जब तेहरान में US दूतावास पर कट्टरपंथियों ने कब्जा कर लिया, ऐसे शुरू हुआ था ईरान बंधक संकट

आज के दिन ही तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कट्टरपंथी छात्रों ने हमला कर अमेरिकी नागरिकों को बंधक बना लिया था. इतिहास की यह अपने आप में सबसे बड़ी घटना थी.

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तेहरान में कट्टरपंथी छात्रों ने अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया था (Photo - Pexels) तेहरान में कट्टरपंथी छात्रों ने अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया था (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 4:16 PM IST

4 नवंबर 1979 को ईरान की राजधानी तेहरान में एक ऐसी घटना हुई, जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया. यहां अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के समर्थक कुछ छात्रों ने अमेरिका के दूतावास पर हमला कर दिया और उस पर कब्जा कर लिया. हमलावरों ने दूतावास में मौजूद अमेरिकी नागरिकों और कर्मचारियों समेत करीब 90 लोगों को बंधक बना लिया. इसके साथ ही शुरू हुआ ईरान बंधक संकट, जो अगले 444 दिनों तक चला.

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दरअसल, उस समय ईरान में बड़ा राजनीतिक बदलाव हो चुका था. वहां इस्लामी क्रांति के बाद शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता खत्म हो गई थी. शाह देश छोड़कर चले गए थे. जब अमेरिका ने उन्हें इलाज कराने के लिए अपने यहां आने की इजाजत दी, तो ईरान के कट्टरपंथी छात्र भड़क उठे. उन्हें लगा कि अमेरिका एक बार फिर शाह को सत्ता में वापस लाने की कोशिश कर सकता है.

इसी गुस्से में छात्रों ने अमेरिकी दूतावास को निशाना बनाया. उन्होंने धमकी दी कि अगर अमेरिका ने बंधकों को छुड़ाने के लिए कोई सैन्य कार्रवाई की, तो वे उन्हें मार डालेंगे. कुछ ही दिनों बाद ईरान की अंतरिम सरकार के प्रमुख ने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद अयातुल्ला खुमैनी का देश पर नियंत्रण और मजबूत हो गया. अब बंधकों की किस्मत का फैसला भी काफी हद तक उन्हीं के हाथ में था.

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दूतावास पर कब्जे के करीब दो हफ्ते बाद खुमैनी ने कुछ बंधकों को रिहा करने का फैसला किया. इनमें गैर-अमेरिकी नागरिक, सभी महिलाएं और अल्पसंख्यक समुदायों से आने वाले अमेरिकी नागरिक शामिल थे. खुमैनी का तर्क था कि ये वे लोग हैं, जिन्हें अमेरिकी सरकार ने भी दबाकर रखा है. हालांकि, बाकी 52 अमेरिकी नागरिकों को बंधक बनाए रखा गया.

अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने बातचीत के जरिए संकट खत्म करने की कोशिश की, लेकिन कोई हल नहीं निकला. जब कूटनीतिक प्रयास नाकाम रहे, तो कार्टर ने 24 अप्रैल 1980 को बंधकों को छुड़ाने के लिए सैन्य अभियान का आदेश दिया. लेकिन यह मिशन बुरी तरह नाकाम रहा. इसमें अमेरिका के आठ सैन्यकर्मियों की मौत हो गई और एक भी बंधक को छुड़ाया नहीं जा सका.

इसके करीब तीन महीने बाद ईरान के पूर्व शाह की मिस्र में कैंसर से मौत हो गई. लेकिन इसके बावजूद बंधक संकट खत्म नहीं हुआ. नवंबर 1980 में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हुए, जिसमें जिमी कार्टर को रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार रोनाल्ड रीगन के हाथों हार का सामना करना पड़ा.

इसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता खुला. इस प्रक्रिया में अल्जीरिया ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई. कई दौर की बातचीत के बाद दोनों देश एक समझौते पर पहुंचे. इसके तहत अमेरिका ने ईरान की फ्रीज की गई संपत्ति जारी करने और अतिरिक्त वित्तीय सहायता देने का वादा किया.

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20 जनवरी 1981 को रोनाल्ड रीगन ने अमेरिका के नए राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली. इसी दिन ईरान में बंधक बनाए गए अमेरिकी नागरिकों की रिहाई का रास्ता साफ हो गया. रीगन के शपथ लेने के कुछ ही मिनट बाद सभी बंधक अल्जीरिया के एक विमान से ईरान से रवाना हो गए.

इस तरह 444 दिनों तक चला ईरान बंधक संकट खत्म हुआ. इस घटना ने अमेरिका और ईरान के रिश्तों में गहरी दरार पैदा कर दी. दोनों देशों के बीच अविश्वास और तनाव का जो दौर शुरू हुआ, उसका असर आने वाले कई दशकों तक दिखाई देता रहा.

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