नेपाल में तिब्बत सीमा पर आए फ्लैश फ्लड ने भीषण तबाही मचाई है. इसके कारण जहां इन्फ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचा है तो वहीं बड़ी संख्या में जनहानि भी हुई है. सबसे बड़ी बात है कि यह आपदा ऐसे समय में हुई है जब नेपाल और तिब्बत के रास्ते सनातन परंपरा के सबसे बड़े और पवित्र तीर्थ कैलास मानसरोवर की यात्रा हो रही है.
खबरों के मुताबिक, मृतकों-लापता लोगों में बड़ी संख्या भारतीय टूरिस्ट की है. ये लोग सिर्फ टूरिस्ट नहीं थे, बल्कि श्रद्धालु थे और साफ-साफ कहें तो तीर्थयात्री थे जो तीर्थयात्रा पर निकले थे.
तीर्थयात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक का सफर भर नहीं है. 'तीर्थ' का अर्थ ही है, वह स्थान या माध्यम, जिसके सहारे मनुष्य संसार के बंधनों को पार करने का प्रयास करे. इसीलिए नदियों के तट, देवस्थल, पर्वत और प्राचीन धार्मिक नगर तीर्थ कहलाए.
आम आदमी वहां स्नान, दर्शन, दान, तप और अपने विचारों की शुद्धि के लिए जाता है. इसलिए ये सवाल अक्सर उठता है कि अगर किसी व्यक्ति की तीर्थ में या तीर्थयात्रा के दौरान मृत्यु हो जाए तो धर्मशास्त्र और पुराण इसे किस नजरिये से देखते हैं? आमतौर पर सभी शास्त्रों और पुराणों में एक कॉमन बात दर्ज है कि 'तीर्थयात्रा के दौरान मृत्यु हो जाना साधारण बात नहीं है. इसे मुक्ति या मोक्ष है की तरह देखना चाहिए.'
लेकिन इस साधारण सी बात में एक छिपा हुआ तथ्य भी है. असल में सिर्फ मृत्यु हो जाना ही काफी नहीं है, जरूरी है कि जीवन के अंतिम पल में आपके विचार कैसे थे. वही आखिरी विचार आपका कर्म बन जाते हैं और इसी के आधार पर इस लोक से परे परलोक की प्रक्रिया तय होती है.
इसमें सबसे पहले श्रीमद् भगवद्गीता का उदाहरण लें तो इसमें श्रीकृष्ण मनुष्य की अंतिम याद और आखिरी पलों में उसरी वैचारिक स्थिति और अवस्था की बात करते हैं.
भगवद्गीता के आठवें अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं-
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्,
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥
यानी जो मनुष्य अंतिम समय में मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है.
इसके ठीक अगले श्लोक में इस सिद्धांत को और बड़े कैनवस पर समझाया गया है-
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
मनुष्य अंत समय में जिस भाव के साथ शरीर छोड़ता है, वही भाव उसे मिलता है, क्योंकि जीवन भर उसका चित्त उसी भाव से प्रभावित रहा है.
यानी गीता में मुक्ति का आधार केवल मृत्यु का भौगोलिक स्थान नहीं है. अंतिम समय में मनुष्य का चित्त कैसा है, वह क्या सोच रहा है. इसका भी बहुत महत्त्व है. इसी नजरिये से तीर्थ का महत्त्व समझ में आता है. तीर्थ वह वातावरण देता है जहां मनुष्य का चित्त स्वाभाविक रूप से ईश्वर, मंत्र, दर्शन और आध्यात्मिक भाव की ओर जा सकता है. इसलिए पहली नजर में तीर्थयात्रा में मुक्ति की मान्यता यहीं से निकलती दिखाई देती है.
अब इसी को आगे लेकर लोक मान्यता की ओर बढ़ें तो काशी का नाम सबसे अधिक लिया जाता है. काशी को 'अविमुक्त क्षेत्र' कहा गया है. स्कंदपुराण के काशीखंड सहित कई पौराणिक परंपराओं में काशी की ऐसी महिमा बताई गई है कि यह आम धारणा आज भी है कि 'यहां देह त्यागने वाले को भगवान शिव तारक मंत्र का उपदेश देते हैं और उसे संसार के बंधन से मुक्त होने का मार्ग मिलता है. इसी विश्वास के कारण सदियों से जीवन के अंतिम दौर में काशी जाकर रहने की परंपरा भी रही है.'
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अभी बीते डेढ़ सौ सालों पहले तक तो यहां 'करवत कासी' जैसी परंपरा भी थी. लोग काशी जाकर गंगा में डूबकर जल समाधि ले लेते थे. सूरदास-मीराबाई के भजनों और कबीर की साखियों में कहीं-कहीं 'करवत कासी' का जिक्र मिल जाता है. यहां एक सूने पड़े मंदिर को लेकर कहानी प्रचलित है कि लोग मुक्ति की चाह में खुद को आरे से चिरवा लिया करते थे.
भज मन चरण कमल अविनाशी।
जे ताई दीसे धरण गगन विच ते ताई सब उठ जासी।
कहा भयो तीरथ व्रत कीन्हे कहा लिए करवट कासी।। (मीरा)
स्कंदपुराण में ही एक तीर्थयात्री साधक वसिष्ठ और उनके गुरु हिरण्यगर्भ की कहानी आती है. वे हिमालय में केदार की तीर्थयात्रा पर जाते हैं. यात्रा के दौरान असिधारा पर्वत पहुंचने के बाद हिरण्यगर्भ की मृत्यु हो जाती है, तब तीर्थयात्री होने के कारण और अंतिम समय शुद्ध चित्त का होने की वजह से शिवगण उन्हें दिव्य विमान में बैठाकर कैलास ले गए.
यानी ये पुराण कहता है कि केदार के तीर्थयात्री के रास्ते में प्राण चले जाएं तो वह शिवगणों के साथ कैलास वासी बन जाता है. यानी उसे शिवलोक मिलता है.
क्या कहता है गरुड़ पुराण
गरुड़पुराण के प्रेतकल्प, अध्याय 14 में मृत्यु के बाद धर्मराज की सभा तक पहुंचने वाले पुण्यात्माओं का वर्णन करते हुए तीर्थ में मृत्यु का उल्लेख मिलता है. इसमें काशी में मरने वाले, धर्म की रक्षा में प्राण देने वाले और योग करते हुए शरीर छोड़ने वालों के साथ ऐसे लोगों का भी उल्लेख है जिनकी मृत्यु 'पवित्र जल में दुर्घटना से डूबने से हुई हो या पवित्र तीर्थ और पुण्यभूमि पर हुई हो.
ऐसे पुण्यात्माओं के लिए धर्मराज की सभा की ओर जाने वाले उत्तरी मार्ग का वर्णन किया गया है. पांडवों की अंतिम यात्रा की जिक्र महाभारत में कुछ ऐसे ही होता है. यह याद दिलाता है कि केवल पवित्र तीर्थ ही अंतिम गति का आधार नहीं है.
पांडवों की अंतिम यात्रा में एक-एक कर द्रौपदी और चारों भाई गिरते हैं और युधिष्ठिर उनके पतन को उनके जीवन के अलग-अलग दोषों से जोड़ते हैं. यानी भारतीय शास्त्रीय परंपरा स्थान के साथ कर्म और चित्त दोनों को महत्व देती है.
पद्मपुराण के स्वर्गखंड में प्रयाग और उसके आसपास के तीर्थों का महत्व बताते हुए यहां की मृत्यु की महिमा का जिक्र भी आया है. इसमें कहा गया है कि गंगा ही नहीं बल्कि पवित्र यमुना के तट पर बसे तीर्थों में मरने वाले मनुष्यों का 'पुनर्जन्म' नहीं होता. यह पुराण गंगा और यमुना के तीर्थों में स्नान, तप और देहत्याग को अलग-अलग धार्मिक फलों से जोड़ता है.
स्कंदपुराण के वैष्णवखंड में अयोध्या में देहत्याग को स्वर्गद्वार का रास्ता बताया गया है. ऐसा व्यक्ति विष्णुलोक में जगह पाता है.
इन मान्यताओं के साथ तीर्थ की भारतीय अवधारणा को समझना भी जरूरी है. तीर्थ का शाब्दिक भाव ही 'पार उतरने के स्थान' से जुड़ा है. पुराणों में तीर्थयात्रा के साथ स्नान, संयम, उपवास, दान, जप, देवदर्शन और सांसारिक आसक्तियों से दूरी भी जुड़ी हुई है. साफ शब्दों में कहें तो तीर्थयात्रा साधना है, टूर नहीं.
इसलिए तीर्थयात्रा 'एक धार्मिक संकल्प लेकर घर से निकलने' का नाम है. फिर अगर आपके विचार शुद्ध हैं तो यह यात्रा सिर्फ जीवन और मृत्यु से परे इस लोक से उस लोक की यात्रा बन जाती है. जहां माना जाता है कि तीर्थों की मृत्यु से जन्म-मरण के चक्र से ही छुटकारा दिला देती है.
विकास पोरवाल