CBI अफसरों पर झूठी गवाही और फर्जी सबूत गढ़ने का आरोप, दिल्ली HC ने केस दर्ज करने का दिया आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पेशल जज को निर्देश दिया है कि सीबीआई के छह अधिकारियों के खिलाफ झूठी गवाही और झूठे सबूत गढ़ने की शिकायत चार हफ्ते में मजिस्ट्रेट को भेजी जाए. मामला 2002 में शुरू हुई एक राजस्व सेवा अधिकारी की जांच से जुड़ा है. आरोप है कि सीबीआई ने 2 अगस्त 2016 के जवाब में डीओपीटी से चर्चा चलने की बात लिखी, जबकि मसौदे में डीओपीटी का फैसला माना गया था.

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सीबीआई के छह अधिकारियों पर झूठी गवाही का आरोप (File Photo: ITG) सीबीआई के छह अधिकारियों पर झूठी गवाही का आरोप (File Photo: ITG)

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 08 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:56 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआई के छह अधिकारियों के खिलाफ झूठी गवाही देने और झूठे सबूत गढ़ने के आरोप में शिकायत दर्ज कराने को कहा है. मामला एक राजस्व सेवा अधिकारी के खिलाफ 2002 में शुरू हुई जांच से जुड़ा है. आरोप है कि सीबीआई ने 2016 में अदालत में दाखिल जवाब में सरकारी मंजूरी को लेकर गलत जानकारी दी. यह निर्देश करीब एक दशक बाद आया है. स्पेशल जज को चार हफ्ते में मजिस्ट्रेट को शिकायत भेजनी होगी.

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सीबीआई ने ट्रायल के दौरान आरोपी को दस्तावेज देने पर आपत्ति जताते हुए 2 अगस्त 2016 को लिखित जवाब दाखिल किया. इसमें कहा गया कि आगे की कानूनी कार्रवाई पर डीओपीटी से चर्चा चल रही है.

हाईकोर्ट के मुताबिक यह बात झूठी थी. जवाब के पहले मसौदे में डीओपीटी का फैसला माना गया था, लेकिन बाद में उसे बदलकर लिखा गया कि मंत्रालय से पत्राचार चल रहा है. कोर्ट ने कहा कि इस बदलाव ने अदालत के सामने रखी जाने वाली असली स्थिति को ही बदल दिया.

स्पेशल जज ने 29 मई 2018 के आदेश में प्रथम दृष्टया माना था कि सीबीआई ने 2 अगस्त 2016 के जवाब में बेईमानी से झूठी बातें कही थीं. आदेश के मुताबिक अंतिम जवाब सुशील दीवान ने तैयार किया, स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर मो. आजाद ने जांचा, पुलिस अधीक्षक रमन त्यागी और ब्रांच हेड अमित कुमार के जरिए वह आगे बढ़ा और 1 अगस्त 2016 को जोन हेड विनीत विनायक ने उसे मंजूरी दी.

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हाईकोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त जवाब साफ जवाब के निर्देश पर दाखिल हुआ हो, तब भी मसौदा बदलने की वजह समझ नहीं आती.

मसौदों और फाइल नोटिंग को एक साथ देखने पर प्रथम दृष्टया हर अधिकारी ने अपनी भूमिका के हिसाब से जवाब तैयार करने, बदलने, जांचने, आगे बढ़ाने, मंजूर करने या दाखिल करने में हिस्सा लिया और उसे असली स्थिति पता थी. भूमिका कम या ज्यादा होने से किसी को शिकायत से बाहर नहीं किया जा सकता. किसकी कितनी जानकारी और दोष था, यह सक्षम अदालत तय करेगी.

शिकायत सुशील दीवान, विनीत विनायक, अमित कुमार, रमन त्यागी, प्रेम कुमार गौतम और मो. आजाद के खिलाफ होगी. मामला आईपीसी की धारा 191 के साथ 193 और 209 का है. धारा 191 सच बोलने को बाध्य व्यक्ति के जानबूझकर झूठा बयान देने पर लगती है. धारा 193 अदालती कार्यवाही में जानबूझकर झूठा सबूत देने की सजा तय करती है. धारा 209 अदालत में जानते हुए झूठा दावा करने का अपराध है.

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