क्या आपने कभी गौर किया है कि आईने में चेहरा एक जैसा दिखता है, लेकिन मोबाइल कैमरे से फोटो खींचते ही चेहरा कुछ अलग नजर आने लगता है? कई लोगों को सेल्फी में अपनी नाक बड़ी, चेहरा चौड़ा या एक तरफ ज्यादा झुका हुआ दिखाई देता है. इसके पीछे आपकी शक्ल से ज्यादा कैमरे का लेंस और फोटो खींचने का तरीका जिम्मेदार होता है.
सबसे पहला कारण है आईना. आईना आपके चेहरे की वास्तविक छवि को नहीं दिखाता, बल्कि उसका मिरर इमेज दिखाता है. यानी दाएं और बाएं की स्थिति उलटी दिखाई देती है. चूंकि हम रोज अपने चेहरे को इसी रूप में देखते हैं, हमारा दिमाग इस तस्वीर से ज्यादा परिचित होता है. फोटो में चेहरा उलटा नहीं होता, इसलिए वह हमें थोड़ा अजीब लग सकता है.
दूसरा बड़ा कारण है लेंस डिस्टॉर्शन. खासकर मोबाइल का फ्रंट कैमरा काफी वाइड-एंगल लेंस का इस्तेमाल करता है. जब कैमरा चेहरे के बहुत करीब होता है, तो चेहरे का कैमरे के सबसे पास वाला हिस्सा अपेक्षाकृत बड़ा दिखाई दे सकता है. यही वजह है कि सेल्फी में नाक या बीच का हिस्सा वास्तविकता से ज्यादा उभरा हुआ लग सकता है.
इसको और आसान भाषा में समझें
नाक कैमरे के सबसे करीब होती है, जबकि कान और चेहरे के किनारे उससे दूर होते हैं. इसलिए बहुत पास से ली गई सेल्फी में नाक अपेक्षाकृत बड़ी और चेहरे के दूसरे हिस्से अलग अनुपात में दिखाई दे सकते हैं.
2018 में पब्लिश एक वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि करीब 30 सेंटीमीटर की दूरी से ली गई सेल्फी में नाक की चौड़ाई, दूर से ली गई तस्वीर की तुलना में लगभग 30 फीसदी ज्यादा दिखाई दे सकती है. वहीं करीब 1.5 मीटर की दूरी से ली गई तस्वीर में यह अंतर लगभग खत्म हो जाता है.
यहां लेंस डिस्टॉर्शन और पर्सपेक्टिव डिस्टॉर्शन में फर्क समझना भी जरूरी है. वाइड-एंगल लेंस तस्वीर के किनारों पर आकार और सीधी रेखाओं को प्रभावित कर सकता है, लेकिन चेहरे के अनुपात में बदलाव का बड़ा कारण कैमरे और व्यक्ति के बीच की दूरी होती है. फेशियल इमेजिंग पर पब्लिश वैज्ञानिक समीक्षा के मुताबिक, पर्सपेक्टिव डिस्टॉर्शन मुख्य रूप से कैमरे की स्थिति और कैमरे से व्यक्ति की दूरी से पैदा होता है.
दूरी भी बड़ा फर्क डालती है. मान लीजिए कैमरा आपके चेहरे से सिर्फ 20-30 सेंटीमीटर दूर है. ऐसे में चेहरे के अलग-अलग हिस्सों और लेंस के बीच की दूरी में काफी अंतर होता है. लेकिन जब फोटो थोड़ी दूर से ली जाती है और फिर क्रॉप किया जाता है, तो यह प्रभाव कम हो सकता है.
यही वजह है कि पोर्ट्रेट फोटोग्राफी में आमतौर पर कैमरे को चेहरे से कुछ दूरी पर रखा जाता है. इससे चेहरे के अनुपात ज्यादा प्राकृतिक दिखाई दे सकते हैं.
इसके बाद आता है इमेज प्रोसेसिंग. आज के स्मार्टफोन फोटो को सिर्फ रिकॉर्ड नहीं करते. कैमरा सॉफ्टवेयर एक्सपोजर, एचडीआर, शार्पनिंग, स्किन टोन और दूसरे कई पैरामीटर को प्रोसेसिंग के जरिए बदल सकता है. इसलिए स्क्रीन पर दिखाई देने वाली तस्वीर केवल लेंस से आया कच्चा दृश्य नहीं होती.
तो फिर असली चेहरा कौन दिखाता है?
इसका सीधा जवाब है कि आईना या कैमरा, दोनों में से कोई भी अकेले “100% असली” चेहरा नहीं दिखाता. आईना उलटी छवि दिखाता है, जबकि कैमरे की तस्वीर पर लेंस, दूरी, एंगल और सॉफ्टवेयर प्रोसेसिंग का असर पड़ता है.
अगर किसी व्यक्ति को अपने चेहरे का ज्यादा प्राकृतिक फोटो लेना है, तो कैमरे को बहुत पास रखने के बजाय थोड़ी दूरी से फोटो लेना और जरूरत के मुताबिक क्रॉप करना बेहतर तरीका हो सकता है.
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