उम्र कैद की सजा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में रखे जाने की सजा संवैधानिक प्रावधानों का हनन नहीं है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह फैसला सुनाया. याचिकाकर्ता उम्रकैदियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि उम्र कैद की सजा काट रहे दोषियों को अपने प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में रखने की सजा वैध है.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अपने 21 पन्नों के निर्णय में कहा कि दोषी को बची हुई सारी जिंदगी जेल में रखने का निर्णय पूरी तरह वैध है. पीठ ने पुराने निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि पांच जजों की बेंच पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि उम्र कैद की सजा काट रहे दोषी के प्राकृतिक जीवन के अंत तक सजा काटने का प्रावधान वैध है. ऐसी सजा को असंवैधानिक बताने वाली दलीलों को सुप्रीम कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया.
अदालत ने स्पष्ट किया कि जघन्य अपराधों में जहां फांसी की सज़ा नहीं हो रही, वहां अदालतों द्वारा दोषी को प्राकृतिक जीवन के अंत तक कैद की सजा सुनाई जा सकती है.
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समय से पहले सजा माफी या समय पूर्व रिहाई को लेकर भी अदालत ने स्पष्टीकरण दिया है कि यदि किसी अदालत ने स्पष्ट रूप से 'बिना किसी रियायत' के ताउम्र जेल की सजा दी है, तो दोषी समय से पहले रिहाई का दावा नहीं कर सकता. वहीं अगर फैसला सुनाते हुए अदालत ने 'बिना छूट के' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है तो राज्य सरकार दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 432 के तहत सजा कम करने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकती है.
साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति द्वारा दया याचिकाओं पर लिए गए निर्णयों को चुनौती देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 को 'शॉर्टकट' की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
इस मामले में याचिका दायर करने वाले कुछ कैदियों को मूल रूप से मौत की सजा मिली थी, लेकिन इसे बाद में अदालत या राष्ट्रपति द्वारा बिना पैरोल/छूट के आजीवन कारावास में बदला गया था. कोर्ट ने इन याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि जब संविधान पीठ पहले ही यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वी. श्रीहरन (2016) मामले में इस कानून को तय कर चुकी है, तो दोबारा ऐसी याचिकाएं दायर करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है.
संजय शर्मा