25 जुलाई को देवशयनी एकादशी से चातुर्मास आरंभ हो जाएगा, जो कि 20 नवंबर तक जारी रहेगा. चातुर्मास में सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में रहेंगे. यह कुल 119 दिन की अवधि होगी, जिसमें कोई शुभ या मांगलिक कार्य संपन्न नहीं किए जाएंगे. इस अवधि में शादी-विवाह करना भी वर्जित माना गया है. हालांकि चातुर्मास में कई बड़े व्रत-त्योहारों की दस्तक होने वाली है. आइए आपको चातुर्मास में आने वाले 15 बड़े व्रत-त्योहारों की जानकारी देते हैं.
25 जुलाई- देवशयनी एकादशी
देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं. इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है. इस दिन भक्त उपवास रखकर विष्णु भगवान की आराधना करते हैं.
29 जुलाई- गुरु पूर्णिमा
गुरु पूर्णिमा ज्ञान, संस्कार और गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित पावन पर्व है. इस दिन गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है और उनसे आशीर्वाद लिया जाता है. आध्यात्मिक उन्नति और शिक्षा के क्षेत्र में यह दिन विशेष महत्व रखता है.
30 जुलाई- सावन माह शुरुआत
सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति का सबसे पवित्र समय माना जाता है. इस पूरे महीने शिवलिंग पर जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, बेलपत्र अर्पित करने और सोमवार व्रत का विशेष महत्व बताया गया है.
28 अगस्त- रक्षाबंधन
रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक पर्व है. इस दिन बहनें भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और उसके लिए सुख-समृद्धि की कामना करती हैं. जबकि भाई बदले में उसे जीवन भर रक्षा करने का वचन देता है.
4 सितंबर- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है. इस दिन भक्त उपवास रखते हैं. भजन-कीर्तन कीर्तन करते हैं. यह पर्व धर्म, प्रेम, भक्ति और सत्य की विजय का संदेश देता है.
8 सितंबर- पितृपक्ष आरंभ
पितृपक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का पवित्र पक्ष माना जाता है. इस अवधि में तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं. मान्यता है कि इससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है.
14 सितंबर- गणेश चतुर्थी
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के प्राकट्य उत्सव का पर्व है. इस दिन घरों और पंडालों में गणपति की स्थापना कर विधिपूर्वक पूजा की जाती है. भक्त विघ्नहर्ता से बुद्धि, समृद्धि और सफलता की कामना करते हैं तथा मोदक का भोग लगाते हैं.
14 सितंबर- हरतालिका तीज
हरतालिका तीज मुख्य रूप से सुहागिन और अविवाहित महिलाओं का महत्वपूर्ण व्रत है. इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है. महिलाएं अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और मनचाहे वर की प्राप्ति की प्रार्थना करती हैं.
11 अक्टूबर- नवरात्र आरंभ
शारदीय नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधिपूर्वक पूजा की जाती है. श्रद्धालु व्रत रखते हैं, कलश स्थापना करते हैं और शक्ति की उपासना करते हैं. यह पर्व नकारात्मकता पर सकारात्मक ऊर्जा की विजय का प्रतीक माना जाता है.
20 अक्टूबर- विजयादशमी
विजयादशमी या दशहरा सत्य, धर्म और न्याय की विजय का पर्व है. इस दिन भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का स्मरण किया जाता है. देशभर में रावण दहन के साथ बुराई छोड़कर सदाचार अपनाने का संदेश दिया जाता है.
25 अक्टूबर- शरद पूर्णिमा
शरद पूर्णिमा को वर्ष की सबसे उज्ज्वल पूर्णिमा माना जाता है. मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की शीतल किरणों का विशेष महत्व होता है. भक्त खीर बनाकर चांदनी में रखते हैं और देवी लक्ष्मी तथा चंद्रदेव की आराधना करते हैं.
29 अक्टूबर- करवा चौथ
करवा चौथ सुहागिन महिलाओं का प्रमुख व्रत है. महिलाएं सूर्योदय से चंद्र दर्शन तक निर्जला व्रत रखती हैं और पति की लंबी आयु, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं. शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है.
6 नवंबर- धनतेरस
धनतेरस दीपोत्सव का पहला प्रमुख पर्व माना जाता है. इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर की पूजा की जाती है. शुभ मुहूर्त में बर्तन, सोना-चांदी या अन्य उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
8 नवंबर- दीपावली
दीपावली रोशनी, खुशहाली और नए आरंभ का सबसे बड़ा भारतीय पर्व है. इस दिन घरों में दीप जलाए जाते हैं, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है. परिवार एक साथ मिलकर उत्सव मनाता है और सुख-समृद्धि की कामना करता है.
20 नवंबर- देवउठनी एकादशी
देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं. इसके साथ ही चातुर्मास समाप्त होता है और विवाह सहित सभी मांगलिक कार्यों की शुरुआत मानी जाती है. इस दिन तुलसी-शालिग्राम विवाह और विशेष विष्णु पूजा का भी विधान है.
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