भारत में गाय पालने का चलन काफी पुराना है. गांवों में आज भी बड़ी संख्या में लोग गाय पालकर दूध का कारोबार करते हैं. देश में गायों की कई नस्लें हैं. इनमें कुछ पूरी तरह देसी हैं, जबकि कुछ विदेशी नस्लों को भी भारत में बड़े पैमाने पर पाला जाता है. इन्हीं विदेशी नस्लों में जर्सी गाय का नाम काफी मशहूर है. दूध का कारोबार करने वाले लोग इसे खास तौर पर पसंद करते हैं, क्योंकि यह अच्छी मात्रा में दूध देने के लिए जानी जाती है. लेकिन जर्सी गाय दिखने में कैसी होती है? इसकी पहचान कैसे की जाती है और आखिर इसमें ऐसी क्या खासियत है, जिसकी वजह से यह इतनी लोकप्रिय है? आइए आसान भाषा में जानते हैं.
कहां से आई जर्सी गाय?
जर्सी गाय का नाम जर्सी द्वीप के नाम पर पड़ा है. यह द्वीप इंग्लिश चैनल में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच स्थित है. इसी इलाके में इस नस्ल का विकास हुआ था. बाद में जर्सी गायों को दुनिया के कई देशों में ले जाया गया. भारत में भी डेयरी सेक्टर में जर्सी गायों को अपनाया गया. यहां इन्हें स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से पालने की कोशिश की गई. कई जगह देसी गायों के साथ जर्सी नस्ल का क्रॉस ब्रीडिंग कार्यक्रम भी चलाया गया, ताकि दूध उत्पादन बढ़ाया जा सके.
कैसी दिखती है जर्सी गाय?
जर्सी गाय को उसके शरीर के रंग और आकार से काफी हद तक पहचाना जा सकता है. इसका रंग आमतौर पर हल्के भूरा, सुनहरा, लाल-भूरा या गहरे भूरे रंग का हो सकता है. कुछ गायों के शरीर पर सफेद निशान भी दिखाई देते हैं. यह आमतौर पर दूसरी कुछ बड़ी विदेशी नस्लों की तुलना में आकार में छोटी होती है. इसका शरीर कॉम्पैक्ट होता है और चेहरा छोटा दिखाई देता है. इसके सींग छोटे हो सकते हैं. जर्सी गायों की खास पहचान उनकी बड़ी और अच्छी तरह विकसित थन भी हो सकती है, क्योंकि यही दूध उत्पादन से जुड़ा प्रमुख हिस्सा है.
कितना दूध देती है जर्सी गाय?
जर्सी गाय को डेयरी किसानों के बीच पसंद किए जाने की बड़ी वजह इसका दूध उत्पादन और दूध की क्वालिटी है. हालांकि हर गाय कितना दूध देगी, यह उसकी नस्ल, खान-पान, देखभाल, उम्र, स्वास्थ्य और पालन की परिस्थितियों पर निर्भर करता है. अच्छी देखभाल वाली जर्सी गाय रोजाना करीब 10 से 15 लीटर तक दूध दे सकती है. कुछ बेहतर पशु इससे ज्यादा भी उत्पादन कर सकते हैं. इसलिए इसे डेयरी फार्मिंग के लिए उपयोगी नस्ल माना जाता है. इसके दूध में फैट की मात्रा भी अच्छी होती है. यही वजह है कि जर्सी गाय का दूध मक्खन, घी और दूसरे डेयरी उत्पादों के लिए भी उपयोगी माना जाता है.
जर्सी गाय की एक और खासियत
जर्सी गाय का शरीर छोटा होने की वजह से इसे कुछ परिस्थितियों में बड़ी विदेशी नस्लों की तुलना में कम जगह में भी रखा जा सकता है. इसके अलावा इसके रखरखाव में भी कई किसान इसे सुविधाजनक मानते हैं. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जर्सी गाय को कम चारे या बिना अच्छी देखभाल के पाला जा सकता है. ज्यादा दूध उत्पादन के लिए संतुलित आहार, साफ पानी, साफ-सफाई और पशु चिकित्सक की सलाह जरूरी होती है.
भारत ने भूटान को भी दी थीं जर्सी गायें
भारत और भूटान के बीच कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में भी सहयोग रहा है. इसी सहयोग के तहत भारत की ओर से भूटान को जर्सी गायें दिए जाने का उल्लेख मिलता है. भूटान में डेयरी सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए बेहतर दूध देने वाली गायों की जरूरत रही है. जर्सी नस्ल की गायें इसी वजह से वहां भी उपयोगी मानी गईं. भारत में भी लंबे समय से अलग-अलग नस्लों के पशुओं की मदद से दूध उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जाता रहा है. जर्सी गाय इसी पूरी प्रक्रिया का एक उदाहरण है.
देसी और जर्सी गाय में क्या अंतर है?
देसी गायों की कई अलग-अलग नस्लें भारत में मौजूद हैं, जैसे गिर, साहीवाल और राठी. इनकी अपनी अलग विशेषताएं हैं और कई नस्लें स्थानीय मौसम में अच्छी तरह ढल जाती हैं. वहीं जर्सी एक विदेशी नस्ल है, जिसे खासतौर पर दूध उत्पादन के लिए दुनिया के कई हिस्सों में पाला जाता है. इसलिए गाय चुनते समय केवल दूध की मात्रा देखना ही जरूरी नहीं है. मौसम, चारे की उपलब्धता, बीमारी से बचाव, देखभाल और स्थानीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए. यही वजह है कि जर्सी गाय आज भारत समेत दुनिया के कई देशों में डेयरी फार्मिंग का जाना-पहचाना नाम बन चुकी है.
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