न सड़क थी, न एंबुलेंस, न नाव... प्रेग्नेंट महिला दर्द से तड़प रही थी... फिर घर का दरवाजा बना सहारा, झकझोर देगी ये कहानी

ओडिशा के भद्रक में बाढ़ ने एक परिवार को ऐसा जुगाड़ करने पर मजबूर कर दिया, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है. गांव चारों तरफ पानी से घिरा था, एंबुलेंस पहुंच नहीं सकती थी. गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई. परिवार ने घर का लकड़ी का दरवाजा निकाला और उसे नाव की तरह इस्तेमाल कर अस्पताल पहुंचाया. डिलीवरी के बाद फिर उसी दरवाजे पर बैठकर वापस आना पड़ा.

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अस्पताल पहुंचते ही एक मिनट बाद हो गई डिलीवरी. (Photo: Screengrab) अस्पताल पहुंचते ही एक मिनट बाद हो गई डिलीवरी. (Photo: Screengrab)

अजय कुमार नाथ

  • भुवनेश्वर,
  • 23 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 2:36 PM IST

सोचिए... चारों तरफ पानी है. सड़क दिखाई नहीं दे रही. एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकती. नाव है नहीं. और इसी बीच एक प्रेग्नेंट महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो जाती है. अब अस्पताल कैसे पहुंचेंगे? ओडिशा के भद्रक में एक परिवार ने इसका जो जुगाड़ निकाला, वो सुनकर आप कुछ पल के लिए ठहर जाएंगे.

घर का दरवाजा निकाला गया. उसे बांस के सहारे तैरने लायक बनाया गया. और उसी पर गर्भवती महिला को बैठाकर बाढ़ का पानी पार कराया गया. मंजिल थी अस्पताल... और वहां पहुंचने के महज एक मिनट बाद बच्चे की किलकारी गूंज उठी. बच्चे के जन्म के तीन दिन बाद मां को उसी रास्ते से वापस घर लौटना पड़ा. और इस बार उसके हाथ में उसका तीन दिन का नवजात बच्चा था. मामला ओडिशा के भद्रक जिले के बासुदेवपुर ब्लॉक का है. जगन्नाथ प्रसाद पंचायत के दधिवामनपुर इलाके में पड़ने वाला पाल गांव इन दिनों बाढ़ के पानी से घिरा हुआ है.

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ग्रामीणों के मुताबिक, गांव से बाहर निकलना आसान नहीं है. कहीं कमर तक पानी है तो कहीं रास्ता पूरी तरह डूब चुका है. जरूरी सामान लेने या इलाज के लिए लोगों को पानी के बीच से होकर जाना पड़ता है. इसके बाद करीब दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है.

पास ही मंतेई नदी है और ग्रामीणों के मुताबिक, नदी में मगरमच्छ भी देखे जाते हैं. यानी एक तरफ बाढ़ का पानी... दूसरी तरफ मगरमच्छ का डर... और इसी के बीच लोगों को अपनी जिंदगी चलानी पड़ रही है.

18 अगस्त को पूजारानी को प्रसव पीड़ा हुई

पाल गांव की रहने वाली पूजारानी मलिक, परशुराम मलिक की पत्नी हैं. 18 अगस्त को अचानक उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई. अब परिवार के सामने सबसे जरूरी काम था- उन्हें किसी भी तरह अस्पताल पहुंचाना. लेकिन समस्या ये थी कि गांव बाढ़ में घिरा था. एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकती थी. कोई नाव उपलब्ध नहीं थी. ऐसे में परिवार ने घर के अंदर नजर दौड़ाई. और फिर वो चीज सामने आई, जिसने उस दिन नाव का काम किया.

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घर का लकड़ी का दरवाजा... परिवार ने दरवाजा निकाला. उसे बांस की मदद से इस्तेमाल करने लायक बनाया और पूजारानी को उस पर बैठाकर बाढ़ के पानी में निकल पड़े. सोचिए, जिस दरवाजे को रोज घर के अंदर-बाहर आने-जाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वही उस दिन एक गर्भवती महिला के लिए सहारा बन गया.

किसी तरह पूजारानी को बासुदेवपुर कम्युनिटी हेल्थ सेंटर पहुंचाया गया. अस्पताल के रिकॉर्ड के मुताबिक, उन्हें सुबह 9 बजकर 25 मिनट पर भर्ती कराया गया. और इसके ठीक एक मिनट बाद... 9 बजकर 26 मिनट पर उन्होंने बेटे को जन्म दिया. एक तरफ परिवार बाढ़ से लड़कर अस्पताल तक पहुंचा था. दूसरी तरफ अस्पताल में एक नई जिंदगी दुनिया में आ चुकी थी. शायद उस वक्त परिवार के लिए इससे बड़ी राहत कोई और नहीं हो सकती थी.

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लेकिन बाहर हालात अभी भी वैसे ही थे. बाढ़ का पानी उतरा नहीं था. गांव का रास्ता खुला नहीं था. पूजारानी और उनका बच्चा अस्पताल में तीन दिन रहे. फिर घर लौटने का वक्त आया. लेकिन गांव तक जाने वाला रास्ता अभी भी पानी में डूबा हुआ था.

अब सवाल फिर वही था- घर कैसे पहुंचें? जवाब भी वही था. वही दरवाजा... तीन दिन पहले जिस दरवाजे पर बैठाकर परिवार पूजारानी को अस्पताल लेकर गया था, तीन दिन बाद उसी पर उन्हें वापस घर लाया गया. फर्क सिर्फ इतना था कि अब पूजारानी के हाथ में उनका तीन दिन का बच्चा था. वो उसे अपनी गोद में लिए बैठी थीं और परिवार बाढ़ का पानी पार कर रहा था. एक मां... तीन दिन का बच्चा... और नीचे बहता बाढ़ का पानी.

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इस घटना के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन पर सवाल उठाए हैं. स्थानीय निवासी संजुलता मलिक का आरोप है कि गांव करीब एक महीने से बाढ़ के पानी से प्रभावित है. इसके बावजूद प्रशासन की तरफ से पर्याप्त मदद नहीं मिल रही. उनका कहना है कि गांव में ओडीआरएएफ की टीम के अलावा कोई प्रशासनिक अधिकारी नहीं पहुंचा. रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी उन्हें पानी पार करना पड़ रहा है. और अगर किसी को अचानक इलाज की जरूरत पड़ जाए, तो मुश्किल कई गुना बढ़ जाती है.

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पूजारानी की कहानी सुनकर शायद सबसे पहले यही ख्याल आए कि उन्होंने और उनके परिवार ने कितनी मुश्किल झेली होगी. लेकिन असली सवाल इससे बड़ा है. क्या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए घर का दरवाजा नाव बनाना पड़ना चाहिए? क्या किसी गांव में एंबुलेंस का पहुंचना इतना मुश्किल होना चाहिए? और अगर बाढ़ के कारण सड़क बंद है, तो क्या ऐसे गांवों के लिए पहले से कोई वैकल्पिक इंतजाम नहीं होना चाहिए?

इस बार एक परिवार ने जुगाड़ निकाल लिया. घर का दरवाजा नाव बन गया. एक मां अस्पताल पहुंच गई. बेटा दुनिया में आ गया. तीन दिन बाद वही दरवाजा मां और बच्चे को वापस घर भी ले आया. लेकिन सवाल है कि बाढ़ का पानी उतर जाएगा. रास्ते खुल जाएंगे. जिंदगी फिर सामान्य हो जाएगी, लेकिन अगली बार अगर किसी और महिला को प्रसव पीड़ा हुई, तो क्या उसके लिए भी कोई दरवाजा नाव बनकर तैयार होगा?

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