जब सोनिया के खिलाफ सुषमा ने लड़ा था चुनाव, कन्नड़ में भाषण सुन चकित हुए थे वाजपेयी

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की दिग्गज नेता और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का मंगलवार रात निधन हो गया. वह 1999 में कर्नाटक की बेल्लारी लोकसभा सीट से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ चुकी थीं.

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पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का निधन हो गया.( फोटो-IANS) पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का निधन हो गया.( फोटो-IANS)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 अगस्त 2019,
  • अपडेटेड 7:47 AM IST

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की दिग्गज नेता और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का मंगलवार रात निधन हो गया. वह देश के लोकप्रिय नेताओं में से एक थीं. अपने राजनीतिक करियर के दौरान उन्होंने चार राज्यों में 11 चुनाव लड़े. कर्नाटक के बेल्लारी लोकसभा सीट का चुनाव काफी चर्चित रहा था. हालांकि इस चुनाव में वह हार गईं थीं. तब उन्होंने कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष और मौजूदा यूपीए चेयरमैन सोनिया गांधी के खिलाफ ताल ठोकी थी.

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कन्नड़ में भाषण देकर जीता दिल

बात 1999 के लोकसभा चुनाव की है. तब सोनिया गांधी वहां से चुनाव लड़ रही थीं. बीजेपी ने सुषमा स्वराज को चुनाव मैदान में उतारा. सुषमा स्वराज ने स्थानीय मतदाताओं से सहज संवाद के लिए कन्नड़ सीखनी शुरू की. एक महीने के अंदर वह कन्नड़ सीखने में सफल रहीं. इसके बाद वह चुनावी रैलियों में कन्नड़ में धाराप्रवाह भाषण देने लगीं. उन्हें हिंदी भाषी नेताओं की तरह अब कर्नाटक में ट्रांसलेटर की जरूरत नहीं पड़ती थी.

खास बात है कि एक रैली में जब अटल बिहारी वाजपेयी पहुंचे तो सुषमा स्वराज का कन्नड़ में जबर्दस्त भाषण सुनकर हैरान रह गए. तब उन्होंने रैली में उनकी तारीफ की थी. कन्नड़ में भाषण देने के चलते सुषमा ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान न केवल बेल्लारी बल्कि कर्नाटक की जनता का दिल जीता. हालांकि उन्हें 56 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा. पहले बेल्लारी सीट मद्रास और फिर मैसूर स्टेट में हुआ करती थी लेकिन 1977 के बाद से यह कर्नाटक हिस्सा है. मौजूदा समय यह सीट आरक्षित है.

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(यहां सुनिए- कर्नाटक की बेल्लारी सीट के चुनाव के दौरान कन्नड़ में सुषमा का भाषण)

बेल्लारी के लोकसभा चुनाव में हार के बाद बीजेपी ने अप्रैल 2000 में उन्हें उत्तर प्रदेश के कोटे से राज्यसभा में भेजा. उन्हें फिर वाजपेयी सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्रालय सौंपा गया. इस पद पर वे सितंबर 2000 से जनवरी 2003 तक रहीं. सन 2003 में उन्हें स्वास्थ्य, परिवार कल्याण और संसदीय मामलों का मंत्री बनाया गया. मई 2004 में एनडीए सरकार के सत्ता से बाहर होने तक वे मंत्री बनी रहीं.

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