31 अक्टूबर 1961 को सोवियत संघ के पूर्व नेता जोसेफ स्टालिन के शव को मॉस्को के रेड स्क्वायर में स्थित लेनिन के मकबरे से बाहर निकाल दिया गया था. कभी इसी मकबरे में लेनिन के साथ स्टालिन के शव को भी रखा गया था. लेकिन सत्ता में रहते हुए लाखों लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले स्टालिन की विरासत पर सवाल उठने लगे थे.
31 अक्टूबर 1961 का दिन सोवियत संघ के इतिहास में एक बड़े बदलाव के तौर पर दर्ज है. इसी दिन सोवियत अधिकारियों ने पूर्व नेता जोसेफ स्टालिन के शव को लेनिन के मकबरे से हटाने का फैसला किया.
कभी जिस नेता को देश का सबसे ताकतवर व्यक्ति माना जाता था, उसकी मौत के कुछ साल बाद ही उसका शव उस जगह से हटा दिया गया, जहां उसे सम्मान के साथ रखा गया था.
इस फैसले के पीछे स्टालिन की नीतियों और उनके शासनकाल में हुए अत्याचारों को लेकर बदलता नजरिया था. आइए जानते हैं कि आखिर स्टालिन का शव लेनिन के मकबरे में कैसे पहुंचा और फिर उसे वहां से क्यों हटाया गया.
रूस की बोल्शेविक क्रांति के प्रमुख नेता व्लादिमीर लेनिन का निधन 1924 में हुआ था. उनकी मौत के बाद उनके शव को विशेष प्रक्रिया के जरिए सुरक्षित रखा गया और मॉस्को के रेड स्क्वायर में क्रेमलिन की दीवार के पास बने एक मकबरे में रखा गया.
इस मकबरे में कांच के एक खास आवरण के भीतर लेनिन का शव रखा गया, ताकि लोग उन्हें देख सकें. धीरे-धीरे यह जगह सोवियत संघ की राजनीति और इतिहास का एक अहम प्रतीक बन गई.
लेनिन के बाद जोसेफ स्टालिन सोवियत संघ के सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल हुए. उन्होंने करीब तीन दशक तक देश पर शासन किया. उनके दौर में सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों पर सख्ती की गई. राजनीतिक दमन, फांसी और जबरन श्रम शिविरों के चलते बड़ी संख्या में लोगों की जान गई.
हालांकि, स्टालिन के शासनकाल में सोवियत संघ ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी के खिलाफ लड़ाई लड़ी और भारी नुकसान उठाने के बावजूद जीत हासिल की. इस जीत ने स्टालिन की छवि को देश के एक ताकतवर युद्धकालीन नेता के रूप में भी स्थापित किया.
5 मार्च 1953 को स्टालिन की मौत हो गई. इसके बाद उनके शव को भी सुरक्षित रखने की प्रक्रिया अपनाई गई और लेनिन के मकबरे में उनके साथ रखा गया. कुछ समय तक मकबरे पर लेनिन और स्टालिन, दोनों के नाम जुड़े रहे.
लेकिन स्टालिन की मौत के बाद सोवियत संघ की राजनीति में बदलाव आने लगा. उनके शासनकाल में हुए अत्याचारों और व्यक्तिपूजा यानी किसी नेता को असाधारण दर्जा देकर उसकी आलोचना से बचाने की प्रवृत्ति पर सवाल उठने लगे.
स्टालिन के बाद सोवियत संघ की सत्ता में आए निकिता ख्रुश्चेव ने उनकी नीतियों से दूरी बनानी शुरू की. फरवरी 1956 में कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस के दौरान ख्रुश्चेव ने स्टालिन की आलोचना की. उन्होंने स्टालिन के व्यक्तित्व की पूजा और उनके शासन में हुए दमनकारी कामों पर सवाल उठाए.
इस प्रक्रिया को स्टालिन के दौर से दूरी बनाने की कोशिश के तौर पर देखा गया. सोवियत नेतृत्व अब स्टालिन को पहले की तरह सार्वजनिक सम्मान देने के पक्ष में नहीं था.
आखिरकार, अक्टूबर 1961 में कम्युनिस्ट पार्टी की 22वीं कांग्रेस के दौरान स्टालिन के शव को लेनिन के मकबरे से हटाने का फैसला किया गया. 31 अक्टूबर को उनके शव को वहां से निकालकर पास ही एक अलग कब्र में दफना दिया गया.
कभी लेनिन के साथ रखे गए स्टालिन के शव को सार्वजनिक डिस्प्ले से आज के दिन ही हटा दिया गया. यह कदम सिर्फ एक शव को मकबरे से निकालने तक सीमित नहीं था, बल्कि सोवियत संघ में स्टालिन की छवि और उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर आए बदलाव का भी संकेत था.
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