राजनीति में साख और शुचिता की बातें अक्सर होती हैं, लेकिन जब वही साख प्रशासनिक खामियों की अनदेखी और 'सब चंगा सी' वाले अति-आत्मविश्वास की आड़ बनने लगे, तो कुर्सी खिसकते देर नहीं लगती. धर्मेंद्र प्रधान का केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा केवल एक सरकारी पद का खाली होना नहीं है, बल्कि उस शुतुरमुर्ग की दुर्गति है, जो बीते दो-तीन सालों से मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट (NEET) के बिखराव पर आंखें मूंदे बैठा था.
ओडिशा से आने वाले धर्मेंद्र प्रधान को भारतीय जनता पार्टी में एक अनुशासित, मेहनती और संकट मोचक नेता के रूप में माना जाता है. संगठन के ऐसे रणनीतिकार जिन्हें अहम राज्यों के चुनाव में तैनात किया जाता रहा, और वे लगातार परफॉर्म करते रहे. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने हमेशा उन पर भरोसा जताया.
लेकिन जब शिक्षा मंत्रालय का भारी-भरकम जिम्मा उनके कांधों पर आया, तो वही रणनीतिकार प्रशासनिक मोर्चे पर इस कदर पस्त हुआ कि उसकी पुरानी सारी उपलब्धियां धरी की धरी रह गईं. दक्षिण भारत के कई राज्यों में नई शिक्षा नीति के तहत प्रस्तावित थ्री-लैंग्वेज फार्मूला विवादों में रहा. तमिलनाडु, बंगाल और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों की आपत्तियों के बाद शिक्षा मंत्रालय को इस पर पीछे हटना पड़ा. फिर UGC के नए नियमों में जातिगत समानता के नाम पर भेदभाव की ऐसी बेतुकी परिभाषा पेश की गई कि बवाल ही मच गया. जिसमें SC, ST और OBC को ही जातिगत भेदभाव पीड़ित माना गया. आखिर में सुप्रीम कोर्ट को इस पर स्टे लगाना पड़ा.
NCERT पाठ्यक्रम और उसमें होने वाला बदलाव गाहे-बगाहे विवादों में आया. इतिहास के चैप्टर्स में हुई छेड़छाड़ तो राजनीतिक बहस तक सीमित रह गई, लेकिन प्रधान के मंत्रालय की किरकिरी हुई कक्षा 8 के सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' से जुड़ा अध्याय डालने पर. सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ इस किताब पर ब्लैंकेट बैन लगाया, बल्कि मंत्रालय को अवमानना का नोटिस भी भेजा. इस पूरे विवाद में धर्मेंद्र प्रधान और उनका मंत्रालय बगले झांकते रहे, और ढंग से यह नहीं बता पाए कि NCERT किताबों का पाठ्यक्रम बदलते वक्त ऊंचे ओहदेदारों की क्या भूमिका होती है.
खैर, प्रधान को अक्षमता का सर्टिफिकेट मिला NEET की परीक्षा ठीक से न करा पाने को लेकर. 2024 से लेकर 2026 तक पेपर लीक करने वाले गिरोह बेखौफ अपनी दुकानें चलाते रहे, तो उठते सवालों और छात्रों के बढ़ते आक्रोश के बीच प्रधान को आखिरकार अपना पद छोड़ना पड़ा.
'चंपत कनेक्शन' : साफ छवि पर गिर पड़ा सड़े हुए सिस्टम का ढांचा
धर्मेंद्र प्रधान का यह सियासी हश्र सहज ही श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय के साथ जुड़ जाता है. राम मंदिर आंदोलन की भट्टी में तपे और विश्व हिंदू परिषद के पुराने स्तंभ रहे चंपत राय की गिनती भी हमेशा एक फकीराना अंदाज वाले समर्पित कार्यकर्ता के रूप में होती थी. जब तक मंदिर में आए दान-चढ़ावे की हेराफेरी में उनके अधीन काम करने वाले लोगों का नाम सामने नहीं आया था, तब तक उनकी नीयत पर किसी को शक नहीं था. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि SIT गठित करते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ कह रहे थे- 'मेरा दिल नहीं मानता है कि चंपत जी कुछ गलत कर सकते हैं'.
लेकिन जैसे ही चढ़ावे की चोरी की परतें खुलीं, जन-आक्रोश सीधे शीर्ष पर जा टकराया. चंपत राय पर प्रशासनिक ढिलाई और व्यवस्था को मजबूत न करने के गंभीर आरोप लगे. उन पर यह सवाल दागा गया कि समय रहते उन्होंने बुनियादी सुरक्षा और व्यवस्था के जो सुझाव दिए गए थे, उन पर ध्यान क्यों नहीं दिया. नतीजतन, फजीहत बढ़ी तो चंपत राय को भी अपने पद से इस्तीफा देकर पीछे हटना पड़ा.
धर्मेंद्र प्रधान हों या चंपत राय, दोनों से गलती यह हुई कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी को ही अपने मातहत पूरे तंत्र की ईमानदारी मान लिया. हकीकत यह है कि कोई भी ढांचा आपकी अपनी पवित्रता से नहीं, बल्कि आपकी पैनी नजर और सख्त निगरानी से चलता है. जब आपके नीचे काम करने वाले लोग सिस्टम में सेंध लगा रहे हों, तो उसकी कालिख से आपका दामन बेदाग नहीं रह सकता.
फाइलों में दबी रह गई सुधार की सिफारिशें
साल 2024 में नीट-यूजी के नतीजों के बाद जब असाधारण रूप से भारी संख्या में छात्रों के पूरे नंबर आए, तो देश भर के छात्र-छात्राओं का भरोसा डगमगा गया था. जगह-जगह से गिरफ्तारियां हुईं, साक्ष्य सामने आए और गिरोह के तार जुड़ते दिखे, लेकिन शुरुआत में मंत्रालय का रवैया नकारने वाला ही रहा. चौतरफा दबाव के बाद सरकार ने इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई, ताकि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कमियों को दूर किया जा सके और पूरी परीक्षा प्रणाली को फुलप्रूफ बनाया जा सके.
परंतु कड़वा सच यही है कि कमेटी के उन ठोस सुझावों को लागू करने में जितनी सुस्ती दिखाई गई, उसने माफिया के हौसले और बुलंद कर दिए. सख्त फैसलों में देरी का ही नतीजा था कि हर बार परीक्षा के समय लीकेज और धांधली के साये मंडराते रहे. जब सिफारिशें मेज पर रखी हों और फैसले लेने वाले हाथ ढीले पड़े रहें, तो फिर ऐसी विफलता का अंत इस्तीफे के रूप में ही होता है.
जिम्मेदारी से बच निकलने के रास्ते बंद
चंपत राय का इस्तीफा एक धार्मिक-सामाजिक दायरा रखता है. वे पद छोड़ कर अपने व्यक्तिगत जीवन में लौट सकते हैं. बेशक, राम मंदिर में हुई चोरी से श्रद्धालुओं की आस्था डोली होगी. लेकिन धर्मेंद्र प्रधान का मामला अलग है, वे एक संवैधानिक पद पर बैठे कैबिनेट मंत्री थे, जिनके फैसलों से देश की भावी पीढ़ी का भविष्य तय होता है. परीक्षा के प्रति छात्रों की आस्था डोली है, और यह मामला ज्यादा गंभीर है.
जब विपक्ष और आंदोलनकारी छात्रों ने सवाल उठाए, तो सरकार समर्थकों का तर्क था कि मंत्री खुद तो पेपर लीक करने नहीं गए थे. और ऐसा तो दूसरे राज्यों में भी हुआ है. ये कुतर्क प्रशासनिक जवाबदेही के मूल सिद्धांत की खिल्ली उड़ाते हैं. अगर मंत्री अपनी नाक के नीचे हो रही गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार नहीं है, तो फिर उस पद के लाव-लश्कर का मतलब ही क्या रह जाता है? क्या प्रधान को दिया गया मंत्रिपद सिर्फ इसी बात का पुरस्कार था कि उन्होंने पार्टी को कई मुश्किल चुनाव जितवाकर दिए?
राजनीति में दाग कभी 'चंपत' नहीं होते
चंपत राय की ट्रस्ट से विदाई हो या धर्मेंद्र प्रधान का केंद्रीय मंत्रिमंडल से जाना, इन दोनों मामलों ने सत्ता और संगठन को एक बड़ा सबक दिया है- व्यक्तिगत सादगी या निष्ठा किसी भी प्रशासनिक नाकामी का ढाल नहीं बन सकती. अगर आप व्यवस्था को चाक-चौबंद नहीं रख सकते, तो फिर इतिहास आपको एक ऐसे नेता के रूप में ही याद रखेगा, जिसकी अपनी छवि तो साफ थी, पर जिसकी ढिलाई ने पूरे सिस्टम को ही 'चंपत' कर दिया.
चंपत राय और फिर धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद भाजपा नेतृत्व ने कई कड़वे सबक सीखे होंगे, लेकिन महंगी कीमत चुकाकर.
चलते-चलते एक फलसफा : महान दार्शनिक अरस्तू ने अपनी एक थ्योरी में 'ट्रैजिक फ्लॉ' (Tragic Flaw) का जिक्र किया है- 'किसी चरित्रवान और महान व्यक्ति के भीतर मौजूद एक छोटी सी चारित्रिक या वैचारिक भूल ही उसके पतन का कारण बनती है.' धर्मेंद्र प्रधान का 'ट्रैजिक फ्लॉ' उनका वह अति-आत्मविश्वास था, जिसने उन्हें यह मानने पर मजबूर किया कि केवल बयानों और जांच के आदेशों से इतना बड़ा संकट टल जाएगा.
धीरेंद्र राय