ताजमहल के गुंबद के ऊपर लगी नुकीली आकृति को कई लोग 'त्रिशूल' बताकर इसे मंदिर होने का सबूत करार देते हैं. ज़ूम करके देखने पर यह आकृति वाकई कलश जैसी दिखाई देती है. लेकिन आखिर इसका सच क्या है?
मध्यकालीन इतिहास के विशेषज्ञ प्रोफेसर सैयद अली नदीम रिज़वी इस सवाल का सीधा जवाब देते हैं.आजतक रेडियो के शो 'पढ़ाकू नितिन' में आए सैयद अली नदीम रिजवी ताजमहल से जुड़े कई सवालों के जवाब देते हैं और इससे जुड़े कई मिथकों की सच्चाई भी बताते हैं. इन्हीं में से एक सवाल ताजमहल के गुंबद के ऊपर लगी आकृति को लेकर भी है. उनके मुताबिक, कलश, मंदिर और मस्जिद, तीनों का आपस में रिश्ता है. जब हिंदुस्तान में गुंबद बनने शुरू हुए, तो उन पर एक नया एलिमेंट जोड़ा गया, जो मंदिर की परंपरा से आया था- कलश.
इसकी वजह यह थी कि गुंबद बनाने वाले कारीगर स्थानीय हिंदू शिल्पकार थे. उन्हें मंदिरों पर कलश बनाने की परंपरा पहले से मालूम थी. इसलिए मंदिर के शिखर पर लगाए जाने वाले कलश की तरह गुंबद के ऊपर भी एक नुकीली चोटी यानी पिनेकल बनाई जाने लगी.
इसकी तुलना में जब बाबर ने अपनी पहली मस्जिद- पानीपत की काबुली बाग मस्जिद- बनवाई, तो उनके साथ आए आर्किटेक्ट मीरक गयास सेंट्रल एशिया से थे. उन्हें भारतीय वास्तु परंपरा की जानकारी नहीं थी. इसलिए उन्होंने गुंबद पर जो पिनेकल लगवाया, वह कलश की बजाय 'रोशनदान' जैसा था, जो सेंट्रल एशियाई इमारतों में आम था.
तो क्या वाकई त्रिशूल है?
प्रोफेसर रिज़वी के मुताबिक, ताजमहल और हुमायूं के मकबरे पर बना डिजाइन असल में उस दौर के 'स्पीयर' यानी भाला या नेजा का एक रूप है. इसके चारों तरफ अर्धचंद्र यानी क्रिसेंट मून बना हुआ है.
उनके मुताबिक, उस दौर में नेजा सत्ता और अथॉरिटी का प्रतीक माना जाता था. यहां तक कि जुमे के खुतबे में भी मौलाना असा यानी डंडा लेकर आते थे, क्योंकि हथियार ले जाने की इजाजत नहीं होती थी.बीच में बना क्रिसेंट मून इस्लामिक प्रतीक है. लेकिन इस डिजाइन में तीन नुकीली आकृतियां दिखाई देती हैं, जिसकी वजह से दूर से देखने पर यह त्रिशूल जैसी लग सकती है.
प्रोफेसर रिज़वी का तर्क है कि अगर किसी हिंदू प्रतीक को मिटाने की मंशा होती, तो ऐसा निशान वहां क्यों छोड़ा जाता, जो साफ दिखाई देता हो और बाद में विवाद का कारण बने? उनके मुताबिक, वास्तुकला के कई एलिमेंट्स धर्म से ज्यादा संस्कृति और कारीगरी की परंपराओं से जुड़े होते हैं.
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सिर्फ कलश नहीं, कई और उदाहरण
यह पैटर्न सिर्फ ताजमहल तक सीमित नहीं है. प्रोफेसर रिजवी बताते हैं कि सरहिंद, पंजाब में एक सूफी संत के मकबरे पर 'इनवर्टेड लोटस' यानी उल्टे कमल का मोटिफ मिलता है. आज भी दिल्ली की कई मस्जिदों के गुंबदों पर कमल के फूल का मोटिफ दिखाई देता है.इसका मतलब यह नहीं कि वे सभी इमारतें मंदिर थीं. इस्लाम में इंसान या मूर्ति यानी बुत को दर्शाना मना है, लेकिन फूल-पत्ती और ज्यामितीय डिजाइन यानी एरेबेस्क का इस्तेमाल किया जा सकता है.
इसी तरह, जैसे स्वास्तिक को कभी हिटलर से जोड़ दिया गया था, वैसे ही किसी डिजाइन एलिमेंट को किसी खास पहचान से जोड़ देने से उसकी असली उत्पत्ति नहीं बदल जाती.प्रोफेसर रिजवी आगे उदाहरण देते हैं कि फतेहपुर सीकरी के पैलेस में राम और हनुमान की मूर्ति वाला स्कल्पचर मिलता है. लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता कि अकबर हिंदू थे.
इसी तरह शाहजहां के दौर के 'क्रॉस आर्चेस' बौद्ध वास्तुकला से लिए गए बताए जाते हैं. ताजमहल और आगरा-दिल्ली के किलों में मिलने वाले 'बैलेस्टर कॉलम्स' भी बौद्ध आर्किटेक्चर से जुड़े बताए जाते हैं. उस समय भारत में बौद्ध धर्म का लगभग नामोनिशान नहीं बचा था.
डोम बनाम शिखर की पूरी बहस
प्रोफेसर रिज़वी इस पूरे मसले को एक लाइन में समझाते हैं- डोम है तो मुस्लिम, शिखर है तो हिंदू' जैसी सोच से बचना चाहिए.उनका तर्क है कि सरयू किनारे अयोध्या में मौजूद कई मंदिरों में भी डोम जैसी संरचनाएं मिलती हैं. ऐसे में क्या उन्हें भी मस्जिद मान लिया जाएगा?
उनके मुताबिक, वास्तुकला के एलिमेंट्स सदियों के सांस्कृतिक आदान-प्रदान से विकसित होते हैं. इसलिए किसी एक डिजाइन या आकृति को देखकर किसी इमारत की धार्मिक पहचान तय करना इतिहास की सही व्याख्या नहीं है.
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