मोहन भागवत ने संघ की 100 साल की यात्रा और भारत के स्वबोध पर जोर दिया. उन्होंने देश की सांस्कृतिक एकता, सनातन परंपरा और संघ द्वारा चलाए गए राष्ट्रव्यापी संपर्क अभियान की उपलब्धियों के बारे में विस्तार से बताया.