जितनी महीने की कमाई, उतना एक दिन का खर्च! चौंका देगा घाटे में दौड़ रही भोपाल मेट्रो का हिसाब

भोपाल मेट्रो में यात्रियों की कम संख्या और सीमित कमाई ने आर्थिक चुनौती बढ़ा दी है. एम्स से सुभाष नगर के बीच 7 किलोमीटर के प्रायोरिटी कॉरिडोर पर चल रही मेट्रो के संचालन पर रोज करीब 5 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं, जबकि टिकटों से महीनेभर में सिर्फ 4 से 5 लाख रुपये की आय हो रही है.

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भोपाल मेट्रो में हर दिन खाली रह जा रही हैं आधी से ज्यादा सीटें. (File Photo: ITG) भोपाल मेट्रो में हर दिन खाली रह जा रही हैं आधी से ज्यादा सीटें. (File Photo: ITG)

धर्मेंद्र साहू

  • भोपाल,
  • 27 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 7:00 AM IST

राजधानी भोपाल में मेट्रो की चमक तो दिखाई दे रही है, लेकिन यात्रियों की संख्या और कमाई के आंकड़े इसकी रफ्तार पर सवाल खड़े कर रहे हैं. आधुनिक सफर का सपना लेकर शुरू हुई मेट्रो फिलहाल सीमित यात्रियों के सहारे दौड़ रही है. हर दिन करीब 5 लाख रुपये के संचालन खर्च के मुकाबले पूरे महीने में टिकटों से महज 4 से 5 लाख रुपये की आय हो रही है. यानी एक दिन के संचालन पर जितनी रकम खर्च हो रही है, उतनी कमाई जुटाने में मेट्रो को पूरा महीना लग रहा है. हालांकि, मेट्रो प्रबंधन का कहना है कि इसे केवल मुनाफे के नजरिए से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह शहर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का अहम हिस्सा है.

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सात किलोमीटर के ट्रैक पर सवारी का इंतजार
भोपाल में एम्स से सुभाष नगर के बीच करीब सात किलोमीटर लंबे प्रायोरिटी कॉरिडोर पर दिसंबर 2025 में मेट्रो सेवा शुरू हुई थी. शुरुआत में उम्मीद जताई गई थी कि मेट्रो शहर के यातायात को नई दिशा देगी और लोगों को जाम से राहत दिलाने में मदद करेगी. लेकिन फिलहाल आठ स्टेशनों तक सीमित इस रूट पर यात्रियों की संख्या उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ सकी है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, महीनेभर में करीब 13 से 15 हजार यात्री मेट्रो से सफर कर रहे हैं. सीमित नेटवर्क के चलते मेट्रो अभी शहर के बड़े हिस्से को सीधे जोड़ने में सक्षम नहीं हैं, जिसका असर इसकी उपयोगिता और कमाई दोनों पर पड़ रहा है.

एक दिन का खर्च पांच लाख, महीने की कमाई भी इतनी नहीं
मेट्रो के संचालन पर प्रतिदिन करीब पांच लाख रुपये खर्च हो रहे हैं. इस हिसाब से मासिक संचालन खर्च लगभग डेढ़ करोड़ रुपये तक पहुंचता है. वहीं, यात्रियों से मिलने वाला किराया पूरे महीने में केवल 4 से 5 लाख रुपये के आसपास है. इन आंकड़ों के बीच का अंतर मेट्रो के सामने खड़ी आर्थिक चुनौती को साफ तौर पर दिखाता है. हालांकि, यह गणना संचालन खर्च और टिकटों से होने वाली आय पर आधारित है. मेट्रो को विज्ञापन और दूसरी व्यावसायिक गतिविधियों से मिलने वाला राजस्व अलग है, इसलिए कुल आय का आकलन करने के लिए सभी स्रोतों के आंकड़े जरूरी हैं.

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जनसंपर्क अधिकारी धीरज शुक्ला क्या बोले ?
मेट्रो के खर्च और कमाई के बीच बड़े अंतर पर मेट्रो के जनसंपर्क अधिकारी धीरज शुक्ला का कहना है कि भोपाल मेट्रो लगातार यात्री सुविधाओं को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रही है. उनके मुताबिक मेट्रो का एक दिन का संचालन खर्च करीब पांच लाख रुपये है, जबकि महीनेभर में 13 से 15 हजार यात्री सफर करते हैं. इन यात्रियों से लगभग 4 से 5 लाख रुपये की आय होती है.

धीरज शुक्ला का कहना है कि मेट्रो सार्वजनिक परिवहन का साधन है, इसलिए इसे केवल मौजूदा कमाई के आधार पर नहीं देखा जा सकता. फिलहाल नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा है. जब शहर के अलग-अलग हिस्सों तक मेट्रो की कनेक्टिविटी पहुंचेगी, तब यात्रियों की संख्या बढ़ने के साथ आय में भी इजाफा होने की उम्मीद है. उन्होंने कहा कि यात्री सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और मेट्रो को ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए उपयोगी बनाने के प्रयास लगातार जारी हैं.

जन्मदिन, प्री-वेडिंग शूट और विज्ञापन से कमाई की कोशिश
टिकटों से सीमित आय के बीच मेट्रो प्रबंधन गैर-किराया राजस्व बढ़ाने के विकल्पों पर भी काम कर रहा है. इसके तहत मेट्रो के अंदर जन्मदिन मनाने, किटी पार्टी और प्री-वेडिंग शूट जैसे आयोजनों की सुविधा दी जा रही है. इसके अलावा विज्ञापनों के जरिए भी राजस्व जुटाने की कोशिश की जा रही है. प्रबंधन का मानना है कि ऐसी गतिविधियां मेट्रो की कमाई बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती हैं. हालांकि, इन माध्यमों से अब तक कितनी अतिरिक्त आय हुई है, इसका विस्तृत आंकड़ा सामने आना बाकी है.

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स्टेशन तक पहुंच आसान नहीं, तो यात्री क्यों चुनेंगे मेट्रो?
मेट्रो में कम यात्रियों की एक बड़ी वजह सीमित रूट के साथ-साथ लास्ट माइल कनेक्टिविटी की चुनौती भी मानी जा रही है. किसी भी मेट्रो सेवा की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि यात्री अपने घर से स्टेशन तक और स्टेशन से अंतिम गंतव्य तक कितनी आसानी से पहुंच पाते हैं. यदि स्टेशन तक पहुंचने के लिए पर्याप्त फीडर बसें, ई-रिक्शा या दूसरे साधन उपलब्ध नहीं होंगे, तो लोग निजी वाहनों और पारंपरिक सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दे सकते हैं.

इसके अलावा रोजाना कार्यालय जाने वाले कर्मचारियों, विद्यार्थियों और दूसरे नियमित यात्रियों के लिए मेट्रो तभी सुविधाजनक विकल्प बनेगी, जब उसका नेटवर्क शहर के प्रमुख व्यावसायिक, शैक्षणिक और रिहायशी इलाकों से बेहतर तरीके से जुड़ेगा. 

विस्तार से उम्मीद, लेकिन फिलहाल घाटे का दबाव
भोपाल मेट्रो के नेटवर्क का विस्तार भविष्य में यात्रियों की संख्या बढ़ाने की उम्मीद जरूर जगाता है, लेकिन तब तक संचालन खर्च और सीमित आय के बीच संतुलन बनाना प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौती रहेगा. बेहतर कनेक्टिविटी, नियमित यात्रियों के लिए सुविधाजनक योजनाएं, स्टेशनों तक पहुंचने के साधन और विज्ञापन जैसी गतिविधियों से होने वाली आय इस चुनौती को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.

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फिलहाल भोपाल मेट्रो के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ट्रेनें कितनी रफ्तार से दौड़ रही हैं, बल्कि यह भी है कि उनमें सफर करने वालों की संख्या कब बढ़ेगी. प्रबंधन को उम्मीद है कि पूरे शहर में नेटवर्क फैलने के बाद तस्वीर बदलेगी. लेकिन मौजूदा स्थिति यही बताती है कि मेट्रो को शहर की रोजमर्रा की जरूरत बनाने के लिए अभी यात्रियों का भरोसा जीतना होगा. अब देखना होगा कि विस्तार की योजनाएं कब तक मेट्रो को खाली सीटों से आगे बढ़ाकर आम लोगों की पहली पसंद बना पाती हैं.

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