1 नवंबर 1911 को इटैलियन आर्मी के लेफ्टिनेंट गिउलिओ गावोटी ने लीबिया के ऊपर उड़ते हुए, अपने प्लेन से तुर्की कैंप के ऊपर तीन ग्रेनेड फेंके, जिससे दुनिया का पहला हवाई बम गिरा. अमेरिका में राइट बंधुओं के दुनिया की पहली उड़ान भरने के ठीक आठ साल बाद , इटली के किंगडम ने टूटते हुए ऑटोमन साम्राज्य के खिलाफ अपनी लड़ाई में इलाके जीतने की उम्मीद में लीबिया में कई एयरक्राफ्ट भेजे. गैवोटी इटैलियन सेना के लकड़ी और कैनवास के बने 'टॉबे' हवाई जहाज में सवार हुए और अपने साथ चार ग्रेनेड ले गए.
वह तुर्की के ऐन ज़ारा, आज के त्रिपोली के पूरब में एक कैंप की तरफ उड़ गए और अपने पास मौजूद चार में से तीन ग्रेनेड फेंक दिए. यह पहली बार था जब दुश्मनों की फायरिंग के बाद किसी प्लेन से ज़िंदा बम गिराए गए थे. इससे पहले आसमान से इस तरह कभी कोई बम नहीं गिराए गए थे.
ऑटोमन साम्राज्य ने गुस्से में जवाब दिया और दावा किया कि बम एक फ़ील्ड हॉस्पिटल पर गिरे और बेगुनाह आम लोगों की मौत हो गई. ग्रेट ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, रूस और यूनाइटेड स्टेट्स की सरकारों ने इस हमले की जांच शुरू की और नतीजे जारी किए कि बमबारी से शायद बहुत कम या कोई नुकसान नहीं हुआ.क्योंकि ग्रेनेड या तो फटे नहीं थे या रेगिस्तान के सुनसान इलाकों में फटे थे.
भले ही इस हमले का कोई खास असर न हुआ हो, लेकिन इसने हवाई हमलों के एक नए दौर की शुरुआत का इशारा दिया. कुछ साल बाद, पहले विश्व युद्ध के दौरान तैनात जर्मन ज़ेपेलिन एयरशिप ने एंटवर्प से लेकर पेरिस और लंदन तक यूरोप के शहरों पर बम गिराए. यह उस समय की शुरुआत थी जब सिर्फ़ लड़ाके ही नहीं, आम लोग भी एयरक्राफ़्ट से निशाना बनाए जाते थे.
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