Radhashtami 2026: कल या परसों, कब मनाई जाएगी राधाष्टमी? नोट करें सही तिथि और पूजन का शुभ मुहूर्त

Radhashtami 2026: कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था और इसी तिथि की शुक्ल पक्ष में राधारानी का जन्म हुआ था. राधाष्टमी का पर्व कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 15 दिन बाद मनाया जाता है. हर वर्ष राधाष्टमी का पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधाष्टमी का पर्व मनाया जाता है.

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राधा अष्टमी 2026 (Photo: ITG) राधा अष्टमी 2026 (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 17 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 6:00 AM IST

Radhashtami 2026: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी मनाई जाती है. यह पर्व जन्माष्टमी के करीब 15 दिन बाद आता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राधा रानी की पूजा के बिना जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा और व्रत का फल अधूरा माना जाता है. राधा रानी को श्रीकृष्ण की परम प्रिय माना जाता है और उन्हें देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी माना गया है. मान्यता है कि राधा अष्टमी के दिन विधि-विधान से राधा-कृष्ण की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है.

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आइए जानते हैं इस साल राधा अष्टमी कब मनाई जाएगी, पूजा का शुभ समय क्या है और इस दिन राधा रानी की पूजा करने का क्या महत्व है.

राधा अष्टमी 2026 तिथि (Radhashtami 2026 Tithi)

द्रिक पंचांग के अनुसार, राधाष्टमी की तिथि 18 सितंबर को दोपहर 1 बजे शुरू होगी और तिथि का समापन 19 सितंबर को दोपहर 3 बजकर 26 मिनट पर होगा. यानी राधा अष्टमी 19 सितंबर को ही मनाई जाएगी.

राधा अष्टमी का पूजन दिन के मध्यान्ह समय होता है, जिसका मुहूर्त 19 सितंबर को सुबह 11 बजकर 1 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 28 मिनट तक रहेगा.

कब मनाई जाती है राधा अष्टमी?

पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जाता है. इस दिन राधा रानी की पूजा विशेष रूप से दोपहर के समय करने की परंपरा है.

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धार्मिक मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में इसी तिथि पर देवी राधा ने पृथ्वी पर अवतार लिया था. इसलिए राधा भक्तों के लिए यह दिन बेहद खास माना जाता है.

कैसे हुआ था राधा रानी का जन्म?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राधा रानी का जन्म बरसाना में वृषभानु जी और उनकी पत्नी कीर्ति के घर हुआ था. कहा जाता है कि पूर्व जन्म में वृषभानु और कीर्ति ने संतान प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की थी.

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर राधा के रूप में अवतार लिया. इसलिए राधा अष्टमी को राधा रानी के प्राकट्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है.

राधा अष्टमी के व्रत का क्या महत्व है?

शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं में राधा अष्टमी के व्रत को विशेष फलदायी बताया गया है. मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ राधा रानी का व्रत और पूजन करता है, उसे राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है.

कहा जाता है कि राधा अष्टमी का व्रत भक्त को वही आध्यात्मिक फल प्रदान करता है, जिसकी तुलना श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के व्रत से की जाती है.

राधा रानी की पूजा से घर में आती है समृद्धि

धार्मिक मान्यता है कि जिस घर में राधा रानी और श्रीकृष्ण की नियमित पूजा होती है, वहां सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है. राधा रानी को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना जाने के कारण उनकी पूजा से धन, वैभव, सौभाग्य और संपत्ति में वृद्धि होने की मान्यता है.

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मान्यता यह भी है कि राधा रानी की भक्ति करने वाले भक्तों पर श्रीकृष्ण की कृपा भी बनी रहती है. यही वजह है कि राधा अष्टमी के दिन मंदिरों और घरों में राधा-कृष्ण का विशेष पूजन किया जाता है. इस दिन भक्त राधा रानी को नए वस्त्र, श्रृंगार की सामग्री, फूल और भोग अर्पित करते हैं. इसके बाद आरती और भजन-कीर्तन किया जाता है. माना जाता है कि सच्ची श्रद्धा से की गई राधा रानी की उपासना से घर में सुख, शांति, धन-धान्य और सौभाग्य की वृद्धि होती है.

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