भगवान राम के स्वागत में अयोध्या में कैसे मनाई गई थी पहली दिवाली? जानें पूरी कथा

First Diwali in Ayodhya: 14 साल का वनवास पूरा करने के बाद जब भगवान राम माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, तो उनके स्वागत में पूरी नगरी को दीपों से सजाया गया था. जानें पहली दिवाली मनाने की यह धार्मिक मान्यता और पूरी कहानी.

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पहली दिवाली की कथा (Photo: ITG) पहली दिवाली की कथा (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:32 PM IST

First Diwali in Ayodhya: दिवाली का नाम आते ही सबसे पहले अयोध्या की तस्वीर आंखों के सामने आती है. वही अयोध्या, जहां भगवान श्रीराम ने 14 साल का वनवास पूरा करने के बाद कदम रखा था. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम के लौटने की खुशी में पूरी नगरी को दीपों से रोशन किया गया था. घरों की चौखट से लेकर गलियों और राजमहल तक हर तरफ दीपक जलाए गए थे. लोगों ने अपने प्रिय राजा के स्वागत में कोई कमी नहीं छोड़ी थी. चारों तरफ उत्सव और खुशियों का माहौल था.

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आज भी दिवाली पर दीप जलाने की परंपरा को भगवान राम की अयोध्या वापसी से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर 14 साल बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे थे, तब वहां कैसा माहौल था? किस तरह नगरवासियों ने उनका स्वागत किया था और दिवाली मनाने की परंपरा कैसे शुरू हुई? आइए जानते हैं भगवान राम के वनवास से लौटने और अयोध्या में दीपोत्सव मनाने की पूरी कथा.

क्यों जाना पड़ा था भगवान राम को 14 साल का वनवास?

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम अयोध्या के राजा दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे. राजा दशरथ उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे और उनके राज्याभिषेक की तैयारियां भी शुरू हो चुकी थीं. पूरी अयोध्या में उत्सव का माहौल था. प्रजा अपने प्रिय राम को राजा बनते देखने के लिए उत्साहित थी. लेकिन तभी कहानी में एक बड़ा मोड़ आया. रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने दो पुराने वरदान मांगे. उन्होंने पहला वरदान भरत के लिए अयोध्या का राजसिंहासन और दूसरा भगवान राम के लिए 14 साल का वनवास मांगा.

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राजा दशरथ के लिए यह फैसला बेहद दुखद था, लेकिन वे अपने वचन से बंधे हुए थे. भगवान राम ने भी पिता की आज्ञा और उनके वचन का मान रखने के लिए बिना किसी विरोध के वन जाने का निर्णय लिया. माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी उनके साथ वनवास पर चले गए.

वनवास के दौरान हुआ माता सीता का हरण

भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण ने वनवास के दौरान कई कठिन परिस्थितियों का सामना किया. इसी बीच लंकापति रावण ने छल से माता सीता का हरण कर लिया और उन्हें लंका ले गया. माता सीता की तलाश में भगवान राम की मुलाकात हनुमान जी और सुग्रीव से हुई. इसके बाद हनुमान जी ने समुद्र पार करके लंका पहुंचने का रास्ता खोजा और माता सीता का पता लगाया. उन्होंने भगवान राम को माता सीता के लंका में होने की जानकारी दी.

माता सीता को रावण के बंधन से मुक्त कराने के लिए भगवान राम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की. इसके बाद भगवान राम और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ. अंत में भगवान राम ने रावण का वध कर दिया और माता सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया. इस तरह 14 साल के वनवास के दौरान भगवान राम ने न केवल कई कठिनाइयों का सामना किया, बल्कि अधर्म पर धर्म की जीत का संदेश भी दिया.

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पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे थे भगवान राम

रावण का वध करने के बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने का समय आ गया था. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम माता सीता और लक्ष्मण के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या के लिए रवाना हुए थे. इधर अयोध्या में भरत अपने बड़े भाई की वापसी का इंतजार कर रहे थे. भगवान राम के वनवास जाने के बाद भरत ने राजसिंहासन स्वीकार नहीं किया था. उन्होंने भगवान राम की चरण पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर राज्य का संचालन किया था.

भरत ने संकल्प लिया था कि 14 साल का वनवास पूरा होते ही वे भगवान राम को उनका राज्य वापस सौंप देंगे. इसलिए जैसे-जैसे उनके लौटने का समय नजदीक आ रहा था, अयोध्या में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी. जब भगवान राम के लौटने की खबर अयोध्या पहुंची तो नगरवासियों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. हर कोई अपने प्रिय राम, माता सीता और लक्ष्मण के स्वागत की तैयारियों में जुट गया.

दीप जलाकर सजाई गई थी पूरी अयोध्या

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम के स्वागत के लिए पूरी अयोध्या को दुल्हन की तरह सजाया गया था. लोगों ने अपने घरों की सफाई की और दरवाजों पर फूलों से सजावट की. घरों की चौखट, गलियों और रास्तों पर मिट्टी के दीपक जलाए गए. कहा जाता है कि भगवान राम के स्वागत में पूरी नगरी दीपों की रोशनी से जगमगा उठी थी. हर घर में खुशी थी और लोग अपने राजा की एक झलक पाने के लिए उत्साहित थे. नगरवासियों ने फूलों और दीपों से भगवान राम के आने का रास्ता सजाया था.

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इस दिन अयोध्या में किसी बड़े त्योहार जैसा माहौल था. लोगों के लिए यह सिर्फ उनके राजा की वापसी नहीं थी, बल्कि 14 साल के लंबे इंतजार के खत्म होने की खुशी भी थी. भगवान राम को देखकर नगरवासियों का उत्साह और बढ़ गया. इसी घटना को दिवाली मनाने की परंपरा से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि भगवान राम की अयोध्या वापसी की खुशी में लोगों ने दीप जलाए थे. तभी से दीप जलाकर इस दिन को मनाने की परंपरा चली आ रही है.

अयोध्या लौटने के बाद हुआ भगवान राम का राज्याभिषेक

भगवान राम के अयोध्या पहुंचने के बाद उनका भव्य स्वागत किया गया. इसके बाद उनका राज्याभिषेक हुआ और उन्हें अयोध्या का राजा बनाया गया. इस तरह 14 साल बाद भगवान राम ने एक बार फिर अयोध्या की राजगद्दी संभाली. भगवान राम के शासनकाल को रामराज्य के नाम से जाना जाता है. धार्मिक मान्यताओं में रामराज्य को न्याय, शांति, समानता और खुशहाली का प्रतीक माना गया है. कहा जाता है कि उनके शासन में प्रजा सुखी थी और सभी को न्याय मिलता था.

दिवाली पर क्यों जलाए जाते हैं दीपक?

दिवाली पर दीपक जलाने का संबंध भगवान राम की अयोध्या वापसी से माना जाता है. इस दिन लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, रंगोली बनाते हैं और शाम को दीप जलाते हैं. घरों को रोशनी से सजाया जाता है और माता लक्ष्मी तथा भगवान गणेश की पूजा की जाती है.

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आज भी अयोध्या में दिवाली के अवसर पर भव्य दीपोत्सव मनाया जाता है. सरयू नदी के घाटों और शहर के अलग-अलग हिस्सों में लाखों दीप जलाए जाते हैं. इस तरह हर साल दिवाली पर भगवान राम की अयोध्या वापसी की खुशी को दोबारा याद किया जाता है.

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