घर या दुकान किराए पर देना आज के समय में बहुत आम बात है. लेकिन परेशानी तब शुरू होती है, जब किराए की अवधि खत्म होने के बाद भी किराएदार प्रॉपर्टी खाली नहीं करता. ऐसी स्थिति में मकान मालिक के लिए यह समझना जरूरी है कि आगे क्या करना चाहिए और किराएदार के लिए यह जानना जरूरी है कि सिर्फ किराया देते रहने से उसे हमेशा प्रॉपर्टी में रहने का अधिकार नहीं मिल जाता. हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट के एक मामले में किराएदार को करीब 3.27 करोड़ रुपये और उस पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का आदेश दिया गया. यह रकम उस अवधि के लिए थी, जब किराएदार की प्रॉपर्टी में मौजूदगी बाद में अदालत के हिसाब से अनधिकृत मानी गई.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी मार्केट की एक कमर्शियल प्रॉपर्टी से जुड़ा है. साल 2002 में एक महिला ने अपनी प्रॉपर्टी के पहली और दूसरी मंजिल को किराए पर दिया था. उस समय किराया 62 हजार रुपये महीना तय हुआ था. दोनों पक्षों के बीच रजिस्टर्ड रेंट एग्रीमेंट हुआ था. इसकी अवधि 1 जनवरी 2002 से 31 दिसंबर 2004 तक थी. यानी एग्रीमेंट तीन साल के लिए था. एग्रीमेंट में यह भी लिखा था कि आगे किराया बढ़ाया जा सकता है. लेकिन 31 दिसंबर 2004 के बाद नया एग्रीमेंट औपचारिक तौर पर नहीं हुआ और किराएदार ने प्रॉपर्टी खाली भी नहीं की.
इसके बाद किराएदार बढ़ा हुआ किराया देता रहा. अदालत के सामने रखे गए तथ्यों के मुताबिक, इस व्यवहार को एक समय तक महीने-दर-महीने चल रही किराएदारी के तौर पर देखा गया. यानी सिर्फ पुराना एग्रीमेंट खत्म होने से उसी दिन किराएदार को जबरन कब्जाधारी नहीं माना गया.
फिर विवाद कैसे बढ़ा?
साल 2007 में इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई. मकान मालकिन ने किराएदार से 25 लाख रुपये का लोन लिया. इसके बदले एक नोटराइज्ड अंडरटेकिंग में यह व्यवस्था की गई कि लोन चुकाए जाने तक किराएदार को प्रॉपर्टी में रहने दिया जाएगा और लोन की किस्तें किराए के साथ एडजस्ट होंगी. मकान मालकिन ने मई 2008 में किराएदार को प्रॉपर्टी खाली करने का कानूनी नोटिस भेजा. लेकिन अदालत ने माना कि उस समय तक 25 लाख रुपये वाले लोन की शर्त पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी. लोन मई 2012 में चुकाया गया. यही वजह रही कि 2008 से 2012 के बीच की अवधि को उसी तरह अनधिकृत कब्जा नहीं माना गया और उस अवधि के लिए वैसा मुआवजा नहीं लगाया गया.
फिर किराएदार पर करोड़ों रुपये क्यों लगे?
लोन चुकने के बाद भी किराएदार प्रॉपर्टी में बना रहा. आखिरकार उसने 31 दिसंबर 2017 को प्रॉपर्टी खाली की. अदालत ने मई 2012 के बाद की अवधि को महत्वपूर्ण माना. इसके बाद किराएदार के कब्जे को अनधिकृत माना गया और उसे सामान्य किराए के बजाय Mesne profit (मेस्ने प्रॉफिट) देने का आदेश दिया गया. आसान भाषा में समझें तो मेस्ने प्रॉफिट वह मुआवजा है, जो किसी व्यक्ति के प्रॉपर्टी पर अनधिकृत रूप से बने रहने से मालिक को होने वाले नुकसान या उस प्रॉपर्टी से मिलने वाले संभावित किराए के बदले दिया जा सकता है.
इस मामले में अदालत ने मई 2012 से दिसंबर 2015 तक 163 रुपये प्रति वर्ग फुट प्रति महीना की दर से रकम तय की. जनवरी 2016 से 31 दिसंबर 2017 तक इसमें 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी के आधार पर रकम तय की गई. इसके साथ 6 प्रतिशत सालाना ब्याज भी लगाया गया. रिपोर्ट के मुताबिक कुल रकम करीब 3.27 करोड़ रुपये बैठी.
रेंट एग्रीमेंट बनवाना इतना जरूरी क्यों है?
इस पूरे मामले से सबसे बड़ी सीख यही है कि मकान या दुकान किराए पर देते समय लिखित और स्पष्ट रेंट एग्रीमेंट जरूर होना चाहिए. एग्रीमेंट में सिर्फ किराया लिखना काफी नहीं है. उसमें साफ-साफ लिखा होना चाहिए कि-
1. किराए की अवधि कितनी है
किराएदारी कब शुरू होगी और कब खत्म होगी, यह साफ लिखा होना चाहिए.
2. हर महीने कितना किराया होगा
किराया कितना है और किस तारीख तक देना है, इसकी जानकारी होनी चाहिए.
3. किराया कब और कितना बढ़ेगा
अगर हर साल किराया बढ़ना है तो उसकी शर्त पहले से लिखी होनी चाहिए.
4. एग्रीमेंट खत्म होने के बाद क्या होगा
किराएदार को कब तक प्रॉपर्टी खाली करनी होगी, यह साफ होना चाहिए.
5. नोटिस पीरियड कितना होगा
मकान मालिक या किराएदार में से कोई एग्रीमेंट खत्म करना चाहता है तो कितने दिन पहले नोटिस देना होगा, यह लिखा होना चाहिए.
6. सेक्यूरिटी डिपॉजिट कितना है
कितनी सिक्योरिटी ली गई और मकान खाली करने के बाद वह कब लौटाई जाएगी, इसकी शर्त भी लिखें.
7. बिजली-पानी और दूसरे खर्च कौन देगा
बिजली, पानी, मेंटेनेंस और दूसरे चार्ज किसकी जिम्मेदारी हैं, यह भी स्पष्ट होना चाहिए.
सिर्फ एग्रीमेंट बनाना ही काफी नहीं
रेंट एग्रीमेंट की रजिस्ट्रेशन और स्टांप ड्यूटी से जुड़ी जरूरतें स्थानीय कानून और किराएदारी की अवधि पर निर्भर कर सकती हैं. इसलिए बड़ी रकम, कमर्शियल प्रॉपर्टी या लंबी अवधि की किराएदारी में स्थानीय वकील या संबंधित अथॉरिटी से नियम जरूर जांचने चाहिए. साथ ही, एग्रीमेंट खत्म होने के बाद किराएदार घर खाली नहीं करता तो मकान मालिक खुद से ताला बदलकर, सामान बाहर निकालकर या जबरन कब्जा लेकर समस्या हल करने की कोशिश न करे.
विवाद होने पर कानूनी प्रक्रिया अपनाना जरूरी हो सकता है. दिल्ली हाई कोर्ट के दूसरे हालिया मामले में भी अदालत ने कहा है कि मकान मालिक को किराएदार को खुद से हटाने के बजाय कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए. इसलिए रेंट एग्रीमेंट को सिर्फ एक कागज समझकर न छोड़ें. यह दोनों पक्षों के अधिकार, जिम्मेदारियां और किराएदारी की शर्तों का लिखित रिकॉर्ड होता है. विवाद होने पर यही दस्तावेज अदालत के सामने यह समझने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि दोनों पक्षों के बीच वास्तव में क्या तय हुआ था.
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