इस बार पंचदिवसीय दीपोत्सव 6 नवंबर से 11 नवंबर को मनाया जाएगा. दीपों के इस पर्व में छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली भी मनाई जाती है. हालांकि इस बार छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली की तारीख को लेकर लोगों के बीच बड़ा कन्फ्यूजन है. इसकी वजह चतुर्दशी और अमावस्या तिथि का एक ही दिन पड़ना है. छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी और रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है. जबकि बड़ी दीवाली कार्तिक अमावस्या की रात को मनाई जाती है. ऐसे में सवाल ये है कि छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली एक ही दिन रहेगी या अलग-अलग. आइए जानते हैं.
छोटी दिवाली 2026 कब है?
ज्योतिषाचार्य पंडित अरुणेश कुमार शर्मा के अनुसार, इस वर्ष कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर को सुबह 10:47 बजे से लेकर 8 नवंबर को सुबह 11:27 बजे तक रहेगी. इसके बाद अमावस्या तिथि शुरू हो जाएगी. छोटी दिवाली पर सूर्योदय से पहले स्नान करने की परंपरा है. इसे अभ्यग स्नान भी कहा जाता है. यह स्नान चतुर्दशी तिथि और उदयकालीन संयोग में किया जाता है. और यह संयोग 8 नवंबर की सुबह बन रहा है. इसलिए नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली 8 नवंबर को ही मनाई जाएगी.
कब है बड़ी दिवाली 2026?
दीपावली का पावन पर्व अमावस्या तिथि को मनाने का विधान है. इस साल कार्तिक अमावस्या तिथि 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 27 मिनट से लेकर 9 नवंबर को दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहने वाली है. ज्योतिषविद ने बताया कि अमावस्या तिथि पर प्रदोष काल के संयोग में दीपावली मनाई जाती है. और यह संयोग 8 नवंबर को प्रदोष काल में रहने वाला है. इसलिए बड़ी दिवाली का त्योहार भी 8 नवंबर को मनाया जाएगा. यानी इस बार बड़ी और छोटी दिवाली दोनों 8 नवंबर दिन रविवार को ही मनाई जाएगी.
दिवाली पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
दिवाली की पूजा प्रदोष काल में करना सबसे शुभ माना जाता है. इस साल 8 नवंबर को प्रदोष काल शाम 5 बजकर 54 मिनट से लेकर शाम 7 बजकर 50 मिनट तक रहने वाला है. यानी लक्ष्मी गणेश पूजन के लिए आपको करीब 1 घंटा 54 मिनट का समय मिलेगा.
दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा कैसे करें?
दीपावली की रात माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है. पंडित जी के अनुसार, पूजा के लिए सबसे पहले एक चौकी या बाजोट पर लाल कपड़ा बिछाएं. इसके बाद चावल की मदद से उस पर स्वस्तिक बनाएं और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें. माता लक्ष्मी को विराजमान करने के लिए चावल से अष्टदल कमल बनाएं. इसके बाद उस पर माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें. पूजा स्थल पर कुबेर जी को भी स्थान दें. घर में मौजूद सोने-चांदी के पुराने आभूषण और अन्य कीमती वस्तुओं को साफ करके पूजा में शामिल किया जा सकता है.
इसके अलावा हाथ में दीपक धारण करने वाली दो ग्वालिनों की प्रतिमाएं स्थापित करने की भी परंपरा बताई गई है. सभी प्रतिमाओं की स्थापना के बाद गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें. अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार फल, मिठाई, खील-बताशे और अन्य पूजन सामग्री चढ़ाएं. इसके बाद विधिपूर्वक आरती करें.
अरुणेश कुमार शर्मा