क्या ये अहंकार है? वैभव सूर्यवंशी पर कप्तान श्रेयस अय्यर की 'वर्ल्ड कप विजेता' वाली दलील क्यों नहीं टिकती

इंग्लैंड के खिलाफ पहले टी20 से पहले कप्तान श्रेयस अय्यर ने वैभव सूर्यवंशी के डेब्यू पर चुप्पी साधते हुए कहा कि कुछ महीने पहले टी20 विश्व कप जीतने वाले खिलाड़ियों का समर्थन करना जरूरी है. इस बयान के बाद नई प्रतिभाओं को मौका देने और टीम इंडिया की चयन नीति को लेकर बहस तेज हो गई है.

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क्या वैभव को सिर्फ ड्रेसिंग रूम का अनुभव देने के लिए बुलाया गया है? (Photo, Getty) क्या वैभव को सिर्फ ड्रेसिंग रूम का अनुभव देने के लिए बुलाया गया है? (Photo, Getty)

विश्व मोहन मिश्र

  • नई दिल्ली,
  • 01 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:45 AM IST

भारतीय क्रिकेट में इस वक्त सबसे बड़ी बहस किसी हार-जीत की नहीं, बल्कि एक सोच की है. एक ऐसी सोच, जो यह सवाल खड़ा कर रही है कि क्या टीम इंडिया में अब पुरानी उपलब्धियां नई प्रतिभाओं से बड़ी हो गई हैं?

इंग्लैंड के खिलाफ पहले टी20 मुकाबले से पहले जब कप्तान श्रेयस अय्यर से 15 साल के वैभव सूर्यवंशी के डेब्यू को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से परहेज किया. उन्होंने कहा कि प्लेइंग इलेवन का फैसला गोपनीय है. लेकिन इसके बाद उन्होंने जो तर्क दिया, उसी ने बहस को जन्म दे दिया. अय्यर ने कहा कि 'कुछ महीने पहले टी20 विश्व कप जीतने वाले खिलाड़ियों का समर्थन करना जरूरी है.'

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यहीं से सवाल उठता है. क्या विश्व कप जीतने वाले खिलाड़ियों का सम्मान होना चाहिए? बिल्कुल होना चाहिए. लेकिन क्या सिर्फ इसी आधार पर लगातार मौके भी मिलते रहने चाहिए? और अगर ऐसा है, तो फिर वैभव सूर्यवंशी जैसे खिलाड़ी टीम में आखिर आए किसलिए हैं?

आयरलैंड दौरा इस तर्क को क्यों कमजोर करता है?

श्रेयस अय्यर की दलील का सबसे बड़ा परीक्षण बहुत पुराना नहीं, बल्कि हालिया आयरलैंड दौरा ही है. भारत ने वहां जिन खिलाड़ियों पर भरोसा जताया, उनमें टी20 विश्व कप जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे खिलाड़ी भी शामिल थे. अनुभव भी था, बड़े नाम भी थे और विश्व विजेता होने का तमगा भी. लेकिन नतीजा क्या निकला? भारत दोनों टी20 मुकाबले हार गया. आयरलैंड सीरीज शुरू होने से पहले भी अपनी पीसी में टीम मैनेजमेंट ने वैभव का डेब्यू न करने का ऐलान करते हुए वर्ल्ड कप विजेता वाली दलील ही दी थी, लेकिन दो मैचों की सीरीज में हाल क्या हुआ ये सबको पता है.

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यानी सिर्फ 'विश्व कप विजेता' होना जीत की गारंटी नहीं है. अगर प्रदर्शन ही क्रिकेट की सबसे बड़ी कसौटी है, तो फिर चयन का आधार भी वर्तमान फॉर्म और टीम की जरूरत होनी चाहिए, न कि सिर्फ अतीत की उपलब्धियां.

अब क्या करे बैबी बॉस वैभव...?

15 साल की उम्र में भारतीय टीम तक पहुंचना कोई संयोग नहीं होता. वैभव सूर्यवंशी ने अंडर 19 क्रिकेट, घरेलू क्रिकेट और फ्रेंचाइजी क्रिकेट में ऐसा प्रदर्शन किया कि चयनकर्ताओं ने उन्हें राष्ट्रीय स्क्वॉड में जगह दी.

लेकिन अगर टीम में चुनने के बाद भी उन्हें सिर्फ इसलिए इंतजार करना पड़े कि पहले विश्व कप विजेता खिलाड़ियों को मौका देना है, तो फिर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उनके चयन का उद्देश्य क्या था?

क्या उन्हें सिर्फ ड्रेसिंग रूम का अनुभव देने के लिए बुलाया गया है, या वास्तव में भारतीय क्रिकेट का भविष्य मानकर?

भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी ताकत क्या रही है?

भारतीय क्रिकेट कभी सिर्फ उपलब्धियों के भरोसे नहीं चला. यहां हर पीढ़ी ने पिछली पीढ़ी को चुनौती देकर अपनी जगह बनाई है.

अगर कभी यह सोच हावी हो जाती कि पुराने खिलाड़ी इसलिए खेलेंगे क्योंकि उन्होंने देश को विश्व कप जिताया है, तो शायद भारतीय क्रिकेट को नई पीढ़ी के कई महान खिलाड़ी कभी नहीं मिलते.

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भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उसका निर्दयी मेरिट सिस्टम रहा है. यहां सचिन तेंदुलकर ने जगह बनाई, फिर विराट कोहली आए, फिर शुभमन गिल और यशस्वी जायसवाल... किसी को सिर्फ इसलिए नहीं खिलाया गया कि उसने अतीत में देश को ट्रॉफी दिलाई थी. हर पीढ़ी ने अगली पीढ़ी के लिए रास्ता छोड़ा.

इस टीम की सबसे बड़ी पहचान हमेशा यही रही है कि यहां नाम से ज्यादा प्रदर्शन की कीमत होती है.

सम्मान और चयन में फर्क समझना होगा

विश्व कप विजेता खिलाड़ियों का सम्मान होना चाहिए. उनके योगदान पर कोई सवाल नहीं है. लेकिन सम्मान और प्लेइंग इलेवन में जगह, दोनों अलग-अलग बातें हैं.

टीम का चयन इस आधार पर होना चाहिए कि मौजूदा समय में कौन खिलाड़ी टीम को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचा सकता है. अगर अतीत की उपलब्धि ही सबसे बड़ा पैमाना बन जाएगी, तो नई प्रतिभाओं के लिए रास्ता अपने आप मुश्किल हो जाएगा.

असली बहस यहीं है

यह बहस किसी एक खिलाड़ी के खिलाफ नहीं है. न ही यह संजू सैमसन या अभिषेक शर्मा की आलोचना है. सवाल सिर्फ इतना है कि क्या भारतीय क्रिकेट अपने सबसे मजबूत सिद्धांत- मेरिट और प्रदर्शन पर कायम रहेगा या फिर पुरानी उपलब्धियों के सहारे फैसले लिए जाएंगे?

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श्रेयस अय्यर का बयान अब सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का जवाब नहीं रह गया है. इसने भारतीय क्रिकेट के चयन दर्शन पर बहस छेड़ दी है. और इस बहस के केंद्र में खड़ा है एक 15 साल का लड़का जो सिर्फ एक मौका चाहता है, ताकि वह अपने बल्ले से जवाब दे सके.
 

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