भोजन में कीटनाशक, जनता बीमारी से बेहाल, सोता सरकारी सिस्टम... और कंपनियां हो रहीं मालामाल!

पिछले तीन साल में देश में खाद्य पदार्थों के 70,652 नमूनों की जांच में 2,223 सैंपल में कीटनाशकों की मात्रा FSSAI की तय सुरक्षित सीमा से ज्यादा मिली. कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा में ऐसे मामले सबसे ज्यादा सामने आए. लेख में कीटनाशकों के ओवरडोज, प्रतिबंधित केमिकल्स की बिक्री और टेस्टिंग लैब की कमी को लेकर चिंता जताई गई है.

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खाने की चीजों में कीटनाशकों का ओवरडोज, 2,223 सैंपल तय सीमा से ज्यादा दूषित. (Photo-ITG) खाने की चीजों में कीटनाशकों का ओवरडोज, 2,223 सैंपल तय सीमा से ज्यादा दूषित. (Photo-ITG)

ओम प्रकाश

  • नई दिल्ली,
  • 01 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:01 AM IST

आप और आपका परिवार सेहत बनाने के लिए 'पौष्टिक भोजन' समझकर खा रहा है, वह असल में कैंसर और हार्मोनल इम्बैलेंस जैसी बीमारियों का कारण साब‍ित हो सकता है. पिछले तीन साल में ही देश के भीतर खाद्य पदार्थो में कीटनाशकों के जानलेवा ओवरडोज वाले 2,223 डरावने केस सामने आ चुके हैं. इसका मतलब यह है क‍ि इतने सैंपल में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा कीटनाशकों की निर्धारित सुरक्षित सीमा (MRL) से ज्यादा अंश पाया गया.

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हैरानी और विचलित करने की बात यहीं खत्म नहीं होती. भारत में आज वो कीटनाशक भी सरकारी तंत्र की असीम अनुकंपा से धड़ल्ले से बिक रहे हैं, जिन्हें इंसानी सेहत पर गंभीर खतरों को देखते हुए दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देश बहुत पहले ही पूरी तरह बैन कर चुके हैं. विदेशी सरकारों ने अपनी जनता की जान की कीमत समझी, लेकिन हमारे देश का सिस्टम उन्हीं प्रतिबंधित केमिकल्स को खुले बाजार में बिकने की छूट देकर हमारी थाली को जहरीला बना रहा है. 

बहरहाल, खाने-पीने की चीजों में कीटनाशकों का अंश म‍िलने का यह कड़वा सच केंद्रीय कृषि मंत्रालय के फाइलों से सामने आया है. कृष‍ि विभाग की राष्ट्रीय स्तर पर कीटनाशक अवशेषों की निगरानी (MPRNL) परियोजना के तहत 2023-2026 तक सरकारी अधिकारियों ने बाजारों से सैंपल उठाए, जिनकी जांच में कीटनाशकों के ओवरडोज वाले 2,223 केस सामने आए.

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कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, जम्मू और कश्मीर, असम, झारखंड, चंडीगढ़, दिल्ली और छत्तीसगढ़ से सब्ज़ियों, फलों, मसालों, अनाज, दलहन, जड़ी-बूटियों, चाय, दूध और अंडे के कुल 70,652 नमूने ल‍िए गए थे.

क‍ितना खतरनाक है यह खेल

चमचमाते दफ्तरों में बैठी कीटनाशक कंपनियों की लॉबी और सरकारी अधिकारी इसे महज 3.1 फीसदी सैंपल में कीटनाशकों की मात्रा तय मानक से ज्यादा कहकर इसे खारिज करने की कोश‍िश कर सकते हैं. लेकिन देश की खाद्य सुरक्षा और पब्ल‍िक हेल्थ के नजरिए से एक भी सैंपल में तय सीमा से अधिक जहर का पाया जाना देश के नागरिकों के साथ सीधे तौर पर आपराधिक खिलवाड़ है, क्योंकि यह एक दूषित सैंपल भी लाखों बेकसूर उपभोक्ताओं की जिंदगी को दांव पर लगा देता है. केम‍िकल के इस खेल में सबसे शर्मनाक बात यह है कि आज देश के लोगों को यह पता भी नहीं है कि वह अपने घर आने वाले भोजन की जांच कहां करवाए, क्योंकि देश के अधिकांश जिलों में औसतन एक भी टेस्टिंग लैब मौजूद नहीं है. 

कंपनियों और अफसरों की 'सेटिंग'

जब भी भोजन में कीटनाशकों के इस जानलेवा स्तर पर सवाल उठता है तो कीटनाशक कंपनियां तुरंत अपना घिसा-पिटा कैसेट बजाने लगती हैं. उनके माल‍िक और प्रत‍िन‍िध‍ि कहते हैं क‍ि भारत में प्रति हेक्टेयर कीटनाशकों की खपत दुनिया में सबसे कम है. दुर्भाग्य की बात यह है कि जनता के टैक्स से मोटी तनख्वाह पाने वाले रेंगुलेटर भी कंपनियों के इस सुर में सुर मिलाकर देश को गुमराह कर रहे हैं. इस 'कम खपत' के झूठ का कड़वा सच समझने की जरूरत है. प‍िछले द‍िनों कृष‍ि मंत्रालय के एक अध‍िकारी ने द‍िल्ली में आयोज‍ित एक कार्यक्रम में ऐसा ही राग अलापा.

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भारत के एक बहुत बड़े कृषि क्षेत्र (जैसे सूखे इलाके या मोटे अनाज की खेती) में कीटनाशकों का इस्तेमाल न के बराबर होता है. जब पूरे देश का औसत निकाला जाता है, तो आंकड़ा कम दिखता है. लेकिन सच यह है कि जो फल और सब्जियां सीधे हमारी और आपकी थाली में आ रही हैं, उन पर किसान निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक केमिकल्स का छिड़काव कर रहे हैं. वजह यह है क‍ि कृष‍ि मंत्रालय और अध‍िकारी गांवों में इस बारे में क‍िसानों को जागरूक करने जाते ही नहीं हैं. वहीं, एग्रोकेमिकल कंपनियों को भी इसकी कोई खास फिक्र नहीं है, क्‍योंकि उन्‍हें स‍िर्फ अपने मुनाफे की पड़ी है.

क्या भारतीयों की बॉडी स्टील की है?

खाद्य पदार्थों में तय मानक से ज्यादा कीटनाशक म‍िलने के साथ ही एक और मुद्दा प्रतिबंधित और जानलेवा केमिकल के दशकों तक भारतीय बाजारों में बिकने का भी है. यह बिना मजबूत 'सेटिंग' के मुमकिन नहीं है. जो केम‍िकल अमेर‍िका और जर्मनी, जापान में बैन है वो भारत में क्यों बेचा और बनाया जा रहा है. क्या भारत के लोगों की बॉडी स्टील की बनी है. यह हमारे देश के एग्रो केम‍िकल लॉबी और उनकी पैराकारी करने वाले कृष‍ि भवन के अध‍िकार‍ियों को समझना चाह‍िए.

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जहां एग्रो केम‍िकल लॉबी सरकारी अफसरों को मुख्य अतिथि बनाकर अवार्ड से नवाज रही है, वहां स्वतंत्र वैज्ञानिकों की चेतावनियों को दबाकर यह साबित किया जाता है कि बिना केमिकल्स के देश भूखा मर जाएगा. प्रधानमंत्री और कृष‍ि मंत्री केम‍िकल फ्री खेती की बात कर रहे हैं और एग्रो केम‍िकल कंपन‍ियां और उनके समर्थक अध‍िकारी कह रहे हैं क‍ि केम‍िकल के ब‍िना तो देश अनाज और फल-सब्ज‍ियों में कंगाल हो जाएगा. 

इन राज्यों में सबसे ज्यादा मामले 

कर्नाटक: यहां कुल 9,176 नमूनों की जांच की गई, जिसमें से 334 सैंपलों में कीटनाशकों की मात्रा FSSAI की सुरक्षित सीमा से कहीं ज्यादा मिली.

महाराष्ट्र: इस राज्य से 5,295 नमूने लिए गए, जिनमें से 260 सैंपल पूरी तरह असुरक्षित और विषैले पाए गए.

गुजरात: यहां विश्लेषित किए गए 6,035 नमूनों में से 170 नमूनों में केमिकल्स का ओवरडोज दर्ज किया गया.

हरियाणा: इस राज्य से 2,371 नमूने जांच के लिए भेजे गए थे, जिनमें से 152 सैंपल भारी मात्रा में कीटनाशकों से दूषित मिले.

बीमारी को सीधा आमंत्रण

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, भोजन में इन केमिकल्स का मिलना किसी सामान्य मिलावट जैसा नहीं है, बल्कि यह मानव शरीर को अंदर से खोखला कर रहा है. भोजन में मौजूद ऑर्गेनोफॉस्फेट जैसे तत्व सीधे तौर पर ब्लड कैंसर (ल्यूकेमिया) और ट्यूमर का कारण बन सकते हैं. 

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युवाओं और महिलाओं में तेजी से बढ़ रही गंभीर शारीरिक और मानसिक समस्याओं का मुख्य कारण ये 'एंडोक्राइन डिस्ट्रप्टर्स' केमिकल्स हो सकते हैं. गर्भवती महिलाओं के जरिए यह जहर अजन्मे बच्चों तक पहुंच सकता है, जिससे बच्चों में जन्मजात विकृतियां और कम आईक्यू जैसी गंभीर समस्याएं देखी जा सकती हैं.

जनता को केम‍िकल फ्री भोजन कैसे मिलेगा?

जब तक कृषि मंत्रालय और FSSAI जैसे रेगुलेटर कागजी आंकड़ों की आड़ में छिपना बंद करके कीटनाशक लॉबी पर सख्त कानूनी नकेल नहीं कसते तब तक देश की जनता बीमार होती रहेगी. यह लड़ाई सिर्फ खेती की नहीं, बल्कि देश की आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को बचाने की है. बहरहाल, हमारे सेट‍िंग वाले स‍िस्टम के बीच लोगों को शुद्ध भोजन की गारंटी तब तक नहीं मिल सकती, जब तक ये तीन कड़े कदम नहीं उठाए जाते. 

1. मंडियों और लोकल स्तर पर टेस्टिंग अनिवार्य हो: हर बड़ी सब्जी मंडी (APMC), जिले और ब्लॉक स्तर पर सरकारी रैंडम टेस्टिंग लैब का नेटवर्क खड़ा होना चाहिए, ताकि आम नागरिक भी अपने स्तर पर जांच करा सके. जिस लॉट में जहर की मात्रा तय सीमा से अधिक मिले, उसे तुरंत जब्त कर नष्ट किया जाए.

2. जो कीटनाशक विदेशों में इंसानी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक मानकर बैन किए जा चुके हैं, उनके घरेलू उपयोग पर सरकार को बिना किसी देरी के तुरंत बैन लगाना चाहिए.

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3. FSSAI और कीटनाशक बोर्ड में ऐसे स्वतंत्र वैज्ञानिकों और पब्ल‍िक हेल्थ विशेषज्ञों को शामिल किया जाए, जिनमें शामिल लोगों का कीटनाशक कंपनियों से दूर-दूर तक कोई आर्थ‍िक संबंध न हो.

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