जय किसान, उफ़ किसान

देश में महंगाई बढ़ी, तो उसके साथ संपत्तियों और कीमती धातुओं के दाम भी आसमान छूने लगे. लेकिन कृषि क्षेत्र को जानबूझकर इस रेस से बाहर रखा गया.

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देश के करोड़ों गरीबों को सस्ता राशन देने का पूरा वित्तीय भार किसान के कंधों पर लाद दिया जाता है, जो खुद खेती से रोजाना सिर्फ 28 रुपये का मुनाफा कमा पाता है. (Photo: ITG) देश के करोड़ों गरीबों को सस्ता राशन देने का पूरा वित्तीय भार किसान के कंधों पर लाद दिया जाता है, जो खुद खेती से रोजाना सिर्फ 28 रुपये का मुनाफा कमा पाता है. (Photo: ITG)

ओम प्रकाश

  • नई दिल्ली,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:49 AM IST

भारत आज अपनी आजादी का 80वां साल मना रहा है. गुलामी की जंजीरें तोड़ने से लेकर आत्मनिर्भर भारत की नींव रखने तक, इस आठ दशकों के सफर की सबसे मजबूत कड़ी और इतिहास का सबसे जांबाज किरदार सिर्फ और सिर्फ देश का किसान रहा है. लेकिन, यह देश की विडंबना ही है कि जिस अन्नदाता ने इस मिट्टी को अपनी अस्मिता और गौरव वापस दिलाने के लिए बारदोली और खेड़ा से लेकर चंपारण के नील आंदोलन तक के मोर्चों पर लाठियां और गोलियां खाई थीं, वही आज अपनी ही चुनी हुई सरकारों के सामने अपनी फसलों के दाम के लिए सड़कों पर बैठने को मजबूर है.

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इतिहास गवाह है कि जब फिरंगियों को खदेड़ने के बाद देश को भुखमरी और विभाजन के गहरे अकाल ने घेरा, तब इसी किसान ने लाज बचाई थी. एक दौर वह था जब देश 'शिप-टू-माउथ' (दूसरे देशों के जहाज पर निर्भर) की स्थिति में था और हमें अमेरिका से लाल और घटिया गेहूं मंगाकर अपना पेट भरना पड़ता था, जो हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान पर एक चोट के समान था.

कृषि वैज्ञानिकों ने हरित क्रांति का रोडमैप तैयार किया, तो हमारे किसानों ने उस पर अपनी पूरी ताकत झोंक दी. दिन-रात पसीना बहाकर उन्होंने न सिर्फ देश को भुखमरी और उस विदेशी घटिया गेहूं वाले अपमान से बचाया, बल्कि भारत को इस काबिल बना दिया कि वह आज दुनिया के तमाम देशों का पेट भर रहा है. मगर इस 'वाह किसान' वाली गौरवगाथा के बावजूद आज वह अपने हक के लिए संघर्ष कर रहा है. 

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आजादी के इन आठ दशकों में देश के हर वर्ग की किस्मत चमकी, लेकिन नीतियां कुछ इस तरह बुनी गईं कि देश का पेट भरने वाला खुद आर्थिक संकटों से घिर गया. हालिया आर्थिक आंकड़ों और जमीनी विश्लेषण के आईने में देखिए कि आजादी के 80 साल बाद भारतीय किसान ने क्या खोया और क्या पाया.

देश में महंगाई बढ़ी, तो उसके साथ संपत्तियों और कीमती धातुओं के दाम भी आसमान छूने लगे. लेकिन कृषि क्षेत्र को जानबूझकर इस रेस से बाहर रखा गया. साल 1950 में जब देश आजादी के बाद संभल रहा था, तब बाजार में सोने का भाव करीब 99 रुपये प्रति 10 ग्राम था.

उस दौर में किसान का गेहूं बाजार में 35 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिकता था. आज सोने का भाव छलांग लगाकर 1,40,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर को छू रहा है, यानी इसमें लगभग 1,414 गुना की भारी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन जब किसान की उपज की बारी आई, तो सरकार ने गेहूं का वर्तमान सरकारी दाम महज 2,585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है.

1950 के वास्तविक भाव (35 रुपये) के मुकाबले यह बढ़ोतरी महज 73 गुना है. इस 2,585 रुपये के दाम की भी कोई गारंटी नहीं है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के 77वें सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि एक औसत भारतीय किसान परिवार की मासिक आय मात्र 10,218 रुपये है.

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पहली नजर में यह आंकड़ा भी भ्रम पैदा करता है, क्योंकि इसमें से शुद्ध रूप से फसल से होने वाली मासिक आय महज 3,798 रुपये है. बाकी का हिस्सा किसान बाहर मजदूरी करके (4,063 रुपये), पशुपालन (1,582 रुपये) और छोटे-मोटे गैर-कृषि बिजनेस (641 रुपये) से जुटाता है.

फसलों से होने वाली आय का जो योगदान मात्र 3,798 रुपये ही है. उसमें से भी 2,959 रुपये वो फसल उत्पादन पर खर्च कर देता है. यानी खेती से उसकी शुद्ध आय स‍िर्फ 839 रुपये प्रत‍िमाह है. प्रत‍िद‍िन का ह‍िसाब लगाएं तो लगभग 28 रुपये. यह मुनाफा बेहद शर्मनाक है. कुछ बड़े क‍िसान फायदे में हो सकते हैं, लेक‍िन 86 फीसदी छोटे क‍िसानों की आर्थ‍िक स्थ‍िति बहुत खराब है. उनकी आय सरकारी चपरासी ज‍ितनी भी नहीं है. क्योंक‍ि नीतियां फसलों के दाम पर कुंडली मारकर बैठी हैं. 

भारत का आर्थिक ढांचा और नीतियां इस तरह डिजाइन की गई हैं कि वे किसानों के साथ खुला अन्याय करती हैं. जब भी देश के सरकारी कर्मचारियों की सैलरी या भत्ते बढ़ाए जाते हैं, तो मुख्यधारा के अर्थशास्त्री इसे अर्थव्यवस्था के लिए 'बूस्टर डोज' बताते हैं.

दलील दी जाती है कि वेतन बढ़ने से बाजार में मांग बढ़ेगी, लोग कार और मोबाइल खरीदेंगे और देश की जीडीपी चमकेगी. लेकिन जैसे ही किसानों को उनकी उपज का सही दाम दिलाने या खुद सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी देने की बात आती है, तो नीति निर्माताओं को अचानक देश के गरीबों की याद सताने लगती है. तब तर्क दिया जाता है कि किसानों को सही दाम देने से बाजार में महंगाई आ जाएगी और गरीब भूखा मर जाएगा. 

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सच तो यह है कि देश के करोड़ों गरीबों को सस्ता राशन देने का पूरा वित्तीय भार उस बेबस किसान के कंधों पर लाद दिया जाता है, जो खुद खेती से रोजाना सिर्फ 28 रुपये का मुनाफा कमा पाता है. शहरों की महंगाई को काबू में रखने के लिए जानबूझकर किसान की आय की बलि चढ़ा दी जाती है.

विकसित और समृद्ध देशों के अंतरराष्ट्रीय संगठन ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) की रिपोर्ट भारतीय कृषि नीति की कलई खोलती है. ओईसीडी की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 से लेकर 2025 के बीच पिछले 25 सालों में भारत के किसानों को 111 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा है. 

यह नुकसान इसलिए हुआ क्योंकि सरकार की उपभोक्ता-केंद्रित नीतियों के कारण किसानों को उनकी फसलों का सही और वैश्विक बाजार के अनुरूप दाम नहीं मिलने दिया गया. यह एक तरह का अप्रत्यक्ष टैक्स है, जो देश के शहरी उपभोक्ताओं को सस्ता अनाज देने के लिए चुपके से देश के अन्नदाता की जेब पर डाल दिया गया.

हर बजट और आर्थिक समीक्षा में जब सरकारें अपनी पीठ थपथपाती हैं या बड़े मंचों से किसानों की आर्थिक तरक्की का ढोल पीटा जाता है, तो कृषि विकास दर का आंकड़ा सबसे जोर-शोर से उछाला जाता है. लेकिन इस आंकड़े में सबसे बड़ा झोल यह है कि भारत का सांख्यिकी मंत्रालय इसे मापने के लिए सिर्फ 'प्रोडक्शन अप्रोच' का इस्तेमाल करता है. 

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इस आसान से गणित के तहत देश के खेतों में कुल कितना अनाज पैदा हुआ, सरकार केवल उसकी मात्रा को मापती है. इस गणना में किसान की खुशहाली यानी उसकी आय की मैपिंग नहीं होती. इस तरह यह विकास किसानों के लिए छलावा बन जाता है. इस नीति के कारण, अच्छी पैदावार के बावजूद, उचित मूल्य न मिलने से किसान कर्ज के दलदल में फंस जाते हैं.

ऐसे में जब तक उत्पादन में बढ़ोतरी का सीधा फायदा किसान की आय में नहीं दिखेगा, तब तक यह विकास केवल कागजी रहेगा. किसान का सबसे बड़ा दर्द यह है कि बाजार की नीतियां हमेशा उसके खिलाफ काम करती हैं. जैसे ही बाजार में प्याज, टमाटर, गेहूं या चावल के दाम थोड़े भी बढ़ते हैं और किसानों को दो पैसे कमाने का मौका मिलता है, सरकार तुरंत सक्रिय हो जाती है. 

महंगाई रोकने के नाम पर निर्यात पर प्रतिबंध, स्टॉक लिमिट लगाना और विदेशों से जीरो ड्यूटी पर आयात शुरू करने जैसे कदम उठाए जाते हैं, ताकि दाम धड़ाम से गिर जाएं, लेकिन जब बम्पर पैदावार के कारण बाजार में किसान की फसल कौड़ियों के भाव बिकती है, टमाटर सड़कों पर फेंका जाता है, तब सरकार नाम की चिड़िया फुर्र हो जाती है. सरकारी खरीद बंद हो जाती है और किसान को व्यापारी के रहमों-करम पर छोड़ दिया जाता है.

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देश में एमएसपी की कोई कानूनी गारंटी नहीं है. देश के मात्र 12 फीसदी किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिल पाता है, बाकी किसान औने-पौने दामों पर फसल बेचने को मजबूर है, क्योंकि फसलों के दाम पर सरकार कुंडली मारकर बैठी है. 

सरकार के कदमों की हकीकत

ऐसा नहीं है कि सरकार ने कुछ नहीं किया, लेकिन किए गए उपाय ढांचागत सुधार के बजाय अस्थायी राहत जैसे रहे हैं. पीएम-किसान सम्मान निधि के तहत सरकार किसानों को हर साल 6,000 रुपये की सीधी नकद सहायता दे रही है. लेकिन खेती से महज 28 रुपये रोज का शुद्ध मुनाफा कमाने वाले किसान के लिए यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे जैसी है. 

सरकार का दावा है कि वह लागत का 1.5 गुना लाभ वाली एमएसपी दे रही है, लेकिन वह 'A2+FL' (वास्तविक लागत + पारिवारिक श्रम) पर आधारित है. जबकि किसानों की मांग स्वामीनाथन आयोग के मुताबिक 'C2' (व्यापक लागत, जिसमें जमीन का किराया और पूंजी पर ब्याज भी शामिल हो) पर 50 फीसदी मुनाफे की है.

खाद, बिजली और लोन पर मिलने वाली भारी सब्सिडी का जाल भी अंत में कंपनियों की जेब में जाता है, किसान के हाथ में नेट प्रॉफिट नहीं बचता. आंखें फोड़कर चश्मा दान करती सियासतसियासत कुछ इस तरह एहसान करती है कि आंखें फोड़ देती है, और चश्मे दान करती है.

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यह पंक्तियां आज के किसान की स्थिति पर सटीक बैठती हैं. पहले सरकारें ऐसी आर्थिक नीतियां बनाती हैं, जिससे किसान अपनी फसल का सही दाम न पा सके और गरीब बना रहे. फिर उसी गरीब किसान को कर्जमाफी, 500 रुपये महीना की सम्मान निधि और मुफ्त राशन की कतार में खड़ा कर दिया जाता है.

आजादी के आठ दशक बाद भी अगर देश के सबसे बड़े कामकाजी वर्ग को उसकी मेहनत का सही हक नहीं मिलता तो विकसित भारत का नारा केवल कागजी बनकर रह जाएगा. किसानों को भीख या खैरात नहीं, बल्कि उनकी उपज का सही दाम चाहिए, ताकि वे भी सम्मान से कह सकें- हां, हम किसान हैं.

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