बाकी सब ठीक है... नेल कटर में ये छोटा सा छेद किस काम का है?

क्या आपने कभी नेल कटर में बने एक छोटे से छेद पर ध्यान दिया है. यह आखिर किस वजह से बनाया गया होता है. क्या यह सिर्फ एक डिजाइन है या फिर इसका किसी खास काम के लिए इस्तेमाल होता है. चलिए जानते हैं, इन सवालों के जवाब?

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नेल कटर के पीछे बना छोटा सा छेद इस काम में इस्तेमाल होता है (Photo - Pixabay) नेल कटर के पीछे बना छोटा सा छेद इस काम में इस्तेमाल होता है (Photo - Pixabay)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 11 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 4:57 PM IST

नेल कटर आपने न जाने कितनी बार इस्तेमाल किया होगा. नाखून काटते समय आपने उसके लीवर को दबाया होगा, कटे हुए नाखून कूड़ेदान में फेंके होंगे और फिर नेल कटर को किसी दराज में रख दिया होगा. लेकिन क्या आपने कभी नेल कटर के नीचे बने उस छोटे से छेद पर ध्यान दिया है?

ज्यादातर लोग शायद इसे डिजाइन का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. कुछ को लगता है कि यह छेद सिर्फ खूबसूरती के लिए बनाया गया है. लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. इस छोटे से छेद का एक बेहद सीधा और काम का मकसद है.

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नेल कटर का ये छेद आखिर किस काम आता है?
EDJY नाम की कंपनी के फाउंडर और CEO जेक पीटर्स ने दुनियाभर में नेल कटर के अलग-अलग डिजाइन जुटाए और उनका अध्ययन किया है. उनके पास सैकड़ों तरह के नेल कटर हैं. उन्होंने नेल कटर की डिजाइन पर इतना काम किया है कि उन्हें इस छोटे से टूल का विशेषज्ञ कहा जा सकता है. पीटर्स के मुताबिक, नेल कटर में बना यह छोटा सा छेद या लूप असल में उसे कहीं बांधकर रखने के लिए है.

आप इसमें एक छोटी रिंग डाल सकते हैं और नेल कटर को चाबी के गुच्छे या किसी बैग से जोड़ सकते हैं. इससे हर कुछ हफ्ते में नेल कटर ढूंढने की परेशानी कम हो सकती है. यह छेद आपके नेल कटर को चाबी के गुच्छे, किसी रिंग, लैनयार्ड या टॉयलेटरी बैग से जोड़ने के लिए बनाया गया है. यानी ताकि नेल कटर बार-बार गायब न हो जाए.

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दिलचस्प बात ये है कि कुछ पुराने नेल कटर के साथ छोटी चेन भी लगी आती थी. इसका मकसद भी यही था कि नेल कटर कहीं खो न जाए.

ये कोई नया डिजाइन नहीं है, करीब 145 साल पुराना है
अब कहानी और दिलचस्प हो जाती है. नेल कटर में यह लूप या छेद कोई नया आइडिया नहीं है. इसका इतिहास 1881 के एक पेटेंट तक जाता है. जेक पीटर्स के मुताबिक, उस समय के पेटेंट में आज के नेल कटर जैसा ही एक उपकरण दिखाई देता है. फर्क सिर्फ इतना है कि उसमें नीचे छेद की जगह एक लूप बना हुआ था.

यानी आज आप किसी बड़े स्टोर से जो सामान्य नेल कटर खरीदते हैं, उसकी मूल डिजाइन करीब 145 साल पहले के उस पेटेंट से काफी हद तक मिलती-जुलती है.

पहले लोग चाकू से काटते थे नाखून
अब सवाल है कि आखिर नेल कटर की जरूरत क्यों पड़ी? आज से करीब डेढ़-दो सौ साल पहले नाखून काटने के लिए लोगों के पास आज जैसा नेल कटर नहीं था. आमतौर पर छोटे पॉकेट नाइफ यानी चाकू का इस्तेमाल किया जाता था.

नाखून काटने का तरीका भी सुनकर डर लग सकता है. चाकू को उंगली के सिरे पर सीधा रखकर नाखून को ऐसे काटा या छीला जाता था, जैसे कोई सेब छील रहा हो. जाहिर है, इसमें उंगली कटने और खून निकलने का खतरा काफी रहता था.
इसी समस्या को दूर करने के लिए 19वीं सदी के आखिर में एक बेहतर उपकरण बनाने की कोशिश हुई.

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1881 में आया आधुनिक नेल कटर का पेटेंट
1881 में अमेरिका के सिनसिनाटी के आविष्कारकों यूजीन हेम और सेलेस्टिन मैट्ज ने एक ऐसे ‘फिंगर-नेल ट्रिमर’ का पेटेंट कराया, जो लीवर के सिद्धांत पर काम करता था. इस उपकरण में लीवर के इस्तेमाल से कम ताकत लगाकर नाखून काटना संभव था. इसके डिजाइन में करीब 15:1 का मैकेनिकल लीवरेज मिलता था.

और सबसे खास बात—इसी पुराने पेटेंट में वह लूप भी मौजूद था, जिसे आज के नेल कटर में हम छोटे छेद के रूप में देखते हैं. यानी नेल कटर का यह छोटा सा हिस्सा भी उसकी शुरुआती डिजाइन का हिस्सा था.

इसे छेद कहें या लूप?
दिलचस्प बात यह है कि 1881 के पेटेंट में इसे आज की तरह 'छेद' नहीं कहा गया था. वहां लीवर के एक सिरे पर लूप जैसा हिस्सा दिखाया गया था. इसका मकसद नेल कटर को किसी चीज से जोड़कर रखना था.

यानी करीब 145 साल पहले भी आविष्कारकों ने यह सोचा था कि इतना छोटा उपकरण आसानी से कहीं खो सकता है. इसलिए उसे चेन या रिंग से जोड़ने का रास्ता डिजाइन में ही दे दिया गया. कितनी छोटी चीज, लेकिन कितनी व्यावहारिक सोच!

इस छेद के कुछ और काम भी हैं
समय के साथ इस छोटे से छेद के कुछ और इस्तेमाल भी सामने आए. आप नेल कटर को बाथरूम की कैबिनेट के अंदर लगे हुक से टांग सकते हैं. इससे वह दराज में रखी तमाम चीजों के नीचे दबकर गायब नहीं होगा.

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अगर आपके पास हाथ और पैर के नाखूनों के लिए अलग-अलग नेल कटर हैं, तो दोनों में एक रिंग डालकर उन्हें एक साथ भी रखा जा सकता है. यानी यह छोटा सा छेद सिर्फ देखने के लिए नहीं है. यह नेल कटर को व्यवस्थित रखने में भी काम आता है.

कई नेल कटर में यही हिस्सा उसके निर्माण के दौरान भी काम आता है. इसमें पिवट पिन लगाया जाता है, जो नेल कटर के लीवर और बेस को आपस में जोड़कर रखता है. यानी नेल कटर इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के लिए यह हिस्सा जहां उसे टांगने या जोड़ने के काम आता है, वहीं नेल कटर बनाने के दौरान भी इसकी अपनी भूमिका होती है. कह सकते हैं कि यह नेल कटर का ऐसा हिस्सा है, जो बनाने और इस्तेमाल करने—दोनों वक्त काम आता है.

क्या नेल कटर सच में नाखून को काटता है?
यह बात भी थोड़ी हैरान करने वाली है. 1881 के पेटेंट में नेल कटर के काटने वाले हिस्से को 'ब्लेड' नहीं, बल्कि 'जॉज' यानी जबड़ा कहा गया था. इसकी वजह यह है कि पारंपरिक नेल कटर नाखून को किसी तेज चाकू की तरह काटने के बजाय दबाकर तोड़ता है.

इसी कारण कई बार नाखून के छोटे-छोटे टुकड़े इधर-उधर उड़ जाते हैं और नाखून का किनारा भी बिल्कुल चिकना नहीं रहता. यही वजह है कि नेल केयर से जुड़े लोगों के मुताबिक, नाखून काटने के बाद किनारों को फाइल करना भी जरूरी हो सकता है.

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अगली बार जब आप नाखून काटने के लिए नेल कटर उठाएं, तो उसके नीचे बने उस छोटे से छेद को जरूर देखिएगा. यह कोई बेकार छेद नहीं है. यह करीब 145 साल पुराने डिजाइन की याद दिलाता है और इसका सबसे सीधा काम है—नेल कटर को रिंग, चेन या बैग से जोड़कर रखना. और हां, अगर आपका नेल कटर हर कुछ हफ्तों में गायब हो जाता है, तो अब आप समझ गए होंगे कि उस छोटे से छेद का असली मतलब क्या है. इतने छोटे टूल में भी इंजीनियरिंग की एक पूरी कहानी छिपी हुई है—और यह कहानी 1881 से चली आ रही है.

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