पीएम मोदी को राष्ट्र ऋषि की उपाधि पर विवाद, 15 जून को काशी विद्वत परिषद की बैठक

काशी विद्वत परिषद के महासचिव शिवजी उपाध्याय ने फैसले राजनीति से प्रेरित बताते हुए कहा था कि सत्ताधारी दल के प्रति झुकाव रखने वाले कुछ लोगों ने गैर राजनीतिक सदस्यों से विमर्श किए बगैर ही उपाधि देने की घोषणा कर दी. इसके लिए न तो आवश्यक प्रक्रिया अपनाई गई और ना ही परिषद की बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया.

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बिकेश तिवारी

  • नई दिल्ली,
  • 09 जून 2019,
  • अपडेटेड 8:21 AM IST

काशी विद्वत परिषद ने पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्र ऋषि (राष्ट्रीय संत) की उपाधि से विभूषित करने की घोषणा की थी. परिषद की ओर से इसके लिए आपात बैठक बुलाकर प्रस्ताव भी पारित करा दिया गया. लेकिन अब इसे लेकर परिषद दो गुट में बंट गया है. एक गुट ने इसे राजनीति से प्रेरित बताते हुए इस सम्मान का विरोध किया है. पीएम मोदी को मिलने वाली यह उपाधि अब विवादों में आ गई है. पीएम को उपाधि पर परिषद के ही महासचिव शिवजी उपाध्याय ने नियमों का अनुपालन ना किए जाने का हवाला देते हुए इस पर सवाल उठाए है. वहीं आरोपों को खारिज करते हुए परिषद के सचिव डॉक्टर राम नारायण द्विवेदी ने कहा कि यह निर्णय नियमों के दायरे में लिया गया है.

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विद्वत परिषद के सचिव ने कहा कि आपात बैठक की जानकारी महासचिव उपाध्याय समेत कार्यकारिणी के सभी सदस्यों को फोन के माध्यम से दी गई थी. वह बैठक में उपस्थित नहीं हो सके थे. डॉक्टर द्विवेदी ने दावा किया कि पीएम को उपाधि देने का तब उपाध्याय ने भी समर्थन किया था. अब वह विरोध में क्यों उतर आए, यह वही जानें. उन्होंने परिषद के दो गुट में बंटने की खबरों को खारिज करते हुए कहा कि कार्यकारिणी में कोई गुटबाजी नहीं है. प्रधानमंत्री को राष्ट्र ऋषि की उपाधि प्रदान करने पर अधिकतर सदस्य सहमत हैं.

काशी विद्वत परिषद के सचिव ने कहा कि 15 जून को कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई है. यदि किसी बिंदु को लेकर किसी भी सदस्य अथवा पदाधिकारी के मन में कोई भ्रम होगा, तो उसका निराकरण किया जाएगा.

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परिषद के महासचिव ने लगाए थे यह आरोप

काशी विद्वत परिषद के महासचिव शिवजी उपाध्याय ने फैसले राजनीति से प्रेरित बताते हुए कहा था कि सत्ताधारी दल के प्रति झुकाव रखने वाले कुछ लोगों ने गैर राजनीतिक सदस्यों से विमर्श किए बगैर ही उपाधि देने की घोषणा कर दी. इसके लिए न तो आवश्यक प्रक्रिया अपनाई गई और ना ही परिषद की बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया. ऋषि द्विवेदी समेत परिषद की कार्यकारिणी के कई सदस्यों ने भी उपाध्याय का समर्थन करते हुए कहा कि इस आशय का प्रस्ताव कब और किस मीटिंग में पारित किया गया, इसकी जानकारी हमें नहीं है. दावे के मुताबिक यदि आपात बैठक में ही इसके लिए प्रस्ताव पारित किया गया, तो भी बैठक की सूचना तो सभी सदस्यों को दी ही जानी चाहिए थी.

चुनाव से पूर्व लॉबिंग का भी लगा था आरोप

परिषद की ओर से पहले पीएम मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ को उपाधि प्रदान करने के लिए लॉबिंग के आरोप भी लगे हैं. परिषद की कार्यकारिणी के एक सदस्य ने बीजेपी के एक केंद्रीय नेता और एक मंत्री द्वारा दो सदस्यों से संपर्क किए जाने का आरोप लगाते हुए कहा था कि तब कार्यकारिणी के 90 फीसदी सदस्यों ने दोनों नेताओं को उपाधि प्रदान करने का विरोध किया था. इस सदस्य ने कहा कि पीएम मोदी को नियमों को ताक पर रख जल्दबाजी में उपाधि प्रदान करने की घोषणा कर दी गई है. इससे संस्था की छवि को नुकसान पहुंचा है.

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