Exclusive: IFS संजीव चतुर्वेदी को मिली बड़ी जीत, गलत एक्शन पर सरकार को देना पड़ा हर्जाना

भारतीय वन सेवा के चर्चित अफसर संजीव चतुर्वेदी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट को खराब किए जाने को नैनीताल हाईकोर्ट ने प्रतिशोधात्मक कार्रवाई माना था. अब सरकार को इसके बदले संजीव चतुर्वेदी को मुआवजा देना पड़ा है.

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आईएफएस अफसर संजीव चतुर्वेदी.(फोटो-फेसबुक से) आईएफएस अफसर संजीव चतुर्वेदी.(फोटो-फेसबुक से)

नवनीत मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 08 अगस्त 2019,
  • अपडेटेड 5:46 PM IST

आईएफएस संजीव चतुर्वेदी के खिलाफ बदले की भावना से की गई कार्रवाई के मामले में केंद्र सरकार को आखिरकार मुआवजा देना पड़ा है. सरकार को कुल 50 हजार रुपये चुकाने पड़े हैं. इसमें 25 हजार रुपये का चेक संजीव चतुर्वेदी को सरकार ने पांच अगस्त को व्यक्तिगत रूप से दिए हैं तो 25 हजार रुपये सुप्रीम कोर्ट की लीगल सर्विस कमेटी में जमा किए हैं.

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संजीव चतुर्वेदी के वकील संदीप तिवारी ने Aajtak.in से कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले एक अफसर की यह बड़ी जीत है. यह दुर्लभ मामलों में से है कि जब सरकार को अपने ही अफसर के खिलाफ की गई प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के लिए हर्जाना भरना पड़ा है. संजीव के हाथ में आया 25 हजार का चेक सबूत है कि वह अपनी ड्यूटी पर सही रहे, फिर भी सिस्टम उनके उत्पीड़न पर आमादा रहा."

नैनीताल हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मुआवजा न जमा होने के कारण संजीव चतुर्वेदी ने कंटेम्प्ट के साथ आपराधिक चार्ज फ्रेम किए जाने की मांग की थी. जिसके बाद हेल्थ सेक्रेटरी और एम्स डायरेक्टर की ओर से मुआवजे की धनराशि अदा की गई. वहीं उनकी ओर से कोर्ट में बिना शर्त के माफी भी मांगते हुए कहा है कि मुआवजा देने में देरी वकील की गलत सलाह के चलते हुई. संजीव चतुर्वेदी हरियाणा में हुड्डा सरकार से भी इसी तरह के मामले में 11 हजार रुपये का पूर्व में हर्जाना हासिल कर चुके हैं.

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संजीव चतुर्वेदी को स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से मिला 25 हजार मुआवजे का चेक.

क्या है मामला

 मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित हो चुके भारतीय वन सेवा के चर्चित अफसर संजीव चतुर्वेदी ने एम्स में मुख्य सतर्कता अधिकारी रहते भ्रष्टाचार के कई मामलों का खुलासा किया था. इस बीच 2014  में उन्हें मुख्य सतर्कता अधिकारी पद से स्वास्थ्य मंत्रालय ने हटा दिया था. तब से वह उत्तराखंड के हल्द्वानी में पोस्टेड हैं. इस बीच 2015-16 की उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट( एसीआर) को शून्य कर दिया गया.

11 जनवरी 2017 को उन्होंने एसीआर शून्य कर देने के मामले में उत्तराखंड स्थित नैनीताल हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो कोर्ट ने नैनीताल कैट जाने की सलाह दी. बाद में नैनीताल कैट ने स्वास्थ्य मंत्रालय और एम्स को नोटिस जारी किया. इस पर सरकार ने दिसंबर 2017 में दिल्ली कैट में केस की स्थानांतरण अपील की. नैनीताल और दिल्ली कैट में समानांतर मामला चलता रहा. इस बीच 27 जुलाई 2018 को दिल्ली कैट के चेयरमैन ने नैनीताल कैट की खंडपीठ की कार्यवाही  पर छह महीने के रोक लगा दी.

जिस पर संजीव चतुर्वेदी नैनीताल हाईकोर्ट गए. हाई कोर्ट ने कैट चेयरमैन के आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर का मानते हुए न केवल उन्हें नोटिस जारी किया, बल्कि केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय और एम्स प्रशासन को भी विन्डिक्टिव यानी प्रतिशोधी मानते हुए 25 हजार का जुर्माना लगाया. राहत पाने की आस में बाद में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने गए स्वास्थ्य मंत्रालय और एम्स पर 25 हजार और जुर्माने का चाबुक चल गया. इस प्रकार उत्तराखंड हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की ओर से कुल 50 हजार का हर्जाना लगाया गया.

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उस वक्त सरकार ने 25 हजार रुपये तो सुप्रीम कोर्ट के लीगल सर्विस सेल में जमा कर दिया था, मगर हाईकोर्ट के आदेश पर 25 हजार संजीव चतुर्वेदी को निजी रूप से नहीं दिया था. अब वह भी देना पड़ा है. संजीव के वकील संदीप तिवारी बताते हैं कि मंत्रालय के अफसर सोचते थे कि संजीव को मुआवजा देने पर यह मान लिया जाएगा कि वह अपनी प्रतिशोधात्मक कार्रवाई को स्वीकार करते हैं. इससे बचने के लिए उन्होंने आनाकानी की. मगर कोर्ट की सख्ती पर उन्हें देना पड़ा.

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