15 साल पहले समस्तीपुर जिले के ताजपुर प्रखंड के मोतीपुर गांव में एक बच्चे का जन्म हुआ था. उस दिन घर में खुशियां तो थीं ही, लेकिन एक पिता ने अपने मन में एक और फैसला कर लिया था... जिस क्रिकेट ने कभी उनके अपने सपनों को अधूरा छोड़ दिया था, अब वही खेल उनके बेटे की जिंदगी बनेगा.
शनिवार (4 जुलाई) को इंग्लैंड के ओल्ड ट्रैफर्ड, मैनचेस्टर में जब वैभव को कैप सौंपी गई तो यह सिर्फ एक 15 साल 99 दिन के लड़के के इंटरनेशनल डेब्यू की घोषणा नहीं थी... यह उस पिता की बरसों पुरानी तपस्या का सबसे बड़ा इनाम था, जिसने अपने अधूरे क्रिकेट को बेटे के बल्ले में जीना शुरू कर दिया था.
वैभव अब टीम इंडिया की नीली जर्सी में हैं. लेकिन इस जर्सी की सिलाई सिर्फ चयनकर्ताओं ने नहीं की... इसमें एक पिता की अधूरी इच्छाएं, मां की अनगिनत सुबहें, हजारों किलोमीटर के सफर, लाखों खेली गई गेंदें और एक छोटे से गांव की उम्मीदें भी बुनी हुई हैं.
बिहार में जन्मे वैभव की कहानी किसी क्रिकेट अकादमी से नहीं, बल्कि एक ऐसे घर से शुरू होती है, जहां क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, एक अधूरी ख्वाहिश थी. पिता संजीव सूर्यवंशी खुद क्रिकेटर बनना चाहते थे. बिहार में उस दौर की बदहाल क्रिकेट व्यवस्था ने उनका रास्ता रोक दिया. मुंबई तक गए, संघर्ष किया, शिपयार्ड में काम किया, बाउंसर की नौकरी की, अभिनेता बनने की कोशिश की, लेकिन क्रिकेटर बनने का सपना अधूरा रह गया.
फिर वैभव का जन्म हुआ... और पिता ने तय कर लिया कि अब जो कहानी उनसे छूट गई, उसे उनका बेटा पूरा करेगा.
चार साल का बच्चा... और हाथ में बल्ला
ज्यादातर बच्चे चार साल की उम्र में खिलौनों से खेलते हैं. वैभव के हाथ में तब तक बल्ला आ चुका था. ताजपुर के छोटे-से मैदान में पिता हर दिन उसे लेकर पहुंचते. शुरुआत में यह सिर्फ खेल था, लेकिन बहुत जल्द यह रोज की दिनचर्या बन गई.
कोच ब्रजेश झा ने जल्दी ही पहचान लिया कि यह लड़का बाकी बच्चों जैसा नहीं है. उसके अंदर गेंद को सिर्फ खेलने की नहीं, उस पर हावी होने की भूख थी. वह गेंद को रोकने नहीं, मैदान से बाहर भेजने की सोचकर बल्लेबाजी करता था.
यहीं से पिता का विश्वास और मजबूत हो गया.
हर सुबह चार बजे... एक सपना सड़क पर निकल पड़ता था
कुछ साल बाद वैभव को बेहतर ट्रेनिंग दिलाने का फैसला हुआ. इसके लिए घर से करीब 200 किलोमीटर दूर अकादमी जाना पड़ता था.
सुबह चार बजे अलार्म बजता. मां जल्दी उठकर टिफिन तैयार करतीं. पिता गाड़ी निकालते. कई बार मोहल्ले के नेट बॉलर भी साथ होते. सूरज निकलने से पहले सफर शुरू हो जाता और देर रात घर वापसी होती.
यह किसी एक दिन की कहानी नहीं थी. यह महीनों... फिर सालों तक चलता रहा.
स्कूल, त्योहार, छुट्टियां... सब क्रिकेट के बाद आते थे. परिवार की पूरी जिंदगी वैभव के कार्यक्रम के हिसाब से चलने लगी.
600 गेंदें... हर दिन
प्रतिभा ने वैभव को पहचान दिलाई, लेकिन उसे निखारा उसकी तैयारी ने. महज 10 साल की उम्र में वह रोज करीब 600 गेंदें खेलता था. कई बार नेट्स खत्म हो जाते, लेकिन उसकी बल्लेबाजी नहीं.
बिहार के पूर्व क्रिकेटर समर कादरी ने जब पहली बार उसे देखा, तो समझ गए कि यह साधारण खिलाड़ी नहीं है. उन्होंने राजस्थान रॉयल्स के हाई-परफॉर्मेंस सेंटर तक उसकी चर्चा पहुंचाई.
यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया.
150 किमी की रफ्तार... और एक छक्का जिसने सब बदल दिया
राजस्थान रॉयल्स के ट्रायल में 13 साल का दुबला-पतला लड़का नेट्स में उतरा. पहले उसे लेफ्ट आर्म स्विंग गेंदबाज के सामने भेजा गया. पहली ही गेंद एक्स्ट्रा कवर के ऊपर से सीमा रेखा पार कर गई.
फिर असली परीक्षा शुरू हुई. तेज गेंदबाज बुलाए गए. विकेटकीपर को काफी पीछे खड़ा किया गया. वैभव से कहा गया कि अब असली स्पीड का सामना करना होगा.
कुछ गेंदें छोड़ने के बाद एक फुल लेंथ गेंद मिली. अगले ही पल गेंद साइटस्क्रीन के ऊपर थी.
नेट्स के बाहर खड़े लोगों के चेहरे बदल चुके थे. राजस्थान रॉयल्स के हाई-परफॉर्मेंस डायरेक्टर जुबिन भरूचा समझ चुके थे कि यह सिर्फ एक प्रतिभाशाली बच्चा नहीं, भारतीय क्रिकेट का भविष्य हो सकता है.
आईपीएल ने नाम दिया... टीम इंडिया ने पहचान
जब राजस्थान रॉयल्स ने नीलामी में 13 साल के वैभव पर करोड़ों रुपये खर्च किए, तो बहुत लोगों ने इसे जोखिम कहा.लेकिन कुछ महीनों बाद वही लड़का आईपीएल में दुनिया के नामी गेंदबाजों पर बेखौफ छक्के बरसा रहा था.
उम्र 15 साल...सामने अंतरराष्ट्रीय गेंदबाज...लेकिन बल्लेबाजी में कहीं भी झिझक नहीं. आईपीएल ने उसे स्टार बनाया. अब टीम इंडिया ने भी उस पर अपना भरोसा जता दिया.
आज सिर्फ वैभव का डेब्यू नहीं हुआ
रिवरसाइड ग्राउंड पर जब वैभव ने नीली जर्सी पहनी, तो सिर्फ एक खिलाड़ी का सपना पूरा नहीं हुआ.उस पिता की आंखों में भी शायद वही तस्वीर घूम रही होगी, जिसने कभी अपना क्रिकेट पीछे छोड़ दिया था. उसे शायद वे सुबहें याद आई होंगी, जब अंधेरे में सफर शुरू होता था.
वे दिन याद आए होंगे, जब पैसे से ज्यादा जरूरी क्रिकेट किट लगती थी. वे घंटे याद आए होंगे, जब बेटे के साथ नेट्स के बाहर बैठकर सिर्फ एक दिन का इंतजार किया जाता था. आज वह दिन आ गया.
यह शुरुआत है... मंजिल नहीं
15 साल की उम्र में भारत के लिए डेब्यू करना अपने आप में इतिहास है. लेकिन वैभव सूर्यवंशी की कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा शायद अभी लिखा जाना बाकी है. क्योंकि समस्तीपुर के उस छोटे-से घर से निकला यह लड़का अब सिर्फ अपने लिए नहीं खेल रहा. उसके हर रन में एक पिता की अधूरी पारी है. हर छक्के में हजारों सुबहों की मेहनत है.
... और हर बार जब वह टीम इंडिया की जर्सी पहनकर मैदान पर उतरेगा, तब सिर्फ एक क्रिकेटर नहीं, एक पिता का अधूरा क्रिकेट भी उसके साथ बल्लेबाजी करता दिखाई देगा.
विश्व मोहन मिश्र