कैशलेस बनाम नकद ट्रांजैक्शन में जानें ये अहम बातें

अर्थव्यवस्था में कुल करेंसी का लगभग 86 फीसदी करेंसी 500 और 1000 रुपये की नोट में थी जिसे गैरकानूनी घोषित किया जा चुका है. अब सरकार की कोशिश अर्थव्यवस्था को कैशलेस ट्रांजैक्शन की तरफ ले जाने की है जहां डिजिटल ट्रांजैक्शन को तरजीह दी जानी है.

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जानिए कैश इकोनॉमी और कैशलेस इकोनॉमी में क्या है अंतर जानिए कैश इकोनॉमी और कैशलेस इकोनॉमी में क्या है अंतर

अभि‍षेक आनंद

  • नई दिल्ली,
  • 18 नवंबर 2016,
  • अपडेटेड 11:42 AM IST

देश में ब्लैक इकोनॉमी पर लगाम लगाने और ब्लैक मनी को खत्म करने के लिए डिमॉनेटाइजेशन प्रक्रिया लागू की गई है. अर्थव्यवस्था में कुल करेंसी का लगभग 86 फीसदी करेंसी 500 और 1000 रुपये की नोट में थी जिसे गैरकानूनी घोषित किया जा चुका है. अब सरकार की कोशिश अर्थव्यवस्था को कैशलेस ट्रांजैक्शन की तरफ ले जाने की है जहां डिजिटल ट्रांजैक्शन को तरजीह दी जानी है. जानिए कैश इकोनॉमी और कैशलेस इकोनॉमी में क्या है अंतर:

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कैश ट्रांजैक्शन
1. किसी भी खरीदारी अथवा बिकवाली का सबसे पुराना तरीका कैश ट्रांजैक्शन है. देश की अर्थव्यवस्था में 18 लाख करोड़ रुपये की करेंसी शुरू होने के पहले थी. वहीं लगभग 84 लाख करोड़ रुपए से अधिक करेंसी ब्लैक इकोनॉमी में मौजूद होने का सरकारी अनुमान है.

2. कैश का इस्तेमाल कर ट्रांजैक्शन को आसानी से करने के लिए बड़ी से बड़ी डिनॉमिनेशन (500, 1000, 2000 रुपए की करेंसी) ज्यादा मददगार साबित होती है. कैश के जरिए ट्रांजैक्शन करने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि उक्त ट्रांजैक्शन को बैंक अथवा सरकार से और कानून के मुताबिक किसी ट्रांजैक्शन पर देय टैक्स से भी बचा जा सकता है.

3.कैश ट्रांजैक्शन बेहद आसान तरीका है. यहां किसी भी खरीदारी के बदले सिर्फ करेंसी की जरूरत पड़ती है. कैश ट्रांजैक्शन को आसान इसलिए माना जाता है कि यहां महज करेंसी के आदान-प्रदान पर ट्रांजैक्शन पूरा मान लिया जाता है. इस माध्यम में खरीदार के पास सिर्फ करेंसी और बेचने वाले के पास सिर्फ उत्पाद का रहना आवश्यक है.

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कैशलेस ट्रांजैक्शन
1.कैशलेस ट्रांजैक्शन डिजिटलाइजेशन के दौर में तेजी से लोकप्रिय होता माध्यम है. इस माध्यम से खरीदारी अथवा बिकवाली करने के लिए दोनों खरीदार और बेचने वाले को बैंक का सहारा लेने की जरूरत पड़ती है. इस माध्यम में आपके बैंक के साथ-साथ रिजर्व बैंक और सरकार के टैक्स विभाग की भी अहम भूमिका रहती है.

2. कैशलेस ट्रांजैक्शन के लिए प्लास्टिक मनी अथवा क्रेडिट और डेबिट का सहारा लिया जाता है. यह कार्ड किसी बैंक में अकाउंट खोलने पर दिया जाता है. इसके अलावा, बैंक का चेक और ड्राफ्ट कैशलेस ट्रांजैक्शन की श्रेणी में आता है. डिजिटल वॉलेट, मोबाइल बैंकिंग, एनईएफटी और आरटीजीएस भी कैशलेस ट्रांजैक्शन के तेजी से पॉप्युलर होते तरीके हैं.

3.कैशलेस ट्रांजैक्शन में कैश जैसी आसानी नहीं देखने को मिलती है. लेकिन सुरक्षा के लिहाज से यह कैश लेने-देने से काफी बेहतर है. इस माध्यम में बैंक और सरकार के कर विभाग की नजर में प्रत्येक बड़े ट्रांजैक्शन रहते हैं. वहीं छोटे से छोटे ट्रांजैक्शन का भी पूरा ब्यौरा मौजूद रहता है.

कैशलेस बनाम कैश
1. बीते पांच साल के दौरान देश में मोबाइल बैंकिंग में 1000 गुना इजाफा देखने को मिला है.
2. एनईएफटी के माध्यस से कैशलेस ट्रांसफर में बीते पांच वर्षों के दौरान 20 गुना इजाफा हुआ है.
3. बैंकिग में आरटीजीएस और चेक पेमेंट बीते पांच साल के दौरान महज दो गुना हुआ है.
4. बीते पांच साल के दौरान चेक पेमेंट और नेट बैंकिंग में गिरावट दर्ज हुई है.
5. पांच साल पहले तक बैंकिंग व्यवस्था में तीन-चौथाई पेमेंट चेक के माध्यम से किया जाता था.

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अब कैश ट्रांजैक्शन और कैशलेस ट्रांजैक्शन की इन सुविधाओं और दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए सरकार और रिजर्व बैंक की कोशिश है कि देश को कैश से कैशलेस इकोनॉमी की तरफ बढ़ाया आगे जाए. हालांकि, इसके लिए बेहद जरूरी है कि देश में बैंकिग को अधिक पॉपुलर किया जाए. देश की ज्यादा से ज्यादा जनसंख्या को न सिर्फ बैंकिंग के दायरे में लाने को प्राथमिकता दी जाए बल्कि उन्हें बैंकिंग के जरिए खरीदारी और बिकवाली करने में भी सक्षम किया जाए.

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