गुजरात के सूरत में तापी नदी के किनारे स्थित चार धाम मंदिर में बरगद का एक ऐसा पौधा है, जो अपनी अनोखी विशेषता के चलते श्रद्धालुओं का ध्यान खींच रहा है. इस पौधे पर हमेशा सिर्फ 3 पत्ते ही रहते हैं और इसे त्रिदेव का प्रतीक माना जाता है. इस पौधे की सबसे रहस्यमयी बात यह है कि इसमें कभी भी चौथा पत्ता नहीं उगता है. मान्यता है कि जैसे ही कोई नया पत्ता निकलता है. उसी समय पुराना एक पत्ता खुद-ब-खुद झड़ जाता है. इस तरह पौधे पर गिनती हमेशा तीन ही रहती है. भक्तगण इन तीन पत्तों को साक्षात ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप मानते हैं. दूर-दूर से लोग यहां आकर मन्नत मांगते हैं और पत्तों की पूजा करते हैं. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह पौधा कोई नया नहीं है. ऐसा दावा है कि यह द्वापर युग यानी महाभारत काल से इसी स्थान पर है.
वटवृक्ष से जुड़ी कथा क्या है?
इस वटवृक्ष के पीछे महाभारत की एक बहुत प्रसिद्ध कथा जुड़ी हुई है. कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद जब दानवीर कर्ण मृत्यु शय्या पर थे, तब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से अंतिम इच्छा जताई थी. कर्ण ने कहा था कि उनका अंतिम संस्कार ऐसी ‘कुंवारी भूमि’ पर किया जाए, जहां आज तक किसी का दाह संस्कार न हुआ हो और न ही कोई पाप हुआ हो. इस पवित्र भूमि की तलाश में भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र से ध्यान लगाया. ध्यान में उन्हें तापी नदी का तट दिखाई दिया, जो आज के सूरत शहर में है. यह भूमि पूरी तरह निष्कलंक और पवित्र थी.
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण और पांडव इसी स्थान पर आए और यहीं पर दानवीर कर्ण का अंतिम संस्कार संपन्न किया. मान्यता है कि जिस पवित्र स्थान पर कर्ण की चिता को अग्नि दी गई थी. उसी भूमि पर यह तीन पत्तों वाला वटवृक्ष उगा था. तब से लेकर आज तक यह पौधा इसी रूप में यहां मौजूद है. अपनी इसी अनूठी विशेषता और पौराणिक महत्व के कारण यह स्थान सालभर श्रद्धालुओं से भरा रहता है. अश्विनी कुमार क्षेत्र स्थित इस चार धाम मंदिर में दर्शन के साथ-साथ भक्त इस चमत्कारी वटवृक्ष को देखने भी आते हैं. स्थानीय लोग इसे तापी नदी का चमत्कार और सूरत की धार्मिक पहचान बताते हैं.
मंदिर के महंत विजय दास यहां लंबे समय से सेवा कर रहे हैं. उन्होंने बातया कि इस स्थान का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है. युद्ध के दौरान जब कर्ण मृत्यु की कगार पर थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने एक साधु का वेश धारण कर उनसे भिक्षा मांगी. कर्ण ने उन्हें अपना सोने का दांत भेंट किया था. उनकी भक्ति और दानवीरता से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान मांगने को कहा. कर्ण ने निवेदन किया कि उनका जन्म एक अविवाहित माता के गर्भ से हुआ है. इसलिए उनका अंतिम संस्कार किसी कुंवारी भूमि (अछूते स्थान) पर ही किया जाए. इसलिए इस स्थान पर कर्ण का अंतिम संस्कार किया गया था.
जब पांडवों ने इस स्थान के महत्व के बारे में पूछा, तब एक आकाशवाणी हुई कि सूर्य देव कर्ण के पिता हैं. यही कारण है कि यह शहर जिसे पहले सूर्यपुर कहा जाता था, आगे चलकर सूरत के नाम से जाना गया. अश्विनी कुमार जिनके नाम पर यह तपोभूमि है, कर्ण के भाई हैं. और सूर्य पुत्री मां तापी भी यहां प्रवाहित हैं. इसे एक अमर प्रमाण के रूप में स्थापित करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने इस तीन पत्तों वाले वटवृक्ष (बरगद) के पौधे की स्थापना की थी, जो त्रिदेव-ब्रह्मा-विष्णु-महेश का प्रतीक है.
संजय सिंह राठौर