साउथ पर फोकस, OBC एजेंडा और… कांग्रेस के 2029 प्लान में क्या-क्या है?

कांग्रेस आगामी लोकसभा चुनाव 2029 को ध्यान में रखते हुए दक्षिण भारत में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में सक्रिय दिखाई दे रही है. कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से जुड़े हालिया राजनीतिक फैसले संगठनात्मक प्राथमिकताएं, सामाजिक समीकरणों और नेतृत्व की भूमिकाओं को लेकर काफी सजग नजर आई है.

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया. (Photo: PTI) कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 29 मई 2026,
  • अपडेटेड 1:23 PM IST

राहुल गांधी के लिए आम चुनाव 2024 के नतीजे आत्मविश्वास बढ़ाने वाले थे. 2025 में तो दिल्ली से बिहार तक हिट एंड ट्रायल वाले नुस्खे आजमाए गए, लेकिन 2026 में चीजें शेप लेती लग रही हैं. तमिलनाडु, केरलम और कर्नाटक को लेकर कांग्रेस के फैसले तो ऐसे ही इशारे कर रहे हैं. 

2025 के दिल्ली चुनाव में राहुल गांधी ने जो अरविंद केजरीवाल के साथ किया, 2026 के पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मामले में भी कांग्रेस की वैसी ही रणनीति नजर आई. सीधे सीधे न सही, लेकिन बिहार में भी तेजस्वी यादव के साथ राहुल गांधी का सलूक मिलता जुलता ही रहा. क्षेत्रीय दलों के प्रति राहुल गांधी ने अपना नजरिया तो पहले ही साफ कर दिया था, धीरे धीरे उसे अमल में लाकर भी दिखा रहे हैं. 

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राहुल गांधी को सबसे ज्यादा चुनौती ममता बनर्जी से ही मिल रही थी, कुछ हद तक अरविंद केजरीवाल से भी. दोनों चुनावी हार के बाद अस्तित्व की लड़ाई में लग गए हैं. अरविंद केजरीवाल के साथ तो नहीं, लेकिन ममता बनर्जी के साथ तो राहुल गांधी अब सहानुभूति भी जताने लगे हैं. लोकसभा स्पीकर चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार उतार देने के बाद जब ममता बनर्जी नाराज हो गई थीं, तो राहुल गांधी ने फोन पर मनाया भी था. सिलसिला जारी है. 

बिहार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी का सपोर्ट तो तेजस्वी यादव ने भी किया था, लेकिन डीएमके नेता एमके स्टालिन इस मामले में सबसे ज्यादा निष्ठावान देखे गए हैं. लेकिन, तमिलनाडु में बड़ा मौका देखकर राहुल गांधी ने सी. जोसेफ विजय के लिए स्टालिन को भी झटका दे दिया है - ये सब 2024 में मिले आत्मविश्वास का ही असर नहीं तो क्या है?

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और, अब उसी तरीके से 2029 के एजेंडे पर काम चल रहा है जिसमें उत्तर के मुकाबले कांग्रेस का ज्यादा जोर दक्षिण भारत की राजनीति पर लग रहा है. विनम्रतापूर्वक मना कर देने के बावजूद सिद्धारमैया को कर्नाटक से दिल्ली लाने की कोशिशों के पीछे वजह भी यही लगती है. बीजेपी के लिए दक्षिण का द्वार खोलने का श्रेय पाने वाले बीएस येदियुरप्पा को दिल्ली लाया गया, मकसद था कर्नाटक में नए मुख्यमंत्री के लिए रास्ता साफ करना. सिद्धारमैया के साथ भी तो वैसा ही हुआ है, चूंकि राहुल गांधी के ओबीसी एजेंडे को सिद्धारमैया काफी सूट करते हैं, लिहाजा उनको दिल्ली में येदियुरप्पा से ज्यादा तवज्जो मिलने की उम्मीद की जा रही है.  

दक्षिण भारत पर कांग्रेस का जोर

2014 में कांग्रेस को हाथ से सत्ता चले जाने का दर्द बर्दाश्त हो गया था, लेकिन 2019 में अमेठी में राहुल गांधी की हार ज्यादा पीड़ादायक थी. तब केरलम का वायनाड मरहम बना था, और पांच साल बाद हालात और राजनीतिक समीकरण ऐसे बने कि 2024 में कांग्रेस ने वायनाड और रायबरेली तो बरकरार रखे ही, अमेठी में भी बीजेपी को शिकस्त देकर वापसी कर ली. 

अब उसी वायनाड वाले केरलम में कांग्रेस को सत्ता भी मिल गई है. यूडीएफ के चुनाव जीतने के बाद भी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री के लिए नाम तय कर पाना था. मुख्यमंत्री पद की रेस में राहुल गांधी के करीबी कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल शुरू से ही सबसे बड़े दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन कांग्रेस जमीन से जुड़े नेता वीडी सतीशन के नाम पर ही सहमति बनाने में सफल हुई. 

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वीडी सतीशन को भी मुख्यमंत्री की कुर्सी कोई थाली सजाकर नहीं मिली. बीते पांच साल में कांग्रेस को मुख्यधारा में लाने और बनाए रखने के साथ ही, वीडी सतीशन ने सबको साथ लेकर पार्टी की जीत भी पक्की की. और, जब लगा कि मेहनत पर पानी फिर जाएगा, तो समर्थकों को सक्रिय करके अपने पक्ष में मुहिम भी चलाई. राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ मीटिंग में दो टूक जवाब भी दिया. वीडी सतीशन ने साफ कर दिया था कि केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री के रूप में वो कतई स्वीकार नहीं करेंगे. 

2018 में भी कांग्रेस के सामने ऐसी ही चुनौती खड़ी हो गई थी. राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के मामलों में. और, 2023 में कर्नाटक में. चारों मामलों में कांग्रेस को मजबूरन, क्षेत्रीय नेताओं के दबाव में एक जैसे फैसले करने पड़े थे. केरलम में वीडी सतीशन के सेलेक्शन से कांग्रेस का फिर आत्मविश्वास बढ़ा - और उसका असर कर्नाटक के ताजा फैसले में भी महसूस किया जा सकता है. 

कर्नाटक में डीके शिवकुमार को भी वीडी सतीशन की ही तरह अपने लिए मुहिम चलानी पड़ी. जब लगा कि चीजें सही दिशा में नहीं जा रही हैं, तो वायनाड सांसद प्रियंका गांधी की भी मदद ली, और कांग्रेस को एक सही फैसला लेने में मददगार भी बने. जो काम कांग्रेस नेतृत्व राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मामलों में नहीं कर पाया, कर्नाटक में कर दिखाया है. एक वजह यह भी है कि सिद्धारमैया ने मजबूत नेता होने के बावजूद अशोक गहलोत और भूपेश बघेल की तरह कोई अड़ियल रवैया नहीं दिखाया है. 

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और वैसे ही, गठबंधन की राजनीति में भी कांग्रेस ने राजनीतिक चतुराई दिखाई है, या कहें कि मौके की नजाकत और अहमियत को सही से समझा है. तमिलनाडु में डीएमके के साथ चुनाव लड़ने के बाद दरकिनार कर मुख्यमंत्री विजय की पार्टी टीवीके साथ करार कर लिया है. और, उससे भी बड़ी बात यह है कि तमिलनाडु कैबिनेट में भी कांग्रेस ने हिस्सेदारी कर ली है, जो डीएमके के साथ कभी संभव नहीं हो सका था. 

धीरे धीरे कदम बढ़ाते हुए कांग्रेस दक्षिण भारत के राज्यों में पांव मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है. राज्यों की मजबूती ही कांग्रेस को 2029 के लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन सुनिश्चित कर सकती है. वैसे कांग्रेस को उन चीजों को भी समझना होगा जिनकी वजह से 2018 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने के बाद भी कांग्रेस छह महीने के भीतर हुए 2019 के लोकसभा चुनावों में चूक गई थी. गलतियों से सबक लेने पर भूल सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है. 

दक्षिण की जमीन से 2029 की तैयारी

कर्नाटक में सिद्धारमैया को हटाकर डीके शिवकुमार को नेतृत्व सौंप देने का फैसला राहुल गांधी के नेतृत्व पर उठने वाले सवालों का सही जवाब तो है, लेकिन उसमें भी लोचा है. और, इसीलिए यह फैसला काफी जोखिमभरा भी है. कांग्रेस नेतृत्व कदम कदम पर कर्नाटक के लोगों को संदेश देने की कोशिश कर रहा है सिद्धारमैया सब खुशी खुशी कर रहे हैं. और, कांग्रेस नेतृत्व सिद्धारमैया को केंद्र में बड़ी भूमिका भी देने जा रहा है. 

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सिद्धारमैया का केस भी कुछ कुछ बिहार में नीतीश कुमार से सत्ता हस्तांतरण जैसा ही लग रहा है, लेकिन थोड़ा फर्क भी है. सिद्धारमैया ने विनम्रतापूर्वक राज्यसभा और केंद्र में महत्वपूर्ण भूमिका का ऑफर ठुकरा दिया है. फिर भी सिद्धारमैया को राजी करने के लिए दिल्ली बुलाया गया है. संयोग ऐसा बना कि सिद्धारमैया को जयपुर होकर दिल्ली आना पड़ा. जयपुर में अशोक गहलोत से मुलाकात भी हुई. मालूम नहीं अशोक गहलोत के राजनीतिक कौशल का सिद्धारमैया पर कोई असर हुआ है या नहीं. 

सिद्धारमैया के राज्यसभा जाने पर तो अभी सस्पेंस है, लेकिन एक बात पक्की है कि उनके बेटे यतींद्र भी निशांत कुमार की ही तरह मंत्री बनने जा रहे हैं. और, रिपोर्ट के मुताबिक, बेटे के लिए सिद्धारमैया भी मिलता जुलता ही विभाग चाह रहे हैं. निशांत कुमार बिहार के स्वास्थ्य मंत्री बनाए गए हैं, जबकि यतींद्र के लिए सिद्धारमैया मेडिकल एजुकेशन और पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग या उद्योग या जल संसाधन विभाग चाहते हैं. दिल्ली पहुंचते ही सिद्धारमैया को राहुल गांधी ने गले लगाया, और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से भी उनकी मुलाकात हुई है.

कर्नाटक में फिलहाल जो भी फैसले लिए जा रहे हैं, निगाहें 2028 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव पर हैं. डीके शिवकुमार के नेतृत्व में बन रही नई सरकार में तीन डिप्टी सीएम बनाए जाने की चर्चा है. चूंकि डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से हैं, इसलिए पिछड़े और एससी समुदाय से डिप्टी सीएम बनाने की तैयारी है. एससी कोटे से डिप्टी सीएम की पोस्ट के लिए जी. परमेश्वर और मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे बड़े दावेदार माने जा रहे हैं.

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2029 के राहुल गांधी के एजेंडे में ओबीसी का मुद्दा भी है. 2023 के विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने जाति जनगणना का मुद्दा जोर शोर से उछाला था. केंद्र सरकार में ओबीसी सचिवों की संख्या पर भी बार बार सवाल उठाते रहे. और, इस मामले में राहुल गांधी को अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसे क्षेत्रीय नेताओं का भी साथ मिला. नतीजा यह हुआ कि विपक्ष की मुहिम की धार कुंद करने के लिए केंद्र की बीजेपी सरकार को जातीय जनगणना कराने का फैसला लेना पड़ा. 

राहुल गांधी अब ओबीसी के उसी एजेंडे में सिद्धारमैया को भी साथ लेना चाहते हैं. अगर मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस का सबसे बड़ा दलित चेहरा हैं, तो सिद्धारमैया सबसे बड़ा ओबीसी चेहरा हैं. दोनों ही कांग्रेस के सबसे बुजुर्ग नेताओं में शुमार हैं, लेकिन एक्टिव भी हैं. 

दक्षिण भारत की राजनीति की बात करें, तो कांग्रेस ने तमिलनाडु पार्टनर जरूर बदल लिया है, लेकिन एजेंडा नहीं. संसद में महिला आरक्षण संशोधन बिल के साथ लाए गए परिसीमन बिल के विरोध में कांग्रेस डीएमके के साथ थी, आगे टीवीके साथ रहेगी. तब एमके स्टालिन की तरह विजय ने भी परिसीमन बिल का विरोध किया था, जबकि AIADMK नेता ईके पलानीस्वामी बीजेपी के समर्थन में खड़े पाए गए थे. 

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2021 के केरलम विधानसभा चुनाव कैंपेन के दौरान राहुल गांधी ने उत्तर भारतीयों के मुकाबले दक्षिण भारत के लोगों की राजनीतिक समझ को बेहतर बताया था. तब उसे अमेठी की हार के गुस्से के तौर पर भी देखा गया था, अब तो अमेठी वालों ने लोकसभा सीट देकर मुंह भी बंद कर दिया है - देखना है आम चुनाव तक राहुल गांधी का स्टैंड बरकरार रहता है या बदलाव होता है.

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