श्मशान घाट नदियों के पास ही क्यों होते हैं? हिंदू धर्म का छिपा हुआ रहस्य

प्राचीन समय में अधिकांश नगर नदियों के किनारे बसे थे. नदी पीने के पानी, खेती, आवागमन और दैनिक जीवन का प्रमुख स्रोत थी. नदी के किनारे खुले क्षेत्र भी उपलब्ध होते थे. इसलिए वहां अंतिम संस्कार के लिए स्थान बनना व्यावहारिक था.

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हिन्दू संस्कृति में जितने भी पुराने श्मशान घाट मिलेंगे, वो सब नदी किनारे ही होंगे. (Photo: ITG) हिन्दू संस्कृति में जितने भी पुराने श्मशान घाट मिलेंगे, वो सब नदी किनारे ही होंगे. (Photo: ITG)

अंशु पारीक

  • नई दिल्ली,
  • 06 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 8:57 PM IST

पितृपक्ष में पितरों का ध्यान और श्राद्ध करने की परंपरा बताई गई है. हमारे दिवंगत पूर्वजों को पितृ कहा जाता है. पूर्वजों से हमारा सशरीर अंतिम मिलन श्मशान में होता है. लेकिन क्या आपने कभी आखिर ज्यादातर श्मशान घाट नदी किनारे ही क्यों होते हैं. आज बढ़ती आबादी और घटते भूस्थल के कारण भले ही कुछ श्मसान घाट आबादी के बीच बन गए हों. लेकिन हिन्दू संस्कृति में जितने भी पुराने श्मशान घाट मिलेंगे, वो सब नदी किनारे ही होंगे. वाराणसी का मणिकर्णिका घाट, हरिद्वार के घाट और प्रयागराज के संगम क्षेत्र में होने वाले अंतिम संस्कार इसके बड़े उदाहरण हैं.

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हिंदू दर्शन के अनुसार, शरीर पंचतत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है. और मृत्यु के बाद शरीर इन्हीं तत्वों में विलीन होता है. अग्नि के माध्यम से शरीर का स्थूल रूप प्रकृति में वापस लौटता है और दाह संस्कार के बाद बची राख व अस्थियों को जल में विसर्जित करने की परंपरा इस प्राकृतिक चक्र को पूरा करने का प्रतीक मानी जाती है.

जन्म से मृत्यु तक जल का महत्व
धार्मिक दृष्टि से जल को शुद्धि, जीवन और पवित्रता का प्रतीक माना गया है. हिंदू संस्कारों में जन्म से मृत्यु तक जल की महत्वपूर्ण भूमिका है. पंचतत्वों में जल ऐसा तत्व है जिसमें ऊर्जा को तेजी से ग्रहण करने की क्षमता होती है. यही वजह है कि पुराने समय में हमारे ऋषिमुनि कमण्डल में जल पास रखकर ही साधना करते थे. और उसी जल में उनकी साधना की ऊर्जा एकत्र रहती है, जिसका उपयोग वह लोगों को वरदान या श्राप देने में भी करते थे.

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विज्ञान की दृष्टि से देखें तो मानव शरीर में मुख्य रूप से पानी और कार्बनिक पदार्थ होते हैं. दाह संस्कार के दौरान तेज तापमान के कारण शरीर का पानी वाष्प के रूप में निकलता है और कार्बनिक पदार्थों का बड़ा हिस्सा कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प और अन्य गैसीय पदार्थों में परिवर्तित हो जाता है. शरीर के खनिज तत्व पूरी तरह गैस नहीं बनते. इनमें मुख्य रूप से कैल्शियम और फॉस्फोरस से जुड़े खनिज, कुछ मात्रा में पोटैशियम, सोडियम और अन्य खनिज राख में बचे रहते हैं.

दाह संस्कार के बाद राख और अस्थियों का महत्व रहता है. इन्हें एकत्र करके जल में विसर्जित करने की परंपरा बनी. वैज्ञानिक रूप से कहा जा सकता है कि जल इन अवशेषों को किसी जादुई तरीके से सिर्फ सोख नहीं लेता, बल्कि उनमें मौजूद कुछ घुलनशील खनिज पानी में घुल सकते हैं और अन्य कण तलछट में मिल सकते हैं. इस तरह पदार्थ धीरे-धीरे प्राकृतिक पर्यावरणीय चक्र का हिस्सा बनते हैं. इसी वजह से अंतिम संस्कार के बाद घर लौटकर स्नान करने का भी नियम है.

कैसे नदियों के पास बने श्मशान?
प्राचीन समय में अधिकांश नगर नदियों के किनारे बसे थे. नदी पीने के पानी, खेती, आवागमन और दैनिक जीवन का प्रमुख स्रोत थी. नदी के किनारे खुले क्षेत्र भी उपलब्ध होते थे. इसलिए वहां अंतिम संस्कार के लिए स्थान बनना व्यावहारिक था. समय के साथ ऐसे स्थानों पर घाट बनाए गए और वे धार्मिक-सामाजिक जीवन का हिस्सा बन गए.

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