CJP प्रोटेस्ट कवर करते हुए महिला रिपोर्टर के रूप में मेरे साथ क्या हुआ

लोकतंत्र की जान है लोगों का प्रोटेस्ट. लेकिन महिलाओं की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है. जंतर-मंतर पर मेरे अनुभव से साफ है कि मुद्दा भले ही सबके फोकस का हकदार हो, लेकिन बेहतर भीड़ प्रबंधन, ट्रेंड वॉलंटियर और मजबूत सुरक्षा इंतजाम भी उतने ही जरूरी हैं.

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विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा भी लोकतंत्र का उतना ही मूलभूत आधार है विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा भी लोकतंत्र का उतना ही मूलभूत आधार है

चैतन्य धवन

  • नई दिल्ली,
  • 24 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 10:06 PM IST

CJP यानी कॉकरोच जनता पार्टी के 'चलो संसद मार्च' को कवर करने के अगले दिन मेरे मन में नारे, भाषण या राजनीतिक बहस नहीं घूम रहे थे. एक सवाल बार-बार मुझे परेशान कर रहा था... बड़ी-बड़ी पब्लिक प्रोटेस्ट में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं?

आगे जो लिख रही हूं वह किसी राजनीतिक पार्टी, संगठन या आंदोलन के समर्थन या विरोध में नहीं है. न ही मैं उन छात्रों के इरादों पर सवाल उठा रही हूं जो अपनी आवाज उठाने आए थे. यह सिर्फ 21 जुलाई को जो मैंने देखा, उस पर आधारित मेरा निजी अनुभव और राय है.

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शांतिपूर्ण शुरुआत

जब मैं नाएडा के अपने ऑफिस से जंतर-मंतर पहुंची तो दोपहर में तेज धूप थी. गर्मी के बावजूद सैकड़ों लोग मार्च के लिए जमा हो चुके थे. जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, भीड़ बढ़ती गई. फिर बारिश आई, लेकिन लोग बिखरे नहीं, बल्कि टिके रहे.

छात्र प्लेकार्ड लेकर शिक्षा के मुद्दों पर चर्चा कर रहे थे, वॉलंटियर लोगों को गाइड कर रहे थे. सबके चेहरे पर एक मकसद साफ दिख रहा था. एक बात जो मैं कभी नहीं भूलूंगी, वो था राजस्थान से अपनी आंटी के साथ आया 13 साल का एक लड़का, जो सिर्फ इस मीटिंग में शामिल होने आया था.

शाम तक जंतर-मंतर पूरी तरह भर चुका था. भीड़ जितनी बड़ी होती गई, ये समझना उतना ही मुश्किल होता गया कि असल में कौन प्रदर्शन का हिस्सा है. क्योंकि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता.

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भीड़ लगातार बढ़ती गई

जैसे-जैसे घंटे गुजरते गए, और ज्यादा लोग जुड़ते गए. जहां मैं खड़ी थी, वहां से छात्रों और बाकी लोगों में फर्क करना मुश्किल हो गया. अलग-अलग उम्र के लोग, अलग-अलग ग्रुप अलग-अलग नारे लगा रहे थे. कई चेहरे ऐसे थे जिन्हें मैं पहचान ही नहीं पा रही थी.

भीड़ जितनी बढ़ी, ये समझना उतना ही कठिन होता गया कि मूल रूप से मार्च के लिए कौन आया था और बाद में कौन शामिल हुआ. यही वजह है कि भीड़ प्रबंधन इतना महत्वपूर्ण हो जाता है.

वो पल जिसने मेरा दिन बदल दिया

भीड़ के बीच कहीं, मुझे छेड़ा गया. वो मुझ पर हमले जैसा था. अनुचित तरीके से छुआ जाना मेरे लिए बेहद दर्दनाक अनुभव था. मैं नहीं बता सकती कि वो शख्स कौन था, न ही ये कि वो छात्र था, समर्थक था या बस भीड़ में घुस आया कोई. दुख की बात ये है कि वह दर्दनाक अनुभव पूरे दिन मेरे साथ किसी भी नारे से ज्यादा लंबे समय तक रहा.

मैं अकेली नहीं थी. उस दिन जंतर-मंतर से कई महिलाएं ऐसे भयानक अनुभव लेकर लौटीं. मेरी एक सहयोगी, जो उसी प्रोटेस्ट को कवर कर रही थी, का भी अपना बुरा अनुभव था.

उसने मुझे बताया कि जब एक आदमी ने भीड़ में अनुचित तरीके से छुआ, तो उसने हिम्मत दिखाते हुए उसी वक्त उसे चुनौती दी. थोड़ी देर के लिए ध्यान जरूर गया, लेकिन ये घटना उसी चिंता को दोहराती है जिसके साथ मैं वहां से आई थी. भारी भीड़ में महिलाओं को अक्सर खुद का बचाव खुद करना पड़ता है.

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कोई भी महिला पब्लिक प्रोटेस्ट में छेड़छाड़ का शिकार नहीं होनी चाहिए, चाहे वो वहां भाग ले रही हो, वॉलंटियर कर रही हो, रिपोर्टिंग कर रही हो या बस गुजर रही हो.

मैंने जिन छात्रों से बात की, वे सम्मानजनक और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर फोकस्ड थे. कई वाकई अपने भविष्य के बारे में बात करना चाहते थे. मेरा अनुभव पूरे प्रदर्शन या हर छात्र के खिलाफ नहीं है.

लेकिन जब कोई पब्लिक प्रोटेस्ट इतनी बड़ी हो जाती है, तो उसमें ऐसे लोग भी आ जाते हैं जिनका इरादा मूल मुद्दे से बिल्कुल अलग होता है. इसलिए मेरा मानना है कि आयोजकों और अधिकारियों को मिलकर ये सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी सभाएं सबके लिए सुरक्षित रहें.

महिलाओं की सुरक्षा और मॉब मैनेजमेंट

शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र का अहम हिस्सा हैं, लेकिन किसी भी सार्वजनिक जमावड़े में सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए. भीड़ बढ़ने पर सही प्रबंधन उतना ही जरूरी है जितना मुद्दा खुद.

महिलाओं को बिना किसी डर के भाग लेना, वॉलंटियर करना या बस मौजूद रहना चाहिए. बेहतर प्लानिंग, ट्रेंड वॉलंटियर, साफ रास्ते और पर्याप्त सुरक्षा से प्रदर्शन सबके लिए सुरक्षित और समावेशी बने रह सकते हैं.

प्रदर्शनकारियों पर हुई कथित बल प्रयोग की जांच जरूरी है. साथ ही, छेड़छाड़ और लोगो की सुरक्षा के मुद्दे को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. महिलाओं की सुरक्षा की मांग किसी आंदोलन को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे और मजबूत बनाती है. शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सुरक्षित पब्लिक स्पेस साथ-साथ चलनी चाहिए.

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जंतर-मंतर से मैं सिर्फ प्रदर्शन के नोट्स लेकर नहीं लौटी. मेरी कहानी हर प्रदर्शनकारी या आयोजक को डिफाइन नहीं करती. ये सिर्फ मेरा निजी अनुभव है. लेकिन ये एक सवाल जरूर छोड़ गया है कि हम पब्लिक प्रोटेस्ट को महिलाओं के लिए और सुरक्षित कैसे बना सकते हैं?

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