16 सितंबर 1810 में पादरी मिगुएल हिडाल्गो वाई कोस्टिला ने स्पेन की औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था. मैक्सिको एक लंबे संघर्ष के बाद स्पेन की गुलामी से आजाद हुआ था. मैक्सिको को 27 सितंबर 1821 को स्पेन से आजादी मिली. फिर 16 सितंबर को यहां के लोग अपना स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं. क्योंकि, स्वतंत्रता मिलने से करीब 12 साल पहले 16 सितंबर को ही आजादी की मांग को लेकर पहला विद्रोह शुरू हुआ था. इसी के सम्मान में आज के दिन ही आजादी का जश्न मनाया जाता है.
कैथोलिक पादरी मिगुएल हिडाल्गो वाई कोस्टिला ने अपने 'ग्रिटो डे डोलोरेस' यानी 'डोलोरेस की पुकार' नामक एक लेख प्रकाशित किया था. इस क्रांतिकारी लेख का नाम इसलिए ऐसा रखा गया, क्योंकि 16 सितंबर 1810 को हिडाल्गो ने इसे डोलोरेस शहर में सार्वजनिक रूप से पढ़ा था. इसमें मैक्सिको में 300 वर्षों के स्पेनिश शासन के अंत, भूमि के दोबारा वितरण और नस्लीय समानता की मांग की गई थी.
इस के ऐलान के बाद हजारों लोग वर्जिन ऑफ ग्वाडालूप के झंडे तले हिडाल्गो के साथ जुड़ गए. जल्द ही किसानों की सेना मैक्सिको सिटी की ओर चल पड़ी.19वीं शताब्दी की शुरुआत में नेपोलियन ने जब स्पेन पर कब्जा किया तो पूरे स्पेनिश अमेरिका में विद्रोह भड़क उठे.
मिगुएल हिडाल्गो वाई कोस्टिला, जिन्हें 'मैक्सिकन स्वतंत्रता का जनक' कहा जाता है. उन्होंने अपने 'डोलोरेस की पुकार' के साथ मैक्सिकन विद्रोह की शुरुआत की और उनकी जनवादी सेना मैक्सिकन राजधानी पर कब्ज़ा करने के करीब पहुंच गई. जनवरी 1811 में काल्डेरोन में पराजित होने के बाद, वे उत्तर की ओर भाग गए, लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया और फांसी दे दी गई.
उनके बाद भी अन्य किसान नेताओं ने विद्रोह किया. किसान नेताओं ने स्पेनिश और राजशाही समर्थकों के खिलाफ मूल निवासियों और मिश्रित नस्ल के क्रांतिकारियों की सेनाओं के साथ मिलकर विद्रोह करते रहे. विडंबना यह थी कि अंत में स्वतंत्रता राजशाही समर्थकों ने ही दिलाई. इनमें स्पेनिश मूल के मेक्सिकन और अन्य रूढ़िवादी शामिल थे.
1820 में, उदारवादियों ने स्पेन में सत्ता संभाली और नई सरकार ने मेक्सिकन क्रांतिकारियों को शांत करने के लिए सुधारों का वादा किया. इसके जवाब में, मेक्सिकन रूढ़िवादियों ने मेक्सिकन समाज में अपनी विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति को बनाए रखने के साधन के रूप में स्वतंत्रता की मांग की.
सन् 1821 की शुरुआत में, राजशाही सेना के नेता अगस्टिन डी इटुरबिडे ने विसेंट गुरेरो के साथ इगुआला योजना पर बातचीत की. इस योजना के तहत, मेक्सिको को एक स्वतंत्र संवैधानिक राजतंत्र के रूप में स्थापित किया जाना था. कैथोलिक चर्च के विशेषाधिकार की स्थिति को बनाए रखा जाना था और स्पेनिश मूल के मेक्सिकन लोगों को शुद्ध स्पेनिश लोगों के बराबर माना जाना था. क्योंकि, मिश्रित या शुद्ध स्थानीय मूल के मेक्सिकन लोगों के अधिकार कम थे.
इटुरबिडे ने स्वतंत्रता का विरोध कर रही राजशाही सेनाओं को हरा दिया. फिर धन, रसद और सैनिकों की कमी से जूझ रहे नए स्पेनिश वायसराय को मैक्सिको की स्वतंत्रता स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ा. 24 अगस्त, 1821 को स्पेनिश वायसराय जुआन डी ओ'डोनोजू ने कॉर्डोबा संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसमें मैक्सिको को एक स्वतंत्र संवैधानिक राजतंत्र बनाने की योजना को मंजूरी दी गई.
1822 में, चूंकि मैक्सिको पर शासन करने के लिए कोई बॉर्बन सम्राट नहीं मिला. तब इटुरबिडे को मैक्सिको का सम्राट घोषित किया गया. हालांकि, उनका साम्राज्य अल्पकालिक रहा और 1823 में गणतंत्रवादी नेताओं सांता अन्ना और ग्वाडालूप विक्टोरिया ने इटुरबिडे को पदच्युत कर दिया और एक गणतंत्र की स्थापना की. इसमें ग्वाडालूप विक्टोरिया पहली राष्ट्रपति बनीं.
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