Jitiya Vrat 2026: 2 या 3 अक्टूबर कब है जितिया व्रत ? जानें नहाय-खाय और पारण का समय

jitiya vrat 2026 : जितिया व्रत 2 या 3 अक्टूबर को लेकर असमंजस है? जानें 2026 में जीवित्पुत्रिका व्रत की सही तारीख, नहाय-खाय, निर्जला उपवास, पूजा विधि और पारण का शुभ समय.

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हिंदू पंचांग के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है.

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 5:05 PM IST

Jivitputrika Vrat 2026: संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जितिया इस साल अक्टूबर में पड़ रहा है.  इस व्रत में माताएं पूरे दिन और रात निर्जला उपवास रखकर संतान के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं.  व्रत के दौरान भगवान जीमूतवाहन की पूजा और जितिया व्रत कथा सुनने की परंपरा है.  2026 में यह व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा. 

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2026 में कब है जितिया व्रत?

हिंदू पंचांग के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है. इस साल अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को शुरू होकर 4 अक्टूबर को समाप्त होगी. उदया तिथि के आधार पर 3 अक्टूबर को जितिया व्रत रखा जाएगा.  यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से प्रचलित है.  नेपाल के कुछ क्षेत्रों में भी इसे जितिया के नाम से मनाया जाता है. 

2 अक्टूबर को नहाय-खाय

जितिया व्रत की शुरुआत नहाय-खाय से होती है.  2 अक्टूबर को व्रती महिलाएं स्नान आदि करके सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं. इसके बाद अगले दिन कठिन उपवास का संकल्प लिया जाता है.  कुछ परंपराओं में व्रत से पहले किए जाने वाले विशेष भोजन को ओठगन भी कहा जाता है.  उपलब्ध जानकारी के अनुसार 3 अक्टूबर को सुबह करीब 4:30 बजे से पहले ओठगन की प्रक्रिया पूरी करने की बात कही गई है. 

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3 अक्टूबर को रखा जाएगा निर्जला व्रत

3 अक्टूबर को माताएं जितिया का निर्जला व्रत रखेंगी.  धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन अन्न और जल का सेवन नहीं किया जाता.  शाम के समय भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है.  पूजा के बाद व्रत कथा सुनने की परंपरा भी है. 

जीमूतवाहन की पूजा क्यों होती है?

जीवित्पुत्रिका व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है.  धार्मिक कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने नाग जाति के एक बच्चे की रक्षा के लिए अपना जीवन संकट में डाल दिया था.  उनके त्याग और करुणा को संतान की रक्षा से जोड़कर देखा जाता है.  इसी वजह से जितिया व्रत में उनकी पूजा की परंपरा है.  कई क्षेत्रों में चील और सियारिन से जुड़ी कथा भी सुनी जाती है. 

जितिया व्रत की पूजा विधि

व्रत के दिन स्नान करके साफ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प लें.  इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई कर भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें.  परंपरा के अनुसार कुशा से जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाने और मिट्टी या गोबर से चील-सियारिन की आकृति बनाकर पूजा करने का भी विधान बताया गया है.  पूजा में फल, फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें.  इसके बाद जितिया व्रत कथा का श्रवण करें. 

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4 अक्टूबर को होगा पारण

जितिया व्रत का पारण 4 अक्टूबर को किया जाएगा.  धार्मिक परंपरा के अनुसार अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद नवमी तिथि में पारण किया जाता है.  उपलब्ध गणनाओं में 4 अक्टूबर को सुबह के समय पारण की जानकारी दी गई है.  पारण का सटीक समय शहर और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है. 

जितिया व्रत का महत्व

धार्मिक मान्यताओं में इस व्रत को संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से जोड़ा गया है.  यह मुख्य रूप से माताओं द्वारा रखा जाने वाला कठिन व्रत है.  व्रत के दौरान भगवान जीमूतवाहन का पूजन और कथा श्रवण किया जाता है.  हालांकि व्रत रखने से जुड़े स्वास्थ्य संबंधी निर्णय व्यक्तिगत स्थिति और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार लेने चाहिए. 

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