6 नवंबर 1917 को रूस में एक ऐसी क्रांति की शुरुआत हुई, जिसने न सिर्फ वहां की सत्ता बदल दी, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति पर गहरा असर डाला. इसी दिन व्लादिमीर लेनिन की अगुआई में बोल्शेविकों ने रूस की कमजोर अंतरिम सरकार के खिलाफ विद्रोह किया था. क्रांतिकारियों ने राजधानी पेट्रोग्राद, अब सेंट पीटर्सबर्ग की सरकारी इमारतों और अहम ठिकानों पर कब्जा करना शुरू कर दिया. यह तख्तापलट इतना तेजी से हुआ कि सरकार को संभलने का मौका तक नहीं मिला. महज दो दिनों के भीतर बोल्शेविकों ने नई सरकार बना ली.
नई सरकार की कमान लेनिन के हाथों में आ गई. आगे चलकर इसी सत्ता ने सोवियत संघ (USSR) की नींव रखी. यह दुनिया का पहला ऐसा देश बना, जहां मार्क्सवादी विचारधारा पर आधारित सरकार कायम हुई. लेकिन सवाल है कि रूस में आखिर ऐसी नौबत क्यों आई और लेनिन ने किस तरह सत्ता पर कब्जा किया?
लेनिन का जन्म 1870 में रूस में हुआ था. उनका पूरा नाम व्लादिमीर इलिच उल्यानोव था. क्रांतिकारी विचारों की ओर उनका झुकाव तब बढ़ा, जब 1887 में उनके भाई को रूसी सम्राट अलेक्जेंडर तृतीय की हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोप में फांसी दे दी गई.
लेनिन ने कानून की पढ़ाई की और वकालत करने लगे. इसी दौरान उनका संपर्क मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े लोगों से हुआ. साल 1895 में उन्होंने राजधानी में कई मार्क्सवादी समूहों को एकजुट कर वर्किंग क्लास की मुक्ति के लिए संघर्ष संघ बनाया. इसका मकसद मजदूरों को अपने आंदोलन से जोड़ना था.
हालांकि, उनकी यह गतिविधियां ज्यादा समय तक छिपी नहीं रह सकीं. दिसंबर 1895 में लेनिन और उनके कई साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें करीब एक साल जेल में रहना पड़ा. इसके बाद तीन साल के लिए साइबेरिया भेज दिया गया.
यूरोप में बैठकर तैयार की क्रांति की रणनीति
साइबेरिया से रिहा होने के बाद 1900 में लेनिन पश्चिमी यूरोप चले गए. वहां रहकर उन्होंने रूस में क्रांति लाने की अपनी कोशिशें जारी रखीं. इसी दौरान उन्होंने 'लेनिन' नाम अपनाया.
1902 में उन्होंने 'व्हाट इज टू बी डन?' नाम की एक किताब लिखी. इसमें उन्होंने तर्क दिया कि रूस में समाजवाद लाने के लिए अनुशासित और समर्पित क्रांतिकारियों की एक मजबूत पार्टी जरूरी है.
1903 में लंदन में उनकी मुलाकात रूस के दूसरे मार्क्सवादी नेताओं से हुई. यहां रूसी सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी (RSDWP) का गठन हुआ. लेकिन पार्टी के भीतर ही विचारों को लेकर मतभेद पैदा हो गए.
लेनिन के समर्थक बोल्शेविक कहलाए, जबकि उनके विरोधी मेंशेविक नाम से पहचाने जाने लगे. दोनों गुट समाजवाद चाहते थे, लेकिन उसे हासिल करने के तरीकों पर उनकी राय अलग थी. बोल्शेविक एक अनुशासित और मजबूत क्रांतिकारी पार्टी के जरिए सत्ता बदलने के पक्ष में थे, जबकि मेंशेविक लोकतांत्रिक तरीके से धीरे-धीरे समाजवाद लाना चाहते थे.
समय के साथ दोनों गुटों के बीच टकराव बढ़ता गया. 1912 में लेनिन ने बोल्शेविकों को अलग पार्टी के रूप में संगठित कर लिया. रूस में 1905 में एक और बड़ा क्रांतिकारी आंदोलन शुरू हुआ. यह आंदोलन मुख्य रूप से मजदूरों की हड़तालों और जनता के विरोध प्रदर्शनों के रूप में सामने आया. दबाव बढ़ने पर तत्कालीन सम्राट निकोलस द्वितीय ने संविधान लागू करने और चुनी हुई संसद बनाने जैसे सुधारों का वादा किया.
लेकिन हालात सामान्य होते ही जार ने इनमें से ज्यादातर सुधारों को वापस ले लिया. इसके बाद 1907 में लेनिन को एक बार फिर रूस छोड़कर निर्वासन में जाना पड़ा. 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो लेनिन ने इसका विरोध किया. उनका मानना था कि यह आम लोगों की लड़ाई नहीं, बल्कि पूंजीवादी ताकतों के हितों के लिए लड़ा जा रहा युद्ध है.
उन्होंने मजदूरों और सैनिकों से उन शासकों के खिलाफ खड़े होने की अपील की, जो उन्हें युद्ध में झोंक रहे थे. उधर, युद्ध ने रूस की कमर तोड़ दी थी. देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई. सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा और आम लोगों के सामने खाने-पीने की चीजों का संकट खड़ा हो गया.
मार्च 1917 में पेट्रोग्राद में खाने की कमी को लेकर दंगे और हड़तालें शुरू हो गईं. सेना के जवान भी प्रदर्शनकारियों के साथ आ गए. हालात इतने बिगड़ गए कि 15 मार्च 1917 को जार निकोलस द्वितीय को गद्दी छोड़नी पड़ी. इसके साथ ही रूस में सदियों पुराना जारशाही शासन खत्म हो गया.
इस घटना को फरवरी क्रांति कहा जाता है. दरअसल, उस समय रूस में जूलियन कैलेंडर चलता था, जिसके हिसाब से यह घटना फरवरी में हुई थी. जारशाही खत्म होने के बाद रूस में अंतरिम सरकार बनी. लेकिन सत्ता पूरी तरह उसके हाथ में नहीं थी. मजदूरों और सैनिकों की परिषदें, जिन्हें सोवियत कहा जाता था, भी काफी प्रभावशाली थीं. ऐसे में देश में दोहरी सत्ता जैसी स्थिति बन गई.
रूस में क्रांति के बाद जर्मनी ने लेनिन और उनके साथियों को स्विट्जरलैंड से स्वीडन जाने के लिए अपने इलाके से गुजरने की अनुमति दी. उन्हें एक सीलबंद रेल डिब्बे में रूस भेजा गया. जर्मनी को उम्मीद थी कि लेनिन की वापसी से रूस में युद्ध विरोधी आंदोलन मजबूत होगा और अंतरिम सरकार की मुश्किलें बढ़ेंगी.
रूस पहुंचने के बाद लेनिन ने अंतरिम सरकार को हटाने और सोवियतों के हाथ में सत्ता देने की मांग की. सरकार के नेताओं ने उन पर जर्मनी का एजेंट होने का आरोप लगाया. जुलाई 1917 में हालात बिगड़ने पर लेनिन को फिनलैंड भागना पड़ा.
लेकिन इस बीच उनका 'शांति, जमीन और रोटी' का नारा आम लोगों के बीच लोकप्रिय होता जा रहा था. युद्ध से परेशान सैनिक शांति चाहते थे, किसान जमीन और गरीब जनता खाने की व्यवस्था. बोल्शेविकों ने इन मांगों को अपना मुख्य मुद्दा बना लिया. धीरे-धीरे उन्हें मजदूरों और सैनिकों का समर्थन मिलने लगा. यहां तक कि पेट्रोग्राद की सोवियत में भी बोल्शेविक बहुमत में आ गए.
6 नवंबर 1917 को हुआ तख्तापलट
अक्टूबर 1917 में लेनिन गुपचुप तरीके से पेट्रोग्राद लौट आए. उन्होंने बोल्शेविक नेताओं को अंतरिम सरकार के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने के लिए तैयार किया. 6 नवंबर 1917 को बोल्शेविकों के नेतृत्व में रेड गार्ड्स यानी क्रांतिकारी लड़ाकों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने राजधानी के रेलवे स्टेशनों, पुलों, सरकारी इमारतों और दूसरे महत्वपूर्ण ठिकानों पर कब्जा करना शुरू कर दिया. इसके बाद अंतरिम सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया गया.
यह तख्तापलट बड़े पैमाने पर खूनखराबे के बिना ही पूरा हो गया. 8 नवंबर तक बोल्शेविकों ने नई सरकार बना ली और लेनिन उसके प्रमुख बन गए. इस तरह रूस में बोल्शेविक शासन की शुरुआत हुई.
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