Garud Puran: छोटे बच्चों का दाह संस्कार क्यों नहीं किया जाता है? गरुण पुराण में छिपा है रहस्य

Garud Puran: हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद शव को जलाने की परंपरा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि 2 साल तक की उम्र के बच्चों और नवजात शिशुओं की मृत्यु होने पर उन्हें जलाने के बजाय जमीन में क्यों दफनाया जाता है? जानते हैं कारण.

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गरुड़ पुराण (Photo: ITG) गरुड़ पुराण (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 09 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 1:12 PM IST

Garud Puran: हर घर में अपनी-अपनी परंपराएं और रीति-रिवाज होते हैं. हिंदू धर्म में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके शरीर का दाह संस्कार करने की परंपरा है. हालांकि, छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं के मामले में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया अलग मानी गई है. उनकी मृत्यु के बाद कई परंपराओं में शरीर को जलाने के बजाय जमीन में गड्ढा खोदकर दफनाने का विधान बताया गया है.

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आखिर ऐसा क्यों किया जाता है? नवजात शिशु की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा के साथ क्या होता है? क्या इतनी कम उम्र में मृत्यु होने पर बच्चे को भी यमलोक के कष्टों का सामना करना पड़ता है? और मृत शिशु की आत्मा की शांति के लिए माता-पिता को क्या करना चाहिए? इन सवालों का उल्लेख गरुड़ पुराण में मिलता है.

दो वर्ष तक के बच्चों को दफनाने का विधान

गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु और पक्षीराज गरुड़ के संवाद के माध्यम से मृत्यु और अंतिम संस्कार से जुड़े कई नियम बताए गए हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी स्त्री का गर्भपात हो जाए या जन्म के बाद दो वर्ष की आयु तक किसी बालक या बालिका की मृत्यु हो जाए, तो उसके शरीर को दफनाने का विधान बताया गया है. वहीं, दो वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों की मृत्यु होने पर दाह संस्कार करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है.

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बच्चों के लिए अंतिम संस्कार का नियम अलग क्यों?

गरुड़ पुराण की मान्यताओं के अनुसार, जन्म के शुरुआती वर्षों में बच्चा सांसारिक मोह-माया और कर्मों की समझ से दूर रहता है. जैसे-जैसे मनुष्य बड़ा होता है, उसका अपने शरीर, परिवार और संसार से लगाव बढ़ता जाता है.

इसी आधार पर धार्मिक मान्यता है कि बहुत कम उम्र में मृत्यु होने पर बच्चे की आत्मा का शरीर से वैसा मोह नहीं होता, जैसा किसी वयस्क व्यक्ति का माना जाता है. इसलिए छोटे बच्चों के लिए दाह संस्कार के बजाय दफनाने की परंपरा बताई गई है.

क्या बच्चों को भी यमलोक के कष्ट भोगने पड़ते हैं?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा को उसके कर्मों के आधार पर अलग-अलग लोकों की यात्रा करनी पड़ती है. लेकिन बहुत कम उम्र में मृत्यु होने वाले बच्चों के संबंध में नियम अलग बताए गए हैं.

गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, दो वर्ष से कम उम्र में मृत्यु होने पर बच्चे की आत्मा को सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होती है. ऐसी स्थिति में बच्चे को उसके कर्मों के आधार पर दंड मिलने की बात नहीं कही गई है, बल्कि उसकी कम आयु को महत्व दिया गया है.

मृत शिशु की आत्मा की शांति के लिए क्या करें?

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गरुड़ पुराण में मृत शिशु की आत्मा की शांति के लिए दान-पुण्य का महत्व बताया गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, बच्चे की मृत्यु के बाद उसके माता-पिता को बच्चे की आयु के अनुसार दूध का दान करना चाहिए.

मान्यता है कि यदि शिशु जितने महीने का था, उतने बच्चों को दूध पिलाया जाए तो इससे मृत आत्मा को शांति मिलती है. हालांकि, अलग-अलग परंपराओं और क्षेत्रों में इन नियमों का पालन अलग तरीके से किया जाता है.

छोटे बच्चों का श्राद्ध क्यों नहीं किया जाता?

हिंदू धार्मिक परंपराओं में छोटे बच्चों के श्राद्ध को लेकर अलग नियम बताए गए हैं. मान्यता के अनुसार, श्राद्ध और उससे जुड़ी कुछ विशेष क्रियाएं उन लोगों के लिए होती हैं जिनके संस्कार जैसे मुंडन या उपनयन आदि संपन्न हो चुके हों. इसी कारण बहुत कम उम्र में मृत्यु होने वाले बच्चों के लिए सामान्य वयस्कों की तरह श्राद्ध कर्म करने की परंपरा नहीं मानी जाती.

अलग-अलग उम्र के बच्चों के लिए अलग नियम

गरुड़ पुराण के दसवें अध्याय से जुड़ी मान्यताओं में बच्चों की अलग-अलग अवस्थाओं के अनुसार अंतिम संस्कार और दान की विधियों का उल्लेख मिलता है. गर्भ में ही भ्रूण के नष्ट होने की स्थिति में किसी विशेष क्रिया का विधान नहीं बताया गया है. वहीं, दांत निकलने से पहले की अवस्था में बच्चे की मृत्यु होने पर दूध का दान करने की बात कही गई है.

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बाल अवस्था में मृत्यु होने पर जल से भरे घड़े का दान और खीर का भोजन कराने की परंपरा का उल्लेख मिलता है. वहीं, कुमार अवस्था में मृत्यु होने पर उसी आयु के बच्चों और ब्राह्मणों को भोजन कराने की बात कही गई है.

पांच वर्ष या उससे अधिक उम्र के बच्चे की मृत्यु होने पर पायस यानी खीर और गुड़ से बने पिंडों का दान करने का उल्लेख मिलता है.

बच्चों के लिए स्वर्ग का द्वार खुलने की मान्यता

धार्मिक कथाओं में बच्चों की मासूमियत और निष्कपटता को विशेष महत्व दिया गया है. एक लोककथा के अनुसार, एक बालक की मृत्यु के बाद भगवान विष्णु के आदेश से उसके लिए स्वर्ग का द्वार खोल दिया गया.

लेकिन वह बालक अपने माता-पिता को छोड़कर स्वर्ग जाने के लिए तैयार नहीं था. तब भगवान विष्णु ने उसकी भावना को देखते हुए उसके माता-पिता के अपराधों को क्षमा कर दिया और उन्हें भी स्वर्ग में स्थान प्रदान किया. यह कथा धार्मिक लोकमान्यता के रूप में कही जाती है और बच्चों के प्रति भगवान की करुणा तथा उनकी निष्कपटता को दर्शाती है.

मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए क्या जरूरी है?

हिंदू धर्म में मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि आत्मा की एक यात्रा का पड़ाव माना गया है. गरुड़ पुराण में भी मृत्यु, कर्म, आत्मा और परलोक से जुड़े अनेक विषयों का वर्णन मिलता है. छोटे बच्चों की मृत्यु के मामले में अंतिम संस्कार और धार्मिक क्रियाओं के नियम वयस्कों से अलग बताए गए हैं. हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों, संप्रदायों और परिवारों में इन परंपराओं का पालन अलग तरीके से किया जाता है. इसलिए किसी विशेष परिस्थिति में परिवार की परंपरा और संबंधित धर्माचार्य की सलाह को महत्व दिया जाता है.

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