त्योहारी सीजन मिठाई के बगैर अधूरा है. लेकिन इस बार रक्षाबंधन पर चीनी थोड़ी कम है. बीते कुछ दिनों से बाजार में चीनी की चाल काफी तेज है. सरकार को एक दशक में पहली बार चीनी का आयात करना पड़ा. कोई इथेनॉल को महंगी चीनी की वजह बता रहा है. किसी का कहना है कि इस बार मौसम ने खेल बिगाड़ दिया. चीनी का पर्याप्त उत्पादन नहीं हुआ और जमाखोरी ने चीनी की मिठास कम कर दी.
रिटेल मार्केट में चीनी के दाम 65 से 75 प्रति किलो तक पहुंच चुके हैं, जो पिछले माह 40-50 रुपये प्रति किलो थे. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर भी 'ऑफर' वाली चीनी का भाव 65 रुपये से कम नहीं है. दो महीने में चीनी की कीमतों में करीब 40 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली है. तो इस बार रक्षाबंधन पर चीनी की चाशनी में लिपटा घेवर आपकी जेब पर बोझ बढ़ाने वाला है.
घरों में बहनों ने राखी की खरीदारी कर ली है. नए कपड़े और ज्वैलरी भी रेडी है. इंतजार बस बाजार से ताजा-ताजा घेवर लाने का है. रक्षाबंधन पर भइया आएंगे तो क्या लाएंगे? इस सवाल का जवाब देश जानना चाहता है. रिंकी ने बताया कि मैंने तो भाई से फरमाइश की है कि इस बार राखी पर मुझे स्मार्टवॉच चाहिए. भाई की कलाई पर राखी और रिटर्न में मेरी कलाई पर रिस्ट वॉच हो. लेकिन रिंकी परेशान है, महंगाई के दौर में कहीं ये घाटे का सौदा न पड़ जाए.
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रिंकी अकेली ऐसी बहन नहीं है. जया और सुषमा भी रक्षाबंधन से पहले कैलकुलेटर लेकर बैठी हैं. घरों में ड्रेस, राखी, घेवर पर होने वाले खर्चे का हिसाब लगाया जा रहा है. महामंथन इस बात पर है कि कहीं इस बार भइया ने 500 की पत्ती में निपटा दिया तो क्या होगा. इतने के तो मेरे 'अमेरिकन डायमंड' वाले ईयर रिंग्स ही आए हैं. अट्टा बाजार में तो वो 1200 के थे, वो तो मीना मौसी से बोलकर सदर बाजार से मंगाए, तब जाकर इतने के पड़े.
तो राखी पर इस बार क्या होने वाला है? सिस्टर्स मोर्चा मंच की जिला प्रभारी विमला ने भइया समाज से अनोखी डिमांड कर दी है. विमला का कहना है कि हम भाइयों की कलाई पर रक्षा कवच बांधते हैं, बदले में उन्हें हमारे लिए चीनी का एक कट्टा लेकर आना चाहिए. उस चीनी से घर में सालभर का काम चल जाएगा. उन्होंने बताया कि हमें इस बार रक्षाबंधन पर तोहफे नहीं चाहिए, पैसे भी नहीं चाहिए. एक अदद चीनी के बोरे की चाहत है बस, अब भइया इनकार नहीं कर सकते.
भइया भी मुश्किल में हैं. कल ही बाजार से 5 किलो चीनी खरीदने के चक्कर में पत्नी का एंटी डैंड्रफ शैंपू खरीदने के बाद बिल से हटवा दिया था. अब घरवाली ने उनका सिर पका दिया है. ऊपर से साले साहब रक्षाबंधन पर सपरिवार घर आने वाले हैं. पत्नी के सख्त निर्देश हैं, मेरे भइया के लिए तो शुद्ध देसी घी वाला घेवर लेकर आना, डालडे वाला नहीं चलेगा.
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ऐसे में अब भइया भी गणित लगा रहे हैं. बहन की राखी मेरी रक्षा तो कर लेगी, लेकिन मैं अपनी जेब की रक्षा कैसे करूंगा? एक कट्टा चीनी बहन के घर ले जानी है, तब जाकर राखी बंधेगी. दूसरी तरफ पत्नी ने राखी पर जो दो किलो घी वाला घेवर मंगाया है, उससे तो जेब छलनी होने वाली है. महीने का आखिर चल रहा है और ऐसे में चीनी के बोझ से कहीं मैं ही न कुचल जाऊं.
तो इस बार प्लानिंग शुगर फ्री रक्षाबंधन की चल रही है. सेहत के लिए भी ये सबसे अच्छा विकल्प है. मीठा खा-खा कर फैटी हुए भाई की रक्षा कर पाना बहन के लिए भी मुश्किल हो जाएगा. रही बात पत्नी की, तो उसे समझाना होगा कि पार्टियों में हैंडसम और डेशिंग पति चाहिए तो मीठा खाना छोड़ना होगा. और वैसे भी राखी तो रिश्तों की मिठास का त्योहार है, उसमें चीनी की क्या ही जरूरत है.
अनुग्रह मिश्रा