6 नवंबर को धनतेरस का त्योहार मनाया जाएगा. इस दिन धन के देवता कुबेर महाराज की पूजा का विधान बताया गया है. शास्त्रों में कुबेर को देवताओं के खजाने का संरक्षक माना गया है. क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान कुबेर का छोटा कद और बड़ा पेट क्यों है और इनकी इस आकृति के पीछे कौन से रहस्य छिपे हैं. ज्योतिषविद कहते हैं कि कुबेर के प्रतीकों में धन की व्यवस्था का पूरा गणित छिपा है. बहुत सारे बड़े व्यापारी और कारोबारी इसे अच्छी समझते हैं और तभी उनके पास कभी धन का अकाल नहीं रहता है.
कुबेर के बड़े पेट का रहस्य
ज्योतिषविद कहते हैं कि कुबेर का बड़े पेट धन के संचय यानी पैसों को जोड़कर रखने का प्रतीक है. जो लोग यह बात अच्छी तरह समझते हैं, वो सिर्फ पैसा कमाते नहीं, बल्कि उसे जोड़कर रखने में माहिर भी होते हैं. बड़े से बड़े संकट में भी इनकी तिजोरी या जेब खाली नहीं होती है. ऐसे लोग हमेशा अपने लिए सर्वावाइल मनी का इंतजाम रखते हैं. फिर पैसा पैसे को खींचता है. यानी समय के साथ एकत्रित किया गया वही पैसा कम्पाउंडिग से और ज्यादा धन-संपत्ति बनाता है. कुबेर के इस प्रतीकात्मक रहस्य को समझें और इस धनतेरस पर धन के संचय का संकल्प जरूर लें.
क्या कहता है कुबेर का छोटा कद?
भगवान कुबेर का छोटा कद और साधारण स्वरूप भी अपने अंदर बहुत बड़ा रहस्य छिपाकर बैठा है. कुबेर का यह प्रतीक बताता है कि असली अमीर आदमी संपत्ति दिखाने से ज्यादा संपत्ति बनाने पर ध्यान देता है. ऐसे लोग दिखने में भले ही साधारण से हों, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर वह अपने आस-पास मौजूद कई लोगों से ज्यादा ताकतवर होते हैं. आपने भी ऐसे कई लोगों को देखा होगा जिनकी साधारण कद-काठी से उनकी मजबूत आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है.
क्यों मनाया जाता है धनतेरस?
धनतेरस का पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है. धनतेरस पर पूजा-पाठ और उपाय करने से धन संबंधी बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है. मान्यता है कि इसी दिन समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे. भगवान धन्वंतरि को देवताओं का वैद्य माना जाता है. इसलिए इस दिन अच्छे स्वास्थ्य और आरोग्य की कामना से उनकी पूजा की जाती है. धनतेरस को भगवान कुबेर की उपासना का दिन भी माना गया है. इस दिन धन, समृद्धि और संपन्नता के लिए कुबेर देव की पूजा होती है. इस पर्व पर सोने-चांदी के आभूषण और नए बर्तन खरीदने की परंपरा है.
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