आजकल अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी में कुछ अलग बात दिख रही है, यह सिर्फ़ 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद आया आत्मविश्वास नहीं है, यह सिर्फ़ पार्टी की राजनीतिक शब्दावली का विस्तार भी नहीं है और निश्चित रूप से, यह चुनावी जातिगत समीकरण बनाने की कोई आम कोशिश भी नहीं है. बड़ा बदलाव उस तरीके में है जिससे अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी को पेश कर रहे हैं.
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी (SP) को लंबे समय तक उसके पारंपरिक सामाजिक आधार वाली पार्टी के तौर पर ही देखा जाता रहा, लेकिन अब पार्टी की राजनीतिक भाषा और रणनीति में बदलाव के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं. आज की SP अपने पुराने सामाजिक समीकरण से आगे बढ़कर एक ज्यादा व्यापक राजनीतिक पहचान गढ़ने की कोशिश करती नजर आ रही है.
इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण इसी महीने की शुरुआत में सामने आया, जब अखिलेश यादव ने पार्टी के PDA फॉर्मूले को नया अर्थ देते हुए कहा कि 'P' का मतलब 'पंडित' भी होता है. यह महज एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी, इसके पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश था और यह संकेत देता है कि अखिलेश यादव आज के उत्तर प्रदेश में SP की सामाजिक और राजनीतिक पहुंच को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं.
वह पल, जिसने SP का आत्मविश्वास बदला
किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनावी आंकड़े सिर्फ सीटों और वोट प्रतिशत का हिसाब नहीं होते. वे पार्टी के आत्मविश्वास, संगठनात्मक ऊर्जा और भविष्य की रणनीति को भी प्रभावित करते हैं. 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में BJP ने 403 में से 255 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि SP के खाते में 111 सीटें आई थीं. BJP को करीब 41.3 फीसदी वोट मिले, जबकि SP का वोट शेयर लगभग 32.1 फीसदी रहा.
लेकिन दो साल बाद हुए 2024 के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश का राजनीतिक समीकरण काफी हद तक बदल दिया. SP ने राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 37 पर जीत दर्ज कर उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया. BJP को 33 और कांग्रेस को छह सीटें मिलीं, SP का वोट शेयर भी बढ़कर करीब 33.6 फीसदी हो गया.
SP के लिए 2024 की यह कामयाबी सिर्फ 37 सीटों तक सीमित नहीं थी, इससे पार्टी को सबसे महत्वपूर्ण चीज मिली जीतने का भरोसा. यही भरोसा किसी राजनीतिक संगठन की कार्यशैली और उसके नेताओं के आत्मविश्वास को बदल सकता है. जब किसी पार्टी को लगता है कि वह सत्ता के मुकाबले में मजबूती से खड़ी हो सकती है, तो कार्यकर्ताओं में ऊर्जा बढ़ती है, नेता ज्यादा आक्रामक और आत्मविश्वासी होकर अपनी बात रखते हैं और संभावित उम्मीदवार भी पार्टी के साथ अपनी राजनीतिक संभावनाएं जोड़ने लगते हैं.
यही मनोवैज्ञानिक बदलाव आज SP के राजनीतिक संदेश में भी दिखाई देता है. पार्टी अब सिर्फ अपने पारंपरिक सामाजिक आधार तक सीमित रहने के बजाय नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने और अपनी राजनीतिक अपील को व्यापक करने की कोशिश करती नजर आ रही है.
सबसे बड़ा बदलाव: बातचीत का तरीका
एक पॉलिटिकल कम्युनिकेटर के तौर पर अखिलेश यादव का विकास शायद SP की मौजूदा कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है. उनकी राजनीति अब सिर्फ़ समाजवादी राजनीति की पारंपरिक भाषा या BJP के विरोध के ज़रिए लोगों तक नहीं पहुंचाई जा रही है. PDA उनकी पॉलिटिकल बातचीत का मुख्य आधार बन गया है. शुरू में इसे पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (PDA) के तौर पर पेश किया गया था. यह एसपी की पारंपरिक मुस्लिम-यादव पहचान से हटकर एक सामाजिक गठबंधन बनाने की कोशिश थी.
अब अखिलेश साफ़ तौर पर इस शब्दावली में 'पंडित' को भी शामिल कर रहे हैं. यह संदेश इसलिए अहम है क्योंकि यह ब्राह्मण वोटर को SP की पुरानी छवि से बिल्कुल अलग बात बताता है, पार्टी कह रही है आप हमारी राजनीतिक बातचीत से बाहर नहीं हैं. यह बात इसलिए भी खास है क्योंकि उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक रूप से BJP को ऊंची जाति के वोटरों का काफी समर्थन मिलता रहा है.
इसलिए, अखिलेश की हालिया कोशिश सिर्फ़ शब्दों के बदलाव से कहीं ज़्यादा है. यह SP की राजनीतिक पहचान को और व्यापक बनाने की कोशिश है. और अहम बात यह है कि वह PDA को छोड़े बिना ऐसा कर रहे हैं. संतुलन बनाने की यही कोशिश असली कहानी है.
ब्राह्मणों तक पहुंच, इसमें कुछ भी छिपा-छिपाया नहीं
अखिलेश यादव की हालिया ब्राह्मण पहुंच असामान्य रूप से सीधी रही है. लखनऊ में समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्रा की जयंती के मौके पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि पीडीए में “पी” का मतलब पंडित भी है. उन्होंने आगे कहा, “मैं इसमें एक और बात जोड़ना चाहता हूं. आज के राजनीतिक परिदृश्य में ‘पी’ का मतलब पीड़ित भी होता है. अंग्रेजी में इसका अर्थ पीड़ित, शोषित या प्रताड़ित व्यक्ति से है.
इस कार्यक्रम का प्रतीकात्मक महत्व भी उतना ही स्पष्ट था, अखिलेश यादव ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, समुदाय के प्रतिनिधियों और धार्मिक हस्तियों के साथ मंच साझा किया. यह कार्यक्रम उन समुदायों तक पहुंच बनाने की समाजवादी पार्टी की व्यापक कोशिश का हिस्सा था, जो ऐतिहासिक रूप से दूसरे राजनीतिक दलों के साथ ज्यादा सहज रहे हैं.
इंडिया टुडे की हालिया रिपोर्टिंग ने इस कदम को समाजवादी पार्टी की अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव समर्थन से आगे बढ़कर अपना सामाजिक आधार व्यापक करने की कोशिश का अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत बताया. लेकिन दिलचस्प सवाल यह नहीं है कि क्या हर ब्राह्मण मतदाता अचानक समाजवादी पार्टी की ओर चला जाएगा.
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी इस धारणा को बदल सकती है कि वह मुख्य रूप से किसी खास सामाजिक समूह के लिए बनी पार्टी है.
राजनीतिक पार्टियां भी एक तरह की पहचान होती हैं. और यह पहचान तब बदलती है, जब उनका राजनीतिक संवाद लगातार और स्पष्ट रूप से बदलता है.
पीडीए से व्यापक राजनीतिक पहचान तक
यह अखिलेश यादव की शायद सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संवाद की कवायद है. वर्षों से उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने अपने राजनीतिक संवाद के जरिए खुद को एक व्यापक सामाजिक और वैचारिक गठबंधन के रूप में सफलतापूर्वक पेश किया है. वहीं, समाजवादी पार्टी को इस धारणा से जूझना पड़ा है कि उसका राजनीतिक समर्थन कुछ खास समुदायों तक सीमित है.
पीडीए इस समस्या का अखिलेश यादव का जवाब था, इस राजनीतिक सूत्र में पंडित को शामिल करना इसी कवायद का अगला चरण है. यह राजनीतिक बातचीत को इस सवाल से आगे ले जाने की कोशिश है- “परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी को कौन वोट देता है?” और इसे इस सवाल की ओर ले जाना है- “कौन खुद को समाजवादी पार्टी के जरिए प्रतिनिधित्व पाता हुआ देख सकता है?
यह कहीं ज्यादा महत्वाकांक्षी राजनीतिक प्रस्ताव है, यही वजह है कि 2022 के बाद के दौर की तुलना में समाजवादी पार्टी का मौजूदा राजनीतिक संवाद अलग नजर आता है. समाजवादी पार्टी अपने संदेश को नियंत्रित करना भी सीख रही है.
राजनीतिक परिपक्वता का एक और संकेत संदेश में अनुशासन है.
अखिलेश यादव ने हाल ही में समाजवादी पार्टी के नेताओं को ऐसे बयान देने से बचने की चेतावनी दी है, जो अनावश्यक विवाद पैदा कर सकते हैं या भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक फायदा पहुंचा सकते हैं.
यह एक छोटा-सा संगठनात्मक निर्देश लग सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है. किसी विपक्षी पार्टी के लिए राजनीतिक संवाद में अनुशासन बेहद महत्वपूर्ण होता है. किसी एक नेता का विवादित बयान पूरे संगठन के लिए राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन सकता है. अखिलेश यादव इस बात को लेकर लगातार ज्यादा जागरूक नजर आ रहे हैं.
उद्देश्य सरल है राजनीतिक बातचीत को उन मुद्दों और सामाजिक गठबंधन पर केंद्रित रखना, जिनके बारे में समाजवादी पार्टी बात करना चाहती है. यह प्रतिक्रियात्मक राजनीति से एक महत्वपूर्ण बदलाव है.
कम रक्षात्मक समाजवादी पार्टी
एक और सूक्ष्म बदलाव दिखाई देता है, अखिलेश यादव अब भारतीय जनता पार्टी के विकल्प के तौर पर खुद को परिभाषित करने के बजाय समाजवादी पार्टी को अपनी शर्तों पर परिभाषित करने में ज्यादा सहज नजर आ रहे हैं.
यह अंतर महत्वपूर्ण है. विपक्ष की राजनीति आलोचना के इर्द-गिर्द बनाई जा सकती है, लेकिन एक राजनीतिक पार्टी जो अपना समर्थन आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है, उसे अपनी खुद की पहचान का संवाद करना होता है.
पीडीए वह पहचान प्रदान करता है, ब्राह्मणों तक पहुंच उस पहचान में एक और परत जोड़ती है. प्रतिनिधित्व पर जोर एक और परत जोड़ता है, और 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे से मिला आत्मविश्वास इस पूरी कवायद को विश्वसनीयता देता है.
इसलिए समाजवादी पार्टी सिर्फ यह संदेश नहीं दे रही है “भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ वोट करें.”
वह तेजी से यह संदेश देने की कोशिश कर रही है- “यह वह सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन है, जिसका प्रतिनिधित्व समाजवादी पार्टी करती है.”
यह कहीं ज्यादा मजबूत राजनीतिक प्रस्ताव है.
भारतीय जनता पार्टी बेंचमार्क है, लेकिन...
बेशक, भारतीय जनता पार्टी एक मजबूत राजनीतिक संगठन बनी हुई है, जिसका उत्तर प्रदेश में गहराई से स्थापित चुनावी और संगठनात्मक नेटवर्क है, लेकिन मौजूदा दौर का महत्व यह है कि अखिलेश यादव उस संगठन को सिर्फ उस पर हमला करके हराने की कोशिश करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं.
वह उसके आसपास की राजनीतिक जगह को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, यह एक अलग रणनीति है, मौजूदा राजनीतिक पहचान छोड़ने के लिए मतदाताओं से कहने के बजाय, समाजवादी पार्टी अतिरिक्त समुदायों से यह कहने की कोशिश कर रही है कि वे उसके राजनीतिक ढांचे के भीतर अपना प्रतिनिधित्व पा सकते हैं.
इसीलिए ब्राह्मणों तक पहुंच महत्वपूर्ण है, इसीलिए पीडीए महत्वपूर्ण है, और इसी वजह से 2024 का नतीजा महत्वपूर्ण है,
और फिर मायावती हैं
उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने के लिए मायावती और बहुजन समाज पार्टी आज भी महत्वपूर्ण हैं, खासकर इसलिए क्योंकि बहुजन समाज पार्टी के वोट आधार को यूं ही खत्म मान लेना सही नहीं होगा, लेकिन आज ज्यादा दिलचस्प विकास यह है कि समाजवादी पार्टी अपने आसपास खुली राजनीतिक जगह के साथ क्या कर रही है.
अखिलेश यादव इस बात पर ज्यादा ध्यान देते हुए नजर आ रहे हैं कि वे अपना गठबंधन कैसे व्यापक कर सकते हैं, बजाय इसके कि राजनीतिक बातचीत को सिर्फ भारतीय जनता पार्टी बनाम समाजवादी पार्टी की दोहरी लड़ाई तक सीमित रहने दें.
यही समाजवादी पार्टी की मौजूदा स्थिति को उसकी पुरानी चुनावी छवि से ज्यादा दिलचस्प बनाता है.
शायद सबसे आसान गलती यह होगी कि अखिलेश यादव को सिर्फ 2022 के विधानसभा चुनाव के नजरिए से देखा जाए, उस समय के अखिलेश यादव और आज के अखिलेश यादव एक ही राजनीतिक स्थिति से संवाद नहीं कर रहे हैं.
2022 के चुनाव ने भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बढ़त दी थी, 2024 के लोकसभा चुनाव ने समाजवादी पार्टी को कुछ अलग दिया राजनीतिक आत्मविश्वास. और 2026 में अखिलेश यादव उस आत्मविश्वास का इस्तेमाल अपनी पार्टी की पहचान के साथ प्रयोग करने के लिए कर रहे हैं.
एक ज्यादा मुखर राजनीतिक व्यक्तित्व
ये अलग-अलग घटनाक्रम नहीं हैं, साथ मिलकर ये एक ऐसी समाजवादी पार्टी की ओर इशारा करते हैं, जो विरासत में मिले समर्थन वाली पार्टी से कम और एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने में सक्षम पार्टी के रूप में ज्यादा नजर आने की कोशिश कर रही है. अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी को लेकर होने वाली राजनीतिक बातचीत को बदल दिया है और राजनीति में बातचीत को बदलना एक अच्छी, नई शुरुआत होती है.
अभिषेक त्रिपाठी