नाटो की ट्रंप को 'ना', ईरान के साथ अमेरिकी युद्ध से यूरोप ने क्यों बनाई दूरी

डोनाल्ड ट्रंप ने जिस विवाद को खुद शुरू किया था, वह अब ईरान के साथ एक मुश्किल जंग बन चुका है. लेकिन नाटो के यूरोपीय सहयोगियों ने इस युद्ध में अमेरिका का साथ देने से साफ इनकार कर दिया है. उनका कहना है कि यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है और उनके लिए अपनी खुद की सुरक्षा ज्यादा जरूरी है.

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मदद न मिलने पर नाटो देशों पर भड़के ट्रंप, जताई नाराजगी (Photo-ITG) मदद न मिलने पर नाटो देशों पर भड़के ट्रंप, जताई नाराजगी (Photo-ITG)

नरेश कौशिक

  • नई दिल्ली,
  • 17 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 5:43 PM IST

डोनाल्ड ट्रंप की अपनी मर्जी से चुनी गई यह जंग अब मजबूरी की जंग बन गई है, क्योंकि ऐसा लग रहा है कि ईरान इसकी दिशा तय कर रहा है. अपनी सीमाओं के बाहर संघर्ष को बढ़ाने और अमेरिका व उसके सहयोगियों पर आर्थिक बोझ डालने के तेहरान के फैसले ने ट्रंप को अपने नाटो (NATO) सहयोगियों से मदद मांगने पर मजबूर कर दिया है. लेकिन यूरोपीय देश उस युद्ध में उनकी मदद करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं, जिसे उन्होंने इजरायल के साथ मिलकर दो सप्ताह से अधिक समय पहले शुरू किया था.

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सोमवार को ट्रंप नाटो देशों पर जमकर बरसे और कहा कि अमेरिका का साथ न देने के कारण उन्होंने उन्हें "बहुत निराश" किया है. उन्होंने विशेष रूप से ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर निशाना साधा, जिन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि ब्रिटेन को ईरान के साथ किसी बड़े युद्ध में नहीं घसीटा जाएगा. यह बहुत दुर्लभ है कि ब्रिटेन जैसा अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी किसी सैन्य संघर्ष में उसके साथ शामिल न हो.

ट्रंप की मदद की पुकार को सबसे साफ तौर पर जर्मनी ने खारिज किया. वहां के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने कहा कि इस युद्ध का नाटो से कोई लेना-देना नहीं है. "यह हमारा युद्ध नहीं है, हमने इसे शुरू नहीं किया है." वहीं, ब्रिटेन के पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, जनरल निक कार्टर ने सोमवार को बीबीसी से कहा कि नाटो का गठन इसलिए नहीं किया गया था कि कोई एक सदस्य अपनी मर्जी से युद्ध शुरू करे और फिर "बाकी सबको पीछे चलने के लिए मजबूर करे."

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एक ऐसा युद्ध जिसमें यूरोप की कोई राय नहीं

अपनी पिछली सरकारों के विपरीत, डोनाल्ड ट्रंप ने देश या विदेश में कोई समर्थन जुटाए बिना और युद्ध के स्पष्ट उद्देश्यों को बताए बिना ही जंग छेड़ दी. उन्होंने अपने सहयोगियों यहां तक कि अमेरिकी कांग्रेस से सलाह लेना भी जरूरी नहीं समझा. 1991 में राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश ने इराकी तानाशाह सद्दाम हुसैन से कुवैत को आज़ाद कराने के लिए 'ऑपरेशन डेजर्ट शील्ड' शुरू करते समय 40 से अधिक देशों का गठबंधन बनाया था.

दो दशक बाद, उनके बेटे, राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने भी इराक के खिलाफ एक और युद्ध शुरू करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी हासिल की थी (भले ही वह सामूहिक विनाश के हथियारों को खत्म करने के झूठे आधार पर था)। यूरोप दोनों गठबंधनों का हिस्सा था, हालांकि दूसरी बार फ्रांस और जर्मनी इसमें शामिल नहीं हुए थे.

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ट्रंप ने अपने नाटो (NATO) सहयोगियों से मदद तब मांगी जब युद्ध अपने तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका था और अमेरिका के लिए इसे अकेले संभालना बहुत मुश्किल साबित हो रहा है. प्रत्यक्ष रूप से, ट्रंप होर्मुज जलमार्ग (Strait of Hormuz) को सुरक्षित करने में मदद चाहते थे. यह एक संकरा जलमार्ग है जहां से दुनिया का पांचवां हिस्सा तेल और गैस गुजरता है. ईरान ने अमेरिका और उसके खाड़ी सहयोगियों को आर्थिक चोट पहुंचाने के लिए अपने 'परमाणु विकल्प' के तौर पर इसे लगभग बंद कर दिया था, लेकिन ट्रंप स्पष्ट रूप से चाहते थे कि सहयोगी देश युद्ध के प्रयासों में शामिल हों, जिसके लिए वे तैयार नहीं थे.

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यूरोपीय देशों की इस 'ना' ने ट्रंप को बहुत नाराज कर दिया है.  ट्रंप ने कहा, "हमें किसी की जरूरत नहीं है, हम दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र हैं. " उन्होंने यह भी जोड़ा कि होर्मुज जलमार्ग को फिर से खोलने में सहायता के लिए उनका अनुरोध वास्तव में अमेरिका के सहयोगियों की "वफादारी की परीक्षा" के समान था,

यूरोप ने दिखाई हिम्मत

पिछले तीन महीनों में यह दूसरी बार है जब यूरोपीय देशों ने ट्रंप के सामने कड़ा रुख अपनाया है. जनवरी में जब ट्रंप ने 'ग्रीनलैंड' पर कब्जा करने की धमकी दी थी, तब पूरा यूरोप एक साथ खड़ा हो गया और अमेरिका पर आर्थिक पाबंदियां लगाने की चेतावनी दी. आखिरकार, ट्रंप को भारी मन से अपनी धमकी वापस लेनी पड़ी थी.

यूरोपीय देशों ने खाड़ी (Gulf) में अपने सहयोगियों को सैन्य मदद तो भेजी है, लेकिन वह मदद केवल बचाव के लिए है. उनकी सबसे सक्रिय मदद 'साइप्रस' (Cyprus) भेजी गई है, जहां एक ड्रोन ने ब्रिटिश सैन्य अड्डे 'अक्रोटिरी'  Akrotiri पर हमला किया था. चूंकि साइप्रस यूरोपीय संघ (EU) का सदस्य है, इसलिए इसकी सुरक्षा यूरोप के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

यूरोपीय देश चाहकर भी सैन्य रूप से एक सीमा से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते. पिछले 80 सालों से वे अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहे हैं, और अब जाकर वे आत्मनिर्भर होने की कोशिश कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, फ्रांस जो यूरोप में नाटो का सबसे शक्तिशाली सदस्य है  उसने खाड़ी में अपने एकमात्र परमाणु-संचालित विमान वाहक पोत (aircraft carrier) सहित एक दर्जन जहाज भेजे हैं. लेकिन यह उसके कुल लड़ाकू बेड़े के आधे से भी ज़्यादा है. इटली ने भी एक एयर डिफेंस सिस्टम भेजा, लेकिन उसे इसे बाल्टिक क्षेत्र से हटाकर भेजना पड़ा, जो एक जोखिम भरा कदम था.

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यूरोप की प्राथमिकताएं अलग हैं

यूरोप के लिए मिडल ईस्ट प्राथमिकता नहीं है, उनकी असली प्राथमिकता रूस से मिलने वाली चुनौती है, जिससे वे खुद को सुरक्षित रखना चाहते हैं. ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका के लगातार अविश्वसनीय साबित होने के कारण, यूरोपीय देश अब अपनी सैन्य क्षमताओं को खुद मजबूत कर रहे हैं. उन्हें डर है कि यूक्रेन में जीत के बाद रूस का हौसला बढ़ जाएगा और वह किसी अन्य यूरोपीय देश पर हमला कर सकता है. उन्हें यह भी लगता है कि ईरान के साथ युद्ध में जरूरी सैन्य साजो-सामान, विशेष रूप से 'एयर डिफेंस सिस्टम' खर्च हो रहे हैं, जिससे मास्को को ही फायदा होगा.

ईरान में अमेरिका के युद्ध का हिस्सा बनने से यूरोप के पीछे हटने का एक और कारण यह है कि वहां की जनता इस सैन्य कार्रवाई के सख्त खिलाफ है. इसकी वैधता पर उठ रहे सवालों के अलावा, इसे काफी हद तक इजरायल के युद्ध के रूप में देखा जा रहा है. गाजा में क्रूर सैन्य अभियान के बाद इजरायल ने यूरोप में अपना काफी समर्थन खो दिया है. जब से अंतरराष्ट्रीय अदालत ने युद्ध अपराधों के लिए बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है, तब से उन्होंने पश्चिमी यूरोप की यात्रा करने से भी परहेज किया है.

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यूरोप वह काम क्यों करे जिससे अमेरिका खुद बच रहा है?

एक सवाल यह भी है कि जब अमेरिका खुद पीछे हट रहा है, तो यूरोपीय देश अपने जहाजों को 'होर्मुज जलमार्ग' में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए क्यों भेजें? ईरान पिछले बीस वर्षों से इस स्थिति की तैयारी कर रहा है. हो सकता है कि अमेरिका और इजरायल की सेना ने ईरानी नौसेना को नष्ट कर दिया हो, लेकिन माना जाता है कि ईरान के 'रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' के पास सैकड़ों छोटी नावें हैं, जो हजारों समुद्री सुरंगों से लैस हैं, जिनका इस्तेमाल पश्चिमी जहाजों पर हमला करने के लिए किया जा सकता है.

जब ट्रंप ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने का फैसला किया, तो उन्होंने अपने सैन्य कमांडरों और खाड़ी देशों के नेताओं की उन चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया था कि ईरान होर्मुज जलमार्ग को बंद कर सकता है और क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर हमला कर सकता है. पिछले साल, ट्रंप प्रशासन ने मध्य पूर्व से अपना एकमात्र बचा हुआ 'माइन-क्लियरिंग जहाज हटा लिया था. अब अमेरिका के पास ऐसे केवल चार जहाज बचे हैं, लेकिन उन्हें चीन के खिलाफ सुरक्षा के लिए 'इंडो-पैसिफिक' क्षेत्र में तैनात किया गया है.

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यूरोपीय नेताओं के ट्रंप से नाराज होने का एक और कारण भी है. पिछले साल उनके प्रशासन ने यूरोपीय देशों में एक आक्रामक विचारधारा वाला अभियान शुरू किया और वहां के धुर दक्षिणपंथी आंदोलनों का खुलकर समर्थन किया. यूरोपीय नेताओं का मानना है कि इस अभियान का मकसद 'यूरोपीय संघ' (EU) के राजनीतिक प्रभाव को कम करना है.

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यह ट्रंप ही थे जिन्होंने 2015 के ईरान परमाणु समझौते से हाथ खींच लिए थे, जिसे ओबामा प्रशासन ने यूरोपीय शक्तियों की सलाह से तैयार किया था. ईरान उस समझौते का पालन कर रहा था, लेकिन ट्रंप ने फिर से नेतन्याहू के प्रभाव में आकर उस समझौते को खत्म कर दिया.

यूरोपीय देश तब भी खुश नहीं थे जब ट्रंप ने उस वक्त युद्ध शुरू करने का फैसला किया जब तेहरान अमेरिकियों के साथ बातचीत कर रहा था. अब युद्ध में शामिल होने के बजाय, वे इस संघर्ष के कूटनीतिक समाधान की मांग कर रहे हैं, क्योंकि इस जंग ने उनकी अर्थव्यवस्थाओं को भी चोट पहुंचाई है.

(नरेश कौशिक बीबीसी और एसोसिएटेड प्रेस के पूर्व संपादक हैं, वह लंदन में रहते हैं)

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