तृणमूल की ‘टूट' बीजेपी के लिए बंगाल से ज्यादा दिल्ली में फायदेमंद

जरूरी नहीं कि तृणमूल कांग्रेस का उभरता संकट पश्चिम बंगाल तक ही सीमित हो, माना जा रहा है कि यह राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है, और क्षेत्रीय राजनीति के घटनाक्रम संसद की गणित तक बदल सकता है. महिला बिल पर नंबर के वजह से चूक गई बीजेपी के हाथ भी बाजी लग सकती है.

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तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी. (Photo: PTI) तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 04 जून 2026,
  • अपडेटेड 1:42 PM IST

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के महीने भर के भीतर ही तृणमूल कांग्रेस टूट गई. ममता बनर्जी चुपचाप उद्धव ठाकरे और शरद पवार की तरह मन मसोस कर रह गई होंगी. कुछ हद तक अरविंद केजरीवाल की तरह भी. उद्धव ठाकरे और शरद पवार को अपने अपने विधायकों की बगावत के कारण पार्टी का नाम और चुनाव निशान तक गंवाने पड़े. अब ममता बनर्जी की राजनीति भी बर्बादी के उसी मोड़ पर पहुंच चुकी है. अरविंद केजरीवाल निश्चित रूप से राज्यसभा में अपने 10 में से 7 सांसद गंवा चुके हैं, लेकिन अगले ही साल पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 आम आदमी पार्टी को एक मौका देने वाला है. 

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बंगाल में फिलहाल जो कुछ भी हो रहा है, उसमें ममता बनर्जी का सीधा नुकसान नजर आ रहा है. लेकिन, सवाल है कि बंगाल में बीजेपी को इससे क्या फायदा होने वाला है? बीजेपी के पास तो पहले से ही बहुमत है. बीजेपी के सामने न तो पार्टी टूटने का खतरा है, न ही पश्चिम बंगाल में विपक्ष ऐसी स्थिति में है जो जोड़ तोड़ करके तख्तापलट कर सके.

अगर पेट पूरी तरह भरा हो. और, सामने कोई छप्पन भोग भी परोस दे, तो उसका कोई मतलब नहीं होता. फिर भी थाली सजाकर कुछ मिल रहा हो, तो क्या कहने. बंगाल में तो बीजेपी के साथ ऐसा ही है. हां, एक बात जरूर है कि विधानसभा में विरोध की कोई आवाज नहीं बचेगी. अगर कुछ लोग शोर भी मचाते हैं, तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. 

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तो क्या ममता बनर्जी की पार्टी टूट जाने से बीजेपी को कोई फायदा नहीं हो रहा है? बिल्कुल हो रहा है, लेकिन बंगाल में नहीं बल्कि दिल्ली में. लोकसभा में फायदा हो सकता है, अगर सब कुछ बीजेपी के फेवर में होता है. 

दिल्ली में बंगाल इफेक्ट

ममता बनर्जी के लिए फिलहाल यह समझ पाना मुश्किल हो रहा होगा कि बड़ा झटका शुभेंदु अधिकारी ने दिया है, या ऋतब्रत बनर्जी ने. शुभेंदु अधिकारी ने अगर ममता बनर्जी से सत्ता छीन ली है, तो ऋतब्रत बनर्जी ने पार्टी पर ही कब्जा जमा लिया है. ऋतब्रत बनर्जी पहले सीपीआई(एम) में थे, और 2018 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे. ममता बनर्जी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण ऋतब्रत बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस से निकाल दिया था, लेकिन उनका दावा था कि टीएमसी के ज्यादातर विधायक उनके सपोर्ट में हैं. अब तो पश्चिम बंगाल विधानसभा स्पीकर ने भी ऋतब्रत बनर्जी को 58 विधायकों के नेता के रूप में मान्यता दे दी है. 

रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी नेताओं का मानना है कि बंगाल में टीएमसी की टूट का सीधा असर दिल्ली में देखने को मिल सकता है. अब लोकसभा में भी टीएमसी सांसद बंगाल के विधायकों की तरह ही अलग गुट बना सकते हैं. अगर ऐसा होता है, तो स्पीकर से मान्यता भी बंगाल की तरह ही मिल सकती है. असर यह होगा कि एनडीए का सपोर्ट बेस बढ़ जाएगा, जिसकी बीजेपी को शिद्दत से जरूरत है. खासकर, विधानसभा चुनावों के दौरान संसद में पेश महिला आरक्षण संशोधन बिल और परिसीमन बिल के गिर जाने के बाद. 

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विधानसभा चुनावों के दौरान अप्रैल में जब ये विधेयक लोकसभा में पेश किए गए थे, INDIA ब्लॉक ने एकजुट होकर उसके खिलाफ वोट किया था. कांग्रेस के नेतृत्व में डीएमके और टीएमसी सहित विपक्ष के 230 सदस्यों ने विरोध किया था. एनडीए के पास 298 सांसदों का ही समर्थन था, लिहाजा बीजेपी को शिकस्त झेलनी पड़ी थी. क्योंकि, ऐसे विधेयकों के लिए सत्ता पक्ष को दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. 

अब अगर टीएमसी सांसदों का भी लोकसभा में वैसा ही गुट खड़ा हो जाता है, जैसा पश्चिम बंगाल विधानसभा में हुआ है, तो एनडीए और मजबूत हो सकता है. ऐसा भी नहीं कि तृणमूल कांग्रेस के सभी सांसदों के साथ हो जाने के बाद एनडीए को दो-तिहाई बहुमत हासिल हो जाएगा. जरूरत तो अभी और भी पड़ेगी. 

एनडीए को दो-तिहाई बहुमत कैसे मिलेगा

2024 के आम चुनाव में बीजेपी ने 'अबकी बार, 400 पार' का नारा दिया था, लेकिन अपने बूते बहुमत भी न हासिल कर सकी. कहा जाता है कि केंद्र की एनडीए सरकार चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और नीतीश कुमार की जेडीयू की बैसाखी पर खड़ी है. बीच बीच में ऐसी आशंका भी जताई जाती रही है कि अगर दोनों में से किसी ने समर्थन वापस ले लिया, तो क्या होगा? टीएमसी की टूट बीजेपी को ऐसे हालात से उबारने के काम आ सकती है. 

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जब लोकसभा में 131वां संविधान संशोधन विधेयक लाया गया था, बीजेपी को 352 सदस्यों के वोट की जरूरत थी, लेकिन उसके पास 298 ही थे. महिला आरक्षण संशोधन बिल और परिसीमन विधेयक 39 सदस्यों वाली संयुक्त संसदीय समिति के पास पेंडिंग है. समिति के अध्यक्ष बीजेपी के ही पीपी चौधरी हैं. 

ये विधेयक पास होने पर ही 2029 के लोकसभा चुनाव से महिला आरक्षण कानून लागू किया जा सकता है. कानून लागू होने पर लोकसभा की सदस्य संख्या 545 से बढ़कर 850 हो जाएगी. और, इस तरह बीजेपी सरकार के लिए 'वन नेशन, वन इलेक्शन' बिल पास कराना भी आसान हो जाएगा - लेकिन ये उपलब्धियां हासिल करने की राह अभी काफी मुश्किल है, क्योंकि टीएमसी के संभावित बागी सांसदों के अलावा भी सदस्यों की जरूरत होगी. 

बीजेपी नेताओं से बातचीत के आधार पर आई इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी से अलग होने वाले सांसद अलग ग्रुप बना सकते हैं, और बीजेपी को अपने महत्वाकांक्षी बिल पास कराने के लिए जरूरी नंबर जुटाने में उनका सपोर्ट फायदा पहुंचा सकता है. 

बातचीत में बीजेपी के एक नेता का कहना था, जैसा शिवसेना, एनसीपी और आम आदमी पार्टी के साथ हुआ, संसद में वैसा ही एक ग्रुप बीजेपी के साथ रहेगा... ऐसा हुआ तो 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से हमारे ऊपर लगा दाग भी मिट जाएगा. आम आदमी पार्टी में हुई हालिया टूट की बदौलत 245 सदस्यों वाली राज्यसभा में बीजेपी का नंबर बढ़कर 141 पहुंच गया है. 

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लोकसभा में टीएमसी के पास 28 सांसद हैं. अगर बंगाल के हिसाब से देखें तो उनमें से 15 या 20 जो भी अलग होते हैं, बीजेपी को फायदा ही होगा. आगे की राह कुछ हद तक कांग्रेस ने आसान कर दी है. कांग्रेस के चुनावी गठबंधन तोड़कर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की पार्टी टीवीके के साथ चले जाने से डीएमके नाराज हो गई है. 

पश्चिम बंगाल में ममता की तरह तमिलनाडु में डीएमके नेता एमके स्टालिन भी सत्ता गंवा चुके हैं. बंगाल में आए तूफान का असर हुआ तो तमिलनाडु में भी वैसी संभावना हो सकती है. ममता बनर्जी के बाद परेशान तो एमके स्टालिन भी होंगे. 

सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय परिसीमन विधेयक का संशोधित मसौदा तैयार कर रहा है, और उसमें डीएमके जैसे क्षेत्रीय दलों द्वारा उठाई गई प्रमुख चिंताओं को शामिल किए जाने की संभावना है. अगर डीएमके की बात केंद्र सरकार मान लेती है, तो कुछ मामलों में समर्थन भी मिल सकता है. बीजेपी को कुछ खास विधेयकों के मामले में समर्थन देने को लेकर डीएमके विचार कर सकती है.

संसदीय प्रबंधन से जुड़े बीजेपी के एक सीनियर सांसद का कहना है, अगर डीएमके विधेयक के समर्थन के लिए तैयार हो जाती है... चाहे वह एक साथ चुनाव कराने के मुद्दे पर हो या किसी और संवैधानिक संशोधन पर, तो 543 सदस्यीय लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए एनडीए को केवल 42 और वोटों की जरूरत होगी... टीएमसी का अलग हुआ ग्रुप, चाहे उसमें 15, 20 या 25 सांसद हों, बीजेपी को जरूरी नंबर के काफी करीब पहुंचा देगा.
 

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