मावा बचाने की मजबूरी में बनी थी 'गुलाब जामुन', ऐसा है 400 साल पुराना इतिहास

गुलाब जामुन की उत्पत्ति एक अनजाने प्रयोग से हुई थी जब मावा खराब होने से बचाने के लिए उसे तला गया और चाशनी में डुबोया गया. यह मिठाई मुगल बादशाह शाहजहां के दौर की है और फारसी मिठाई 'लुकमत-अल-कादी' से प्रभावित है.

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गुलाब जामुन भारत में अलग-अलग तरीके से बनाई जाती है. (Photo: AI Generated) गुलाब जामुन भारत में अलग-अलग तरीके से बनाई जाती है. (Photo: AI Generated)

मृदुल राजपूत

  • नई दिल्ली,
  • 02 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 3:03 PM IST

मिठाइयों का जिक्र छिड़ते ही लोगों के मन में अलग-अलग मिठाइयों का नाम आता है. लेकिन सबसे पहले जो नाम मन में आता है, वो है 'गुलाब जामुन'. चाशनी में डूबी हुई यह नरम और गोल-गोल गुलाब जामुन भारतीय त्योहारों और शादियों की जान है. अक्सर लोग दुकान पर जाकर गुलाब जामुन खरीदते हैं या फिर घर में बनाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि सबकी पसंदीदा गुलाब जामुन कोई सोच समझकर बनाई हुई मिठाई नहीं ता बल्कि ये एक मजबूरी और जुगाड़ से बनाई गई थी. गुलाब जामुन के बारे में की कहानियां प्रचलित हैं जो अलग-अलग दावे करती हैं. तो आइए जानते हैं भारत में गुलाब जामुन का दिलचस्प इतिहास कैसा रहा और 

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शाहजहां के बावर्ची और मावे का प्रयोग

इतिहासकार बताते हैं कि मावा (खोया) को खराब होने से बचाने की जद्दोजहद में अनजाने में एक ऐसी डिश तैयार हो गई, जिसने सदियों तक दुनिया के स्वाद पर राज किया. गुलाब जामुन का इतिहास लगभग 400 साल पुराना माना जाता है, जो मुगल काल के शाहजहां (1628-1658) के समय से जुड़ा है. इसकी जड़ें 13वीं सदी (800 साल पहले) के ईरान के 'लुकमत-अल-कादी' से जाती हैं जो तुर्कों के जरिए भारत पहुंची.

एक कहानी बताती है कि गुलाब जामुन के वजूद में मुगल बादशाह शाहजहां का भी योगदान है. के मुताबिक, यह गुलाब जामुन असल में एक 'हैप्पी एक्सीडेंट' यानी सुखद इत्तेफाक थी. कहा जाता है कि शाही बावर्ची एक बार बड़ी दुविधा में थे क्योंकि बड़ी मात्रा में तैयार किया गया मावा गर्मी की वजह से खराब होने की कगार पर था. 

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उस दौर में फ्रिज जैसी सुविधाएं नहीं थीं इसलिए इसे फेंकने के बजाय बावर्ची ने एक प्रयोग किया. उन्होंने मावे के छोटे-छोटे गोले बनाए उन्हें घी में सुनहरा होने तक तला और फिर खुशबूदार चाशनी में डुबो दिया. यह प्रयोग इतना सफल रहा कि यह मुगलिया सल्तनत की सिग्नेचर डिश बन गई.

फारसी से भी जुड़ी हैं गुलाब जामुन की जड़ें

गुलाब जामुन का इतिहास केवल भारत तक सीमित नहीं है. के आर्टिकल के अनुसार, गुलाब जामुन का संबंध मध्य पूर्व की एक मिठाई 'लुकमत-अल-कादी' से भी मानी जाती है, जिसे फारसी में 'लुक्मा' कहा जाता था. जब यह रेसिपी भारत पहुंची तो लोकल रसोइयों ने इसे पूरी तरह बदल दिया. 

अरबी देशों में इसे आटे के घोल से बनाया जाता था लेकिन भारतीय रसोइयों ने इसमें मावा और खोया का इस्तेमाल किया जिससे यह और भी नरम और मखमली हो गया. 'गुलाब' शब्द फारसी के 'गुल' (फूल) और 'आब' (पानी) से बना है जो गुलाब जल वाली चाशनी की ओर इशारा करता है. वहीं 'जामुन' नाम इसके आकार और गहरे रंग की वजह से मिला.

स्वाद का सफर भी रहा अच्छा

दिलचस्प बात यह है कि गुलाब जामुन ने समय के साथ अपने कई क्षेत्रीय रूप भी लिए. स्क्रॉल की बताती है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय जरूरतों और स्वाद के हिसाब से इस मिठाई में बदलाव हुए. 

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बंगाल में इसे 'पंतुआ' या 'लेडी केनी' के नाम से जाना गया, जहां इसमें पनीर का मिश्रण भी किया जाता है. काला जामुन इसका एक और वर्जन है, जिसे ज्यादा देर तक तलकर बाहर से थोड़ा सख्त और अंदर से बेहद नरम रखा जाता है. आज यह सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में भी सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली मिठाई है.
 

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