Kanwar Yatra 2026: कब से शुरू होगी कावड़ यात्रा? नोट करें जलाभिषेक की सही डेट

Kanwar Yatra 2026: सावन में कांवड़ यात्रा की शुरुआत हो जाती है जिसके दौरान उत्सव जैसा माहौल देखने को मिलता है. कांवड़ यात्रा भगवान शिव के भक्तों द्वारा हर साल की जाने वाली एक शुभ और पवित्र यात्रा है. इस यात्रा को जल यात्रा भी कहा जाता है. इस यात्रा को धार्मिक दृष्टि से बेहद पुण्यकारी और लाभकारी माना गया है.

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कावड़ यात्रा 2026 (Photo: ITG) कावड़ यात्रा 2026 (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 27 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 10:25 AM IST

Kanwar Yatra 2026: सावन का पावन महीना शुरू होते ही भोलेनाथ के भक्तों की सबसे बड़ी और पवित्र धार्मिक यात्रा यानी कांवड़ यात्रा का आरंभ हो जाता है. पूरे उत्तर भारत में केसरिया वस्त्र पहने लाखों कांवड़िए गंगाजल भरने के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश, गोमुख और अन्य पवित्र नदियों के तटों की ओर पैदल यात्रा पर निकलते हैं. भक्त कंधों पर कांवड़ लेकर बम बोले के जयकारों के साथ सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने स्थानीय शिव मंदिरों में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं. आइए जानते हैं साल 2026 में कांवड़ यात्रा कब से शुरू हो रही है, कब समाप्त होगी और जलाभिषेक की सही तारीख क्या है.

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कांवड़ यात्रा 2026 कब से कब तक? (Kanwar Yatra 2026 Dates)

हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन (श्रावण) मास की शुरुआत के साथ ही कांवड़ यात्रा का अनौपचारिक और औपचारिक शुभारंभ हो जाता है.

कांवड़ यात्रा की शुरुआत: 30 जुलाई 2026, गुरुवार यानी सावन का पहला दिन

कांवड़ यात्रा का समापन: 11 अगस्त 2026, मंगलवार यानी सावन शिवरात्रि के दिन

इस बार कांवड़ यात्रा कुल 13 दिनों तक चलेगी. 30 जुलाई से शिवभक्त हरिद्वार और अन्य पवित्र तीर्थों से गंगाजल भरना शुरू कर देंगे.

शिवजी पर जल चढ़ाने की सही तारीख

कांवड़ यात्रा का सबसे मुख्य दिन सावन शिवरात्रि होता है. हरिद्वार, ऋषिकेश और अन्य धामों से जल लेकर लौटने वाले कांवड़िए सावन शिवरात्रि की पावन तिथि पर ही शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करते हैं. इस बार जलाभिषेक सावन शिवरात्रि पर होगा, जो कि 11 अगस्त को है. 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि पर ही जलाभिषेक के साथ इस भव्य यात्रा का समापन होगा और शिवभक्त अपना व्रत पूर्ण करेंगे.

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क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा? 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला था, तो सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था. विष के प्रभाव से भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया था और उनके शरीर का ताप अत्यंत बढ़ गया था.

शिव जी के शरीर की जलन और विष के प्रभाव को शांत करने के लिए देवताओं और परम शिवभक्त रावण ने पवित्र गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था. तभी से श्रावण मास में गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक करने और कांवड़ यात्रा निकालने की परंपरा चली आ रही है.

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