुछ विश्लेषकों ने कहा कि एआई इंडस्ट्री कमाई से ज्यादा खर्च वाले दौर में फंस चुकी है.  

अरबों खर्च, लेकिन फायदा कहां है?

Uber के COO एंड्रयू मैकडॉनल्ड ने कहा कि कंपनियां एआई पर बहुत पैसा खर्च कर रही हैं, लेकिन उसके मुकाबले उतना फायदा नहीं दिख रहा. उन्होंने साफ कहा कि अभी तक उन्हें प्रोडक्टिविटी गेंस यानी काम की स्पीड और असर में वैसी बढ़ोतरी नहीं दिखी जैसी उम्मीद थी.  

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यानी पहली बार बड़ी कंपनियां खुलकर पूछ रही हैं कि इतना पैसा लगाने के बाद कमाई कहां है? यह सवाल सिर्फ छोटी कंपनियां नहीं पूछ रहीं. टेक दुनिया के सबसे बड़े नाम भी अब पहले जितने आक्रामक नहीं दिखते.

नौकरी जाएगी या नहीं? बदलते बयानों का सच

OpenAI के हेड सैम ऑल्टमैन उन्हीं लोगों में थे जिन्होंने कहा था कि एआई लाखों व्हाइट कॉलर नौकरियां खत्म कर देगा. लेकिन अब उनका सुर बदला हुआ दिख रहा है. हाल में उन्होंने माना कि जॉब एपोकैलिप्स यानी नौकरी खत्म होने वाली स्थिति अभी तक नहीं आई.

यानी वही लोग जो पहले कह रहे थे कि इंसानों की जगह मशीनें ले लेंगी, अब कह रहे हैं कि इंसान और एआई साथ काम करेंगे.

एनवीडिया के प्रमुख जेनसन हुआंग ने भी उन कंपनियों पर सवाल उठाया जो हर छंटनी का कारण एआई को बता रही हैं. उनका कहना था कि कई कंपनियां अपने पुराने बिजनेस फैसलों को सही ठहराने के लिए एआई का नाम ले रही हैं.

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गूगल के हेड सुंदर पिचाई ने भी माना कि कंपनियों के CIO यानी टेक फैसले लेने वाले अधिकारी एआई के बढ़ते खर्च को लेकर चिंतित हैं. उन्होंने कहा कि कंपनियों का बजट तेजी से खत्म हो रहा है और यह समस्या आगे और बढ़ सकती है.  

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यह बयान बहुत महत्वपूर्ण है. क्योंकि अभी तक टेक कंपनियां सिर्फ एआई की ताकत दिखा रही थीं. अब वे उसकी लागत की बात भी करने लगी हैं. इसी बीच अमेरिका में एआई को लेकर लोगों का गुस्सा भी बढ़ रहा है.

अमेरिका में AI का हो रहा विरोध

अमेरिका में कुछ यूनिवर्सिटी कार्यक्रमों में टेक लीडर्स को छात्रों के विरोध का सामना करना पड़ा. गूगल के पूर्व CEO एरिक श्मिट को भी AI पर बात करते समय हूटिंग झेलनी पड़ी. खुद सुंदर पिचाई से बू स्ट्रेजेटजी यानी विरोध से निपटने की रणनीति पर सवाल पूछे गए.   यह सिर्फ मजाक या इंटरनेट ट्रोलिंग नहीं है. इसके पीछे असली डर है.

लोगों को लग रहा है कि एआई उनकी नौकरियां खा जाएगा. नई पीढ़ी को डर है कि जिस सेक्टर में वे करियर बनाना चाहते हैं, वहां मशीनें पहले पहुंच जाएंगी. और यह डर पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं है.

कई कंपनियों ने हाल में लेऑफ़ करते समय एआई का नाम लिया. कुछ ने कहा कि ऑटोमेशन से कम लोगों में ज्यादा काम हो सकता है. लेकिन समस्या यह है कि अभी तक एआई ने उतनी प्रोडक्टिविटी भी नहीं दिखाई जितनी वादा किया गया था.

नेशनल ब्यूरो ऑफ़ इकोनॉमिक रिसर्च की एक स्टडी में सामने आया कि 90 प्रतिशत कंपनियों ने माना कि एआई का उनके प्रोडक्यूटिविटी या रोजगार पर कोई बड़ा असर अभी तक नहीं दिखा. लेकिन इसके बावजूद कंपनियां भविष्य की उम्मीद में अरबों डॉलर खर्च कर रही हैं.

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डॉट कॉम जैसा क्रैश आने वाला है?  

यही वजह है कि अब कई अर्थशास्त्री और एक्सपर्ट्स इसे डॉट कॉम बबल से जोड़कर देखने लगे हैं. विकिपीडिया के एआई पेज में भी कई निवेशकों और इकनॉमिस्ट्स के बयान दर्ज हैं, जहां एआई निवेश को डॉट कॉम बबल जैसा बताया गया है.

ब्रिजवाटर के रे डालियो से लेकर जेपी मॉर्गन के जेमी डाइमॉन तक कई बड़े नाम कह चुके हैं कि एआई असली टेक्नोलॉजी जरूर है, लेकिन इसमें लगाया जा रहा बहुत सारा पैसा बर्बाद भी हो सकता है.  

सबसे दिलचस्प बात यह है कि एआई में अब सर्कुलर इन्वेस्टमेंट की चर्चा भी हो रही है. यानी बड़ी कंपनियां एक दूसरे में निवेश कर रही हैं और वही पैसा फिर डेटा सेंटर, GPU और एआई सेवाओं में घूम रहा है. आलोचकों का कहना है कि इससे कंपनियों की वैल्यूशन आर्टिफिशियल तरीके से बढ़ रही है.  

बिजली, डेटा सेंटर और विरोध… नया संकट

एक और बड़ी समस्या बिजली और डेटा सेंटर की है. एआई मॉडल्स को चलाने के लिए जितनी बिजली चाहिए, वह अब पर्यावरण और इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों के लिए चिंता बन रही है. अमेरिका में कई जगह नए डेटा सेंटरों का विरोध हो रहा है क्योंकि वे बहुत ज्यादा बिजली और पानी इस्तेमाल करते हैं.  

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यानी एआई अब सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं रहा. यह अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, रोजगार और राजनीति का मुद्दा बन चुका है. लेकिन यहां एक जरूरी बात समझनी होगी.

AI नहीं, ओवरहाइप है असली समस्या?

इसका मतलब यह नहीं कि एआई खत्म हो जाएगा या बेकार साबित होगा. इंटरनेट भी डॉट कॉम बबल के बाद खत्म नहीं हुआ था. असल में इंटरनेट उसके बाद और मजबूत हुआ. फर्क सिर्फ इतना था कि कमजोर कंपनियां खत्म हो गईं और मजबूत मॉडल बच गए. मुमकिन है आई के साथ भी कुछ ऐसा ही हो.

आज जो कंपनियां सिर्फ हाइप पर चल रही हैं, वे शायद टिक न पाएं. लेकिन जिनके पास असली उपयोग, कम लागत और साफ बिजनेस मॉडल होगा, वे आगे निकल सकती हैं. असल समस्या शायद एआई नहीं, बल्कि उसके आसपास बनाई गई उम्मीदें हैं.

पहले कहा गया कि एआई इंसानों को रिप्लेस कर देगा. अब कहा जा रहा है कि एआई इंसानों की मदद करेगा. पहले कहा गया कि सब कुछ तुरंत बदल जाएगा. अब समझ आ रहा है कि बदलाव धीरे होगा और बहुत महंगा भी होगा. और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सच है.

एआई काम करता है. लेकिन उसे चलाने के लिए जितना पैसा, बिजली, डेटा सेंटर और इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, वह उसे दुनिया की सबसे महंगी टेक्नोलॉजी में बदल रहा है.

यानी अभी के लिए इंसान पूरी तरह हारता नहीं दिख रहा. कई जगहों पर इंसान अब भी सस्ता, भरोसेमंद और ज्यादा प्रैक्टिकल विकल्प है….और यही वजह है कि पहली बार टेक दुनिया में एआई को लेकर उत्साह से ज्यादा सवाल पूछे जाने लगे हैं.

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