कहीं दूसरों के उतारे कपड़े तो नहीं खरीद रहे? पता भी नहीं चलता और ऐसे खेल हो जाता है!

क्या आप जानते हैं बाजार में जो कम रेट में कपड़े मिल रहे हैं, वो सेकेंड हैंड भी हो सकते हैं. दरअसल, बाजार में पहने हुए कपड़े भी बेचे जा रहे हैं.

Advertisement
 सेकेंड हैंड कपड़े विदेश से बड़ी मात्रा में आयात किए जाते हैं. (Photo: AI Generated) सेकेंड हैंड कपड़े विदेश से बड़ी मात्रा में आयात किए जाते हैं. (Photo: AI Generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 02 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 5:25 PM IST

सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर हो रहा है, जिसमें एक टीशर्ट को दिखाते हुए दावा किया जा रहा है कि वो दिल्ली के सरोजनी नगर मार्केट में बिक रही थी. इस टीशर्ट पर किसी कपल की तस्वीरें छपी थीं और दिखने में लग रहा है कि वो किसी ने अपनी फोटो देकर बनवाई थी. लेकिन, अब वो बाजार में बिक रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि पटरी या लोकल मार्केट में बिकने वाले कपड़े सेकेंड हैंड भी हो सकते हैं. तो आज जानने की कोशिश करते हैं कि क्या सही में इन बाजारों में पहने हुए कपड़े बिकते हैं...

Advertisement

क्या सही में भारत में पहने हुए कपड़ों का कारोबार होता है? तो इस सवाल का जवाब है- हां. भारत में लीगल तौर पर यूज किए हुए कपड़ों का व्यापार होता है और भारत में हर साल विदेश से करोड़ों को माल भारत आता है. भारत आने वाले इस्तेमाल किए गए कपड़े आयात-निर्यात की भाषा में HS Code 63090000 के तहत आते हैं. डीजीएफटी की ओर से निर्धारित आयात नीति के अनुसार, भारत में इस्तेमाल किए गए कपड़े मंगवाए जा सकते हैं. एचएस कोड 63090000 के तहत पहने हुए कपड़े और अन्य आइटम भारत आते हैं. 

इन कपड़ों में इस्तेमाल किए हुए कपड़े, इस्तेमाल किए हुए कपड़ों के एक्सेसरीज, कंबल, बेड लिनन, तौलिए, घरेलू टेक्सटाइल आदि होते हैं.

बाहर से कितना सामान आता है?

भारत में हर साल कई करोड़ किलो यूज किए कपड़े आते हैं. WITS की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार, साल 2024 में करीब 160.25 मिलियन किलोग्राम कपड़े विदेश से भारत आए थे, जिसकी वैल्यू करीब 68.2 मिलियन डॉलर थी. इसके अलावा साल 2023 में करीब 188.47 मिलियन किलो सामान मंगाया गया था, जिसकी वैल्यू 94.3 मिलियन डॉलर थी. बता दें कि भारत में सबसे ज्यादा पहने हुए कपड़े अमेरिका से आते हैं,  उसके बाद कनाडा,चीन, ऑस्ट्रेलिया, यूएई, इटली, कोरिया, फ्रांस, जर्मनी आदि देश शामिल हैं. 

Advertisement

साइंस डायरेक्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप और अमेरिका में दान किए गए 60% से अधिक इस्तेमाल किए हुए कपड़े विकासशील देशों में निर्यात किए जाते हैं. 

इन कपड़ों का क्या होता है?

ये सामान भारत में आते हैं और अलग-अलग तरीकों से इनका इस्तेमाल किया जाता है. इनका इस्तेमाल दोबारा बिक्री के रुप में किया जाता है. इसके अलावा रीसाइक्लिंग, इंडस्ट्री यूज, छंटाई में इसका इस्तेमाल होता है. 

- एक तो रीसाइक्लिंग मिलें इन कपड़ों को छोटे-छोटे रेशों में बदलकर री जनरेट किया जाता है और उससे एक धागा बनता है.इस धागे को या तो पूर्वी अफ्रीका जैसे देशों में निर्यात किया जाता है, जहां इससे कंबल बनाए जाते हैं, या फिर भारत में ही कम गुणवत्ता वाले कंबल, शॉल और कपड़े तैयार किए जाते हैं.

- वैसे भारत में इस्तेमाल किए गए कपड़ों (जो कटे-फटे ना हो) को आयात करने को लेकर कड़े नियम हैं, लेकिन ऐसे पहनने योग्य सेकेंड-हैंड कपड़ों को स्पेशल इकोनॉमिक जोन में वो व्यापारी ला सकते हैं, जिनके पास उन्हें छांटने और दूसरे देशों (जैसे पूर्वी अफ्रीका) को दोबारा निर्यात करने का लाइसेंस होता है. 

ऐसे लाइसेंसधारकों को उनके कुल आयातित सेकेंड-हैंड कपड़ों के वैल्यू का 15% तक भारत के घरेलू बाजार में दोबारा बिक्री के लिए लाने की अनुमति भी होती है. ऐसे में इन कपड़ों को भारत में बेचा जा सकता है. यानी ये कपड़े बाजार में वापस बेचे जाते हैं. 

Advertisement

पानीपत है इनका गढ़

रिपोर्ट के अनुसार, पानीपत में 300 से अधिक मिलें विदेशों से आयात किए गए कटे-फटे ऊनी और एक्रेलिक बुने हुए कपड़ों को रीसायकल कर उनसे पुनर्नवीनीकृत धागा तैयार करती हैं, जिससे बाद में कंबल बनाए जाते हैं. फिर इन कंबलों को भारत, दक्षिण एशिया और पूर्वी अफ्रीका में बेचे जाते हैं. 

कैसे बाजार तक आते हैं कपड़े?

बड़े-बड़े गांठों में आए कपड़ों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है, जैसे महिलाओं के सूती टॉप, शर्ट, पैंट आदि. विशेष प्रकार के कपड़ों, जैसे कार्गो शॉर्ट्स या लंबी स्कर्ट, के लिए अलग ऑर्डर तैयार किए जाते हैं और उनकी कीमत अधिक होती है. वहीं जिन कपड़ों की अंतिम बाजारों में मांग नहीं होती या जो वहां की सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं माने जाते, उन्हें साफ-सफाई और पॉलिश करने वाले कपड़ों में बदल दिया जाता है.

इसके बाद इन्हें अलग-अलग श्रेणियों, जैसे पुरुषों की शर्ट, पैंट, महिलाओं के टॉप, जैकेट और अन्य कपड़ों के आधार पर बांटा जाता है. फिर ये गांठें दिल्ली के आज़ाद मार्केट जैसे थोक बाजारों में भेजी जाती हैं, जहां थोक व्यापारी इन्हें छोटे कारोबारियों को बेचते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, यहीं से ये कपड़े महानगरों के बड़े रविवार बाजारों से लेकर कश्मीर, कच्छ, तमिलनाडु और असम जैसे राज्यों के छोटे कस्बों के साप्ताहिक बाजारों तक पहुंचते हैं.

Advertisement

छोटे व्यापारी अपनी जरूरत और पूंजी के हिसाब से कपड़े खरीदते हैं. कुछ दुकानदार पूरी गांठ खरीद लेते हैं, जबकि कई छोटे सड़क विक्रेता मिलकर एक ही गांठ खरीदते हैं. कुछ दुकानों पर गांठ खोलकर कपड़े वजन के हिसाब से भी बेचे जाते हैं, ताकि कम पूंजी वाले व्यापारी भी उन्हें खरीद सकें. इसके बाद यही व्यापारी अपने-अपने स्थानीय बाजारों और फुटपाथ बाजारों में इन्हें बेचते हैं.

कुछ ठीक करके भी बेचे जाते हैं

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई कपड़ों को बेचने से पहले उनकी मरम्मत या बदलाव किया जाता है. उदाहरण के तौर पर, बड़े आकार की नायलॉन पैंट को छोटा किया जाता है, उनकी कमर में इलास्टिक लगाया जाता है और कुछ पर धारियां सिलकर उन्हें स्पोर्ट्स ट्राउजर जैसा रूप दिया जाता है. बचे हुए कपड़े से बच्चों के कपड़े बनाए जाते हैं, जबकि कुछ पुराने कोटों को बदलकर नेहरू जैकेट का रूप दिया जाता है. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »