अगर आप गांव या डेयरी फार्म के आसपास गए हैं तो आपने काले रंग की ऐसी भैंस जरूर देखी होगी, जिसके छोटे और घुमावदार सींग होते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की एक खास नस्ल की भैंस को'ब्लैक गोल्ड' यानी काला सोना भी कहा जाता है?
यह कोई आम भैंस नहीं, बल्कि मुर्रा भैंस है. इसकी खासियत सिर्फ इसका काला रंग नहीं है. अच्छी नस्ल की मुर्रा भैंस ज्यादा दूध देने के साथ-साथ दूध में अच्छी मात्रा में फैट भी देती है. यही वजह है कि डेयरी कारोबार में इसे काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. ICAR के Central Institute for Research on Buffaloes (केन्द्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान) के मुताबिक मुर्रा को ‘ब्लैक गोल़्’ के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यह ग्रामीण परिवारों के लिए कमाई और आर्थिक सुरक्षा का जरिया बन सकती है.
कहां पाई जाती है मुर्रा भैंस?
मुर्रा भैंस का मूल क्षेत्र हरियाणा के रोहतक, हिसार और जींद के आसपास माना जाता है. इसके अलावा पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में भी यह नस्ल पाई जाती है. इसकी पहचान इसके चमकदार काले रंग और छोटे, कसकर मुड़े हुए सींगों से आसानी से की जा सकती है. मुर्रा का शरीर मजबूत और भारी होता है. इसका थन भी अच्छी तरह विकसित होता है, जो दूध उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है.
आखिर इतना खास क्या है?
मुर्रा भैंस की सबसे बड़ी खासियत इसका दूध उत्पादन और दूध में फैट की मात्रा है. आईसीएआर-सीआईआरबी के आंकड़ों के अनुसार, मुर्रा की 305 दिनों की दूध उत्पादन क्षमता सामान्य तौर पर करीब 1003 से 2057 किलो तक हो सकती है. अच्छी देखभाल और बेहतर प्रबंधन में कुछ पशु इससे काफी ज्यादा उत्पादन भी कर सकते हैं. दूध में फैट करीब 6.9 से 8.3 प्रतिशत तक बताया गया है.
नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट ( National Dairy Research Institute) के एक फार्म के आंकड़ों में मुर्रा का औसत रोजाना दूध उत्पादन करीब 7.5 किलो और अच्छे रिकॉर्ड में एक दिन का उत्पादन 22.5 किलो तक दर्ज किया गया है. हालांकि हर भैंस का दूध उत्पादन उसकी नस्ल, उम्र, खान-पान, स्वास्थ्य और देखभाल पर निर्भर करता है. इसलिए इंटरनेट पर दिखने वाले 20-30 लीटर रोजाना दूध जैसे दावों को हर मुर्रा भैंस पर लागू नहीं किया जा सकता.
दूध में ज्यादा फैट से क्या फायदा?
भैंस के दूध में आमतौर पर गाय के दूध की तुलना में फैट ज्यादा होता है. मुर्रा के दूध में भी फैट की मात्रा अच्छी होती है. इसका फायदा घी, मक्खन, दही, पनीर और दूसरी डेयरी चीजें बनाने में मिलता है. आईसीएआर के एक अध्ययन में मुर्रा के दूध के अलग-अलग नमूनों में फैट लगभग 6.6 से 8 प्रतिशत के आसपास दर्ज किया गया है. यही वजह है कि डेयरी कारोबार में सिर्फ दूध की मात्रा ही नहीं, बल्कि दूध की क्वालिटी और फैट भी काफी मायने रखता है.
विदेशों में भी क्यों है मांग?
मुर्रा भैंस की पहचान सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. इसकी अच्छी दूध उत्पादन क्षमता और आनुवंशिक खूबियों के कारण इसे दूसरे देशों में भी प्रजनन और नस्ल सुधार के लिए इस्तेमाल किया जाता है. आईसीएआर-सीआईआरबी के मुताबिक मुर्रा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रॉस ब्रिडिंग और प्रोडक्टिविटी इंप्रूवमेंट के लिए लोकप्रिय माना जाता है. यानी विदेशों में इसकी मांग सिर्फ दूध के लिए नहीं, बल्कि अच्छी नस्ल के पशुओं और उनके जेनेटिक मटेरियल की वजह से भी हो सकती है.
किसान इसे 'काला सोना' क्यों कहते हैं?
अब सवाल आता है कि आखिर इसे 'ब्लैक गोल्ड' क्यों कहा जाता है? इसका सीधा कारण है कि अच्छी मुर्रा भैंस किसान के लिए एक तरह की चलती-फिरती संपत्ति बन सकती है. उससे दूध मिलता है, दूध बेचकर रोजाना कमाई हो सकती है और अच्छी नस्ल के पशुओं की ब्रिडिंग वैल्यू भी होती है. इसी आर्थिक महत्व की वजह से आईसीएआर ने भी मुर्रा के संदर्भ में ‘ब्लैक गोल्ड’ शब्द का इस्तेमाल किया है.
लेकिन हर काली भैंस मुर्रा नहीं होती
यह बात समझना भी जरूरी है. सिर्फ काला रंग देखकर किसी भैंस को मुर्रा नहीं कहा जा सकता. मुर्रा की कुछ खास पहचान होती हैं. इसका रंग आमतौर पर गहरा काला, शरीर मजबूत और सींग छोटे होते हैं, जो कसकर पीछे और ऊपर की तरफ मुड़ते हुए घूमे रहते हैं. इसकी नस्ल की सही पहचान के लिए केवल रंग और सींग देखना काफी नहीं, बल्कि पशु की पूरी नस्लीय जानकारी और रिकॉर्ड देखना बेहतर होता है.
अगली बार जब आपको कोई चमकदार काली भैंस दिखे, तो जरूरी नहीं कि वह सिर्फ एक आम भैंस हो. अगर वह मुर्रा नस्ल की है, तो उसकी पहचान उसके मजबूत शरीर, खास सींगों और दूध उत्पादन की क्षमता से भी जुड़ी हो सकती है. इसी दूध उत्पादन, अच्छे फैट और आर्थिक उपयोगिता की वजह से मुर्रा भैंस को 'ब्लैक गोल्ड' कहा जाता है.
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